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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 530 में से

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पृष्ठ 198

९६ वरिवस्यारहस्ये
'बिन्दु'—'योगिनीहृदय' के अनुसार 'बिन्दु' दीपक के समतुल्य प्रकाशमान है
और यह ललाट में गोलबिन्दी के रूप में स्थित है । इसका उच्चारण-काल
अर्द्धमात्रा है । ह्रस्व स्वर का उच्चारण-काल 'मात्रा' कहलाता है और इसका आधा
काल अर्धमात्रा है जो कि बिन्दु के उच्चारण में प्रयुक्त होता है ।१
ह्रस्व का उच्चारण-काल एक मात्रा, दीर्घ का उच्चारण-काल दो मात्रा, प्लुत
का उच्चारण-काल तीन मात्रा एवं व्यञ्जन का उच्चारण-काल अर्धमात्रा हुआ करता
है—
'एक मात्रो भवेद्ध्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥'
'मात्रा लध्वक्षरस्य कालः । तद्विगुणो गुर्वक्षरस्य । अतएव कामकला कमला
त्रिकोणा योनिश्च द्विमात्रा । हल्लेखायां द्वयोर्व्यञ्जनयोरे का मात्रा कामकलाया द्वे मात्रे
इति तिस्रः । बिन्दोरपि व्यञ्जन त्वादर्धमात्रा ॥'२
'बिन्दु' भाल के मध्य वृत्ताकार रूप से दीप की भाँति देदीप्यमान है—रहता
है—'मध्येकालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ॥'३ अमृतानन्द कहते हैं—
'दीपाकारोऽर्धमात्रोच्चारणकालो वृत्त सन्निवेशो बिन्दुः इति ॥'४ 'योगिनीहृदय' में बिन्दु
की व्याख्या केवल इस प्रकार की गई है—'दीपाकारो' । अर्थात् बिन्दु दीपक के
आकार का है—दीपक की जैसी कान्ति या भासन वाला है । बिन्दु आदि नव के
समूह को 'नाद' कहा जाता है । (व०र०)
बिन्दु का विस्तार—'स्वच्छन्द तन्त्र' में 'बिन्दु' के विस्तार के विषय में इस
प्रकार कहा गया है—"बिन्दावरणमूर्ध्वतः । 'सूर्यकोटि प्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ।
तन्मध्येशतकोटीनां संख्या योजनपङ्कजम् । तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ।
पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभा कृतिः । निवृत्तिश्चं प्रतिष्ठा च विद्या शान्ति
सुक्रमात । परिवार्य स्थिता श्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि । वामभागे समासीना
शान्त्यतीता मनोन्मनी । पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दसबाह्निन्दु शेखराः । बिन्दुत्वं
समाख्यातं कोट्यर्बुद शतैर्वृतम् ॥'"५
बिन्दु को दीपाकार इसलिए कहा गया है क्योंकि दीपक का भासन जैसा
होता है वैसा ही बिन्दु का होता है—'दीपाकारो दीपकस्य यादृशं भासनं
तादृशम ।'’६ दीपस्यैवाकारः कान्तिर्यस्य स दीपाकारः ॥७ (१) निवृत्ति (२) प्रतिष्ठा
(३) विद्या (४) शान्ति—ये तत्पुरुष की कलायें हैं । इनका स्थान भ्रू मध्य है और
यह बिन्दुरूप ईश्वर तत्व में स्थित हैं । 'इन्दु' फिर 'बोधिनी' फिर 'नाद' फिर
१. भास्करराय—वरिवस्यारहस्यम् २. भास्करराय—'प्रकाश'
३. वरिवस्यारहस्यम् ४. दीपिका
५. नेत्रतन्त्र ६. दीपिका
७. सेतुबन्ध