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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 530 में से

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पृष्ठ 203

(१) ५० अक्षरम् (२) ५१वीं मातृका (प्रकाशरूपा) (३) ५२वीं मातृका पकाश
का प्रवाह—६वीं ‘जीवनकला’ है । ५० मातृकाएँ लोम एवं विलोम से १०० हैं ।
ये ही १०० मातृकाएँ १०० कुण्डल हैं । इन कुण्डलों को धारण किए हुई
मातृकामयी ‘कुण्डलिनी’ है । सहस्रार चक्र में अव्यक्त नाद है वही आज्ञा चक्र में
आकर ॐकार रूप में व्यक्त होता है । ॐसे उत्पन्न होने वाली ५० मातृकाओं
की अव्यक्त स्थिति का स्थान सहस्रार चक्र है और यही ‘अकुल स्थान’ है । यहीं
शिवशक्ति का स्थान है । ‘शक्ति’ व्यक्त है, ‘शिव’ अव्यक्त है ।
जब कुण्डलिनी उद्बुद्ध होकर ऊपर की ओर बढ़ती है तो उससे ‘स्फोट’ होता
है जिसे ‘नाद’ कहा जाता है । विवरण निम्नानुसार है—कुण्डलिनी का जागरण—
स्फोट (नाद)—प्रकाश—प्रकाश का व्यक्त रूप ‘महाबिन्दु’—(१) इच्छा (सूर्य,
ब्रह्मा), (२) ज्ञान (चन्द्र, विष्णु), (३) क्रिया (अग्नि, शिव) ।
यह ‘नाद’ एवं ‘बिन्दु’ अखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनाहत नाद का व्यष्टि में
व्यक्त रूप है । जो ‘नाद’ अनाहतभाव से समस्त विश्व में सर्वत्र व्याप्त है जब उसी
का प्रकाश व्यक्ति में होता है तब उसे ‘नाद’ कहते हैं । ‘स्फोट’ अखण्ड सत्ता
रूप ब्रह्मतत्त्व का वाचक है । ‘स्फोट’ शब्दब्रह्म है जबकि सत्ता ब्रह्म है । ‘स्फोट’
वाचक शब्द है जबकि सत्ता वाच्य है । यह ‘नाद’ मूलाधार में उदित होता है एवं
सहस्रार में लय हो जाता है ।
गोरक्षसिद्धान्त संग्रह में कहा गया है कि ‘नाथ’ का अंश ‘नाद’ है, नाद का
अंश प्राण है, शक्ति का अंश बिन्दु है एवं बिन्दु का अंश शरीर है । सृष्टि-क्रम
निम्नानुसार है—शिव + शक्ति (प्रकृति) का संयोग—सगुण शिव-शक्ति—परनाद—
परबिन्दु—अपरबिन्दु (-रुद्र) + बीज (-विष्णु) + अपर नाद (-ब्रह्मा) । सोपाधिशिव

  • सोपाधिशक्ति का संयोग—विश्व में विक्षोभ (नाद, परनाद)—विक्षोभ में
    क्रियाशीलता (बिन्दु, परबिन्दु) ।
    नाद + बीज + बिन्दु = इच्छा + ज्ञान + क्रिया । अपरनाद = इच्छा ।
    ‘बीज’ = ज्ञान । अपरबिन्दु = क्रिया ।
    ‘नाद’ की भी अपनी श्रेणियाँ एवं स्तर हैं यथा—(१) नाद ब्रह्मग्रंथि का
    भेदन करने पर ‘शून्य’ में और उसके ऊर्ध्व में (२) विष्णु ग्रंथि का भेदन करने
    पर—‘अतिशून्य’ में, और उसके भी ऊर्ध्व में (३) रुद्र ग्रंथि का भेदन करने पर
    ‘महाशून्य’ में पहुँच जाता है ।
    ‘परमाकला’ नादशक्ति ही है । कुण्डलिनी मूलाधार पद्म में सुषुम्ना के प्रवेश
    द्वार में (ब्रह्मद्वार में) मुख में अपनी पूँछ डालकर पायूपस्थ के मध्यवर्ती चतुरङ्गुल
    प्रमाण योनिकन्द में सो रही है । यह कुलकुण्डलिनी ही मूल नाद शब्दब्रह्म है और
    समस्त मन्त्र उसकी स्वरूप-विभूतियाँ हैं । इसी निमित्त इसे ‘मन्त्रदेवता’ एवं
    (अक्षरमयी होने के कारण) ‘मातृका’ कहते हैं। इसे ही षट्चक्र निरूपमाकार ने
    परमाकला (नाद शक्ति) कहा है—