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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

विद्या कादि विद्येति-> wait,शांभवी विद्या कादि विद्येति Line 3:वा । हादिविद्येति वा सादि Line 4:विद्येति वा रहस्यमोमो Line 5:'वाचि प्रतिष्ठा ।।'२ Wait, why does line 4 sayरहस्यमोमो? Wait, look at line 4: विद्येति वा रहस्यमोमो Wait, is the last letterमो? Let's look at मो: मwith anेand anा=मो. The next letter: मwithो? Wait! Could it be रहस्यमोम्? Look at the letter: It has म, and then on top an ो? No, wait! Could it be रहस्यमोमित्योम्? No, there are only two syllables after रहस्य: मोand... Wait, is that a virama? Look at:म+ो=मो. Wait, is it रहस्यमोम्with a halanta? Wait, why would halanta have a vertical bar? Wait, in Hindi/Sanskrit fonts,मwith halanta isम्`.
Here, the

९० वरिवस्यारहस्ये
* प्रकाश *
व्योम हकारः केवलो न त्वकारविशिष्टः । अग्नी रेफस्तादृशः । वामलोचने-
कारः१ । बिन्द्वादयो नवापि सूक्ष्मसूक्ष्मतरासूक्ष्मतमकालैरुच्चार्या ध्वनिविशेषाः, वर्ण-
विशेषा वा । न च ककारादिवत् स्पष्टमनुच्चार्यत्वात् तन्त्रीस्वरतुल्यत्वेन श्रूयमाणत्वाच्चा
कारप्रत्ययाद्यभावाच्च ‘बीजबिन्दुध्वनीनां च त्रिकूटेषु ग्रहात्मिका’ इत्यादौ ध्वनिपदेनैव
तन्त्रेषु व्यवहाराच्च न वर्णत्वमर्धचन्द्रादेरिति वाच्यम्, अनुस्वारविसर्गादावुक्तहेतु-
सत्त्वेऽपि वर्णत्वस्येष्टत्वात् । कथमन्थथा ‘त्रिषष्टिश्चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शंभुमते मताः’ इति
प्रतिज्ञाय ‘अनुस्वारो विसर्गश्च—’ इति परिगणनं शिक्षायां सङ्गच्छेत ? न च तादृश-
संख्याविरोधादेव नात्र वर्णत्वम्, तत्र स्पष्टोच्चार्याणामेव गणनात् । न च ताल्वादि-
परिगणितस्थानानभिव्यङ्ग्यत्वात्र वर्णत्वम्, तदनभिव्यङ्ग्यत्वस्य पश्यन्त्यादावव्याप्तेः,
‘चत्वारि वाक्परिमिता पदानि इति श्रुत्या वर्णसमूहात्मकपदत्वस्य स्पष्टमुक्तत्वाच्च । अत
एव चतुःशतीशास्त्रे नादस्यार्थवर्णनं सङ्गच्छते । न च रथघोषवत् पदार्थस्मारकत्वोप-
पत्तिः; तत्र हि तत्कालकरणीयत्वसम्बन्धेन माहेन्द्रस्तोत्रोपाकरणस्य स्मृतिविषयताया
वाचनिकत्वेन रथघोषसामान्यस्य लौकिकादिसाधारणस्य स्मारकत्वाभावेन तस्य तत्र
शक्तेरयोगात्, प्रकृते तु न तथेति वैषम्यात्; ‘हल्लेखात्रयसंभूतैस्तिथिसंख्यैस्तथाक्षरैः’
इत्यादौ प्रतिहल्लेखं हकाररेफेकारानुस्वारनादपञ्चकमिति पञ्चदशाक्षराणीत्युक्त्या, नादे-
ऽक्षरत्वव्यवहारस्यासकृद्योगिनीहृदये,
‘भूमिश्चन्द्रः शिवो माया शक्तिः कृष्णाध्वमादनौ ।
अर्धचन्द्रश्च बिन्दुश्च नवार्णो मेरुरुच्यते ।
महात्रिपुरसुन्दर्या मन्त्रा मेरुसमुद्भवाः ॥’
इति ज्ञानार्णवादावप्यसकृद्व्यवहारस्य दर्शनाच्च । ध्वनिपदेन व्यवहारस्तु तत्तुल्य-
त्वाल्लक्षणया ध्वनिपर्यायनादपदवाच्यत्वात्रेयार्थरूपलक्षणया वा नेय इति दिक् । एवं च
प्रथमतृतीयकूटे अष्टादशवर्णात्मके; मध्यमकूटं तु चतुरधिकम्; संहत्याष्टपञ्चाश-
द्वर्णात्मिका विद्येति सिद्धम् । यद्यपि बिन्दुविनिर्मुक्तानामष्टानामेव नादसंज्ञा मन्त्रशास्त्रे,
तथापि व्यवहारसौकर्याय तत्सहितानामेव सात्र कृतेति ध्येयम् ॥ १२-१३ ॥
* सरोजिनी *
हल्लेखायाः = हल्लेखा का । व्योम = ह । अग्नि = र । वाम-लोचना
= ई । ‘बिन्दु’ अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं
उन्मनी—ये नौ अवयव प्रणव, महामन्त्र, मन एवं चक्र के अङ्गभूत हैं ।
आचार्य भास्करराय ‘सेतुबन्ध’ में कहते हैं कि—‘स्वच्छन्दतन्त्र’ में कहा गया
है कि मूलाधार की कर्णिका के मध्य में ‘वह्नि बिम्ब’ है एवं स्वाधिष्ठान की
कर्णिका में ‘हल्लेखा’ का अवस्थान है—‘स्वच्छन्द तन्त्रे मूलाधारे कर्णिकायां
बह्निबिम्बस्य कथनात् स्वाधिष्ठानकर्णिकायां हल्लेखारूप शक्तेरवस्थानम् ॥’
१. वामलोचनमीकारः

