वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ९९
ध्वनियाँ हैं तथा अनुस्वार विसर्गवत वर्ण है। अर्द्धचन्द्र से नीचे पूर्णचन्द्राकार ज्ञान
शक्ति प्रधान, नादपरामर्श को उदरस्थ किए हुए समस्त स्रष्टव्य वेद्य वर्ग से
अविभक्त, क्रियात्मकशक्त्यात्मा ईश्वर रूप 'बिन्दु' का उदय होता है।¹ इनका प्रकाश
करोड़ों सूर्यों के समान है। ये सृष्टि-संसार के कारण है।
“नाद”-ब्रह्मरन्ध्र के मुख में नादस्थान है। यह मन्त्र महेश्वरों से परिवृत है।
'उन्मना'-में काल नहीं है किन्तु 'नाद' में है। यह काल की मात्रा १६ लवों की
है-'नादे षोडशैलवाः पुनः ।।' 'नाद' सृष्टिप्राक अवस्था का वह स्तर है जो
तत्वतः 'सदाशिव' है एवं जो अप्रतिम वेग से प्रसरण करता हुआ समस्त जगत को
ध्वनि से आपूरित कर देता है—
“प्रसरत्यतिवेगेन ध्वनिनापूरयञ्जगत् ।
स नादो देवदेवेशः प्रोक्तश्चैव सदाशिवः ।।” (नेत्रतन्त्र)
अर्धचन्द्र की ऊर्ध्वभूमि में प्रतिष्ठित इस नाद पद की अनेक शक्तियाँ हैं।
नाद की निम्न शक्तियाँ हैं-(१) इंधिका (२) दीपिका (३) रोचिका (४) मोचिका
(५) ऊर्ध्वगामिनी ।
‘इंधिका दीपिका चैव रोचिका मोचिका तथा ।
ऊर्ध्वगामिन्यः यत्येताः कला नाद समुद्भवाः ।।'²
इनका विवरण निम्नानुसार है—
‘एताः स्वतन्त्रता युक्ताः सकले निष्कले स्थिताः ।
ज्ञानशक्तिस्वरूपास्तु ज्ञाताः सार्वज्ञ्यदायिकाः ॥'³
अर्धचन्द्रोर्ध्ववर्तिनी 'नादशक्ति' की शक्तियाँ विमर्श प्रधान एवं परदीप्तिमय हैं।⁴
बिन्दु आदि नव के समूह को 'नाद' कहा जाता है-“बिन्दादीनां नवानां तु
समष्टिर्नाद उच्यते ।।''५
ये 'बिन्दादि' निम्न हैं—(१) बिन्दु (२) अर्द्धचन्द्र (३) रोधिनी (४) नाद
(५) नादान्त (६) शक्ति (७) व्यापिका (८) समना (९) उन्मनी—
'बिन्द्धर्धचन्द्र रोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥
बिन्दादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ।⁶
'बिन्दौ तदर्धे रोधिन्यां नादे नादान्त एव च ॥
शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनि गोचरे ।
महाबिन्दौ पुनश्चैव त्रिधा चक्रं तु भावयेत् ।।'⁷
१. 'बिन्दुश्चेश्वरः स्मृतः' (नेत्रतन्त्र) २-३. नेत्रतन्त्र
४. नेत्रोद्योत ५-६. वरिवस्यारहस्यम्
७. योगिनीहृदय (चक्र सङ्केत)