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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 530 में से

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पृष्ठ 199

प्रथमोऽंशः ९७
'महानाद' फिर 'कला' (आज्ञी) फिर 'उन्मनी' ।। 'बिन्दु एवं मात्रार्ध के ऊपर स्थित
है—'नाद' । 'नाद' के ऊपर स्थित है—'महानाद' (वायु के लय का स्थान) ।।
व्यापिका ही 'आज्ञी' है । आज्ञा चक्र, फिर-'बिन्दु' (शिव) फिर 'बोधिनी' (अर्धमात्रा
के आकार की) फिर 'नाद' (शिवशक्ति का संमिलन) (अर्धचन्द्र के, आकार का),
फिर व्यापिका, (वक्रा आज्ञी) फिर 'समनी' फिर 'उन्मनी' परशक्तिमय, अपने को
तीन रूपों में प्रकट करता है— (१) बिन्दु, (२) नाद, (३) बीज नाद । 'बिन्दु'
नादात्मक है । 'बीज' शक्ति है । 'नाद'—बिन्दु + बीज का सम्मिलन ।।
'बिन्दु'—आज्ञा चक्र के ऊर्ध्व में बिन्दु का स्थान है । 'बिन्दु' ही योगियों का
'तृतीय नेत्र' या 'ज्ञानचक्षु' है । इसी स्थान से ज्ञानभूमि की सूचना प्राप्त होती है ।
जब तक चित्त को एकाग्र करके उपसंहृत न किया जाय तब तक 'बिन्दु' में प्रवेश
पाना असंभव है क्योंकि विक्षिप्त अवस्था में बिन्दु स्थान में स्थिति संभव नहीं है ।
इस भूमि में साधक अहंभाव युक्त होकर और द्रष्टा बनकर निम्नवर्ती संसार को
तटस्थ दृष्टि से देख सकता है किन्तु बिन्दु में अहंभाव के पूर्ण समर्पण या विसर्जन
के पूर्व महाबिन्दु या शिवभाव की अभिव्यक्ति संभव नहीं है । बिन्दुभाव अधिगत
करने के उपरान्त साधक को समस्त कलाओं का क्षय करते-करते विगतकल
अवस्था प्राप्त करनी चाहिए । इस बिन्दु को 'चन्द्रबिन्दु' कहा जाता है । इसीलिए
इसकी उत्तरवर्ती अवस्था का अभिधान है—'अर्धचन्द्र' ।।
सृष्टि के मूल उत्स के रूप में जो तत्त्व स्थित है वह है—'बिन्दु' । यह
'महाबिन्दु' के नाम से प्रसिद्ध है । प्रकाश या शिवांश एवं विमर्श या शक्त्यंश
जब समभाव में प्रतिष्ठित रहते हैं तब उनकी आख्या 'बिन्दु' होती है । सृष्टि के
आरम्भ में एक ही बिन्दु तीन रूपों में विभाजित होकर उदित होता है । समष्टिगत
बिन्दु व्यष्टिरूपात्मना तीन बिन्दुओं में रूपान्तरित हो जाता है । 'अम्बिका' या
प्रकाशांश तथा 'शान्ता' या विमर्शांश इन दोनों का मूल स्रोत की सृष्टि का मूल
स्रोत है । अम्बिका का प्रकाशन— (१) वामा (२) ज्येष्ठा एवं (३) रौद्री नाम्नी
तीन शक्तियों एवं—'शान्ता' का प्रकाशन (१) इच्छा (२) ज्ञान एवं (३) क्रिया—
इन तीन शक्तियों के रूप में होता है । जहाँ अम्बिका एवं शान्ता साम्यभाव में
स्थित रहती हैं उसे समष्टि बिन्दु या मूल बिन्दु कहते हैं ।
(क) 'समष्टिबिन्दु' = अम्बिका एवं शान्ता में साम्यभाव की भूमि—
'परावाक्' ।।
(ख) 'व्यष्टि बिन्दु' = (१) वामा एवं इच्छा में साम्य से जिस बिन्दु का
आविर्भाव होता है—अर्थात = 'पश्यन्तीवाक्' ।।
(२) ज्येष्ठा एवं ज्ञान के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है—अर्थात् =
'मध्यमावाक्'
(३) रौद्री एवं क्रिया शक्ति के साम्य (दातादात्म्य) से जो बिन्दु प्रकट होता
है—अर्थात् = 'वैखरीवाक्'
७ वरि.