प्रथमोऽंशः ९१
'हल्लेखा' 'ह्रीं' (ह, र, ई एवं अनुस्वार) की भी द्योतिका है। 'हल्लेखा'
का ऊर्ध्व बिन्दु 'बिन्दु' है। १ प्रथम कूट में जो हल्लेखा है उसके अन्तर्गत ही
'कामकला' है। उसमें गुरुमुखैकवेद्या जो सर्पयोग मार्ग के अनुसार 'षडदल कमल'
के ऊपर मूलाधार और उसके ऊपर शक्ति या 'हल्लेखा' का स्थान है। यह
अनङ्गादि देवताओं से परिवेष्टित है और आधार कमल से ढाई अङ्गुल ऊपर नील
वर्ण की कर्णिका के भीतर प्रतिष्ठित है। 'हल्लेखा' से दो अङ्गुल ऊपर स्वाधिष्ठान
कमल का स्थान है। इसके बाद क्रमशः मणिपूर, अनाहत, 'विशुद्ध', लम्बिकाग्र
(अष्टदल कमल) और अन्त में आज्ञाचक्र है। आज्ञाचक्र के ऊपर बिन्दु से उन्मना
पर्यन्त प्रणव की भूमिकाओं के रूप में निम्न भूमियाँ स्थित हैं—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र,
निरोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका (यापिनी) समना और उन्मना। २ आचार्य
शङ्कर ने 'हल्लेखा' की व्याप्ति के विषय में इस प्रकार लिखा है—
'सचराचरस्य जगतो मूलत्वान् मूलताऽस्य बीजस्य ।।' और 'हल्लेखा' के ज्ञान
का फल इस प्रकार निरूपित किया है—यां ज्ञात्वा सकलमपास्य कर्मबंधं, तद्विष्णोः
परमपदं प्रयाति लोकः । तामेतां त्रिजगति जन्तुजीवभूतां, हल्लेखां जपत इति
नित्यमर्चयीत् ।।३
'स्वच्छन्द संग्रह' में 'हल्लेखा' का इस प्रकार विवरण प्रस्तुत किया गया है—
'आधारपङ्कजस्योर्ध्वं सार्द्धद्वयङ्गुले कोपरि। तैजसं साष्टपत्रञ्च पीतकर्णिकया युतम्।
हल्लेखाकर्णिका मध्ये स्थितानङ्गादि देवता। एतस्माद द्वयङ्गुलादूर्ध्वे स्वाधिष्ठानं
षडरकम् ।'४
┌─────────────────────────┐
│ प्रणव के बारह अवयव │
└────────────┬────────────┘
↓
┌───┬───┬───┐ ┌───┬───────┬───────┬───┬──────┬─────┬──────┬─────┬─────┐
↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓
१ २ ३ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९
अ उ म बिन्दु अर्द्धचन्द्र रोधिनी नाद नादान्त शक्ति व्यापिनी समना उन्मना
┌ १. जाग्रत् ┐ └───────────────────────────────────────────────────┘
│ २. स्वप्न् │ (३ अवयव) (९ अवयव)
└ ३. सुषुप्ति ┘
(तुरीय एवं तुरीयातीत अवस्थाओं के द्योतक ३ + ९
= १२ अवयव = प्रणवावयव ॥)
द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम, द्वादश—ये छः अवयव 'शून्य' कहलाते हैं।


१. गोपीनाथ कविराज—'भारतीय संस्कृति और साधना'; (पृ० ४०)
२. तत्रैव; (पृ० ३३६) ३. प्रपञ्चसारतन्त्र (चतुर्थ पटल)
४. स्वच्छन्दतन्त्र

९२ वरिवस्यारहस्ये
(क) द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम शून्य = ‘अवान्तर शून्य’।
(ख) द्वादश शून्य (उन्मना) = ‘महाशून्य’।
(ग) सुषुप्तिभावना का स्थान भ्रूमध्य स्थित बिन्दु में है। इस बिन्दु को
‘हल्लेखा’ का ऊर्ध्व बिन्दु जानना चाहिए।
(घ) अर्द्धचन्द्र, रोधिनी एवं नाद—इन तीन मन्त्रावयवों में ‘तुरीय’ की भावना
करना उचित है।
(ङ) नादान्त से शक्ति। व्यापिनी, समना एवं उन्मना में ‘तुरीयातीत अवस्था’
व्याप्त है। उन्मना से परे किसी प्रकार की अवस्था नहीं है। ‘बिन्दु’ मात्रा से
मात्राहीन की ओर जाने का द्वार है जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान एकाकार हो जाते हैं,
उन्मना पर्यन्त सम्पूर्ण मन्त्रावयव १०८१७ बार उच्चारित होने पर नाद का अन्त
एवं तत्वज्ञान का उदय होकर परमपद की प्राप्ति होती है। समना में भी ‘नाद’ का
अन्त नहीं होता। शाक्त योगियों के मतानुसार ‘उन्मना’ में भी नाद का अन्त नहीं
होता। उन्मना में काल तो नहीं है फिर भी वह परमतत्त्व नहीं है। जब तक नाद
का अन्त नहीं होता तब तक तत्वबोध नहीं हो पाता। उन्मना का भेदन होने के
बाद ही ‘नाद’ का अन्त होता है।१
‘विश्वचक्र’ (अकुल से महाबिन्दु पर्यन्त समस्त अवान्तर चक्रों की समष्टि ही
विश्वचक्र है।)
(१) अकुल से आज्ञा चक्र तक के अंश = ‘सकल’
(२) बिन्दु से उन्मना तक के अंश = ‘सकल निष्कल’
(३) उन्मना के बाद महाबिन्दु अंश = ‘निष्कल’
‘महाबिन्दु’ = विश्वातीत परमेश्वर या शिवशक्ति का आसन) ।। ‘महाबिन्दु’
ही सदाशिव है। इसके ऊपर चिच्छक्ति क्रीडा करती है।
प्रणव के द्वादश अवयव हैं—(१) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के द्योतक—
अकार, उकार, मकार (२) तुरीय, तुरीयातीत के द्योतक—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र,
रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना, उन्मना।
बिन्दौ तदर्धे रोधिन्या नादे नादान्त एवं च।
शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनि गोचरे ॥
महाबिन्दौ पुनश्चैवं त्रिधा चक्रं तु भावयेत् ॥२
‘नेत्रतन्त्र’ के अनुसार प्रणव की निम्न कलायें हैं—(१) अकार (२) उकार
(३) मकार (४) बिन्दु (५) अर्द्धचन्द्र (६) रोधिनी (७) नाद (८) नादान्त (९)
व्यापिनी (१०) शक्ति (११) समना (१२) उन्मना—
१. गोपीनाथ कविराज—‘भारतीय संस्कृति और साधना’; (पृ० ३३८-३३९)
२. योगिनीहृदय । (चक्र संकेत)

प्रथमोऽंशः ९३
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥ २१ ॥
कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समनाश्रेति सामया ।
निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ॥ २२ ॥१
अकार, उकार, मकार, बिन्दु आदि द्वादश कलाओं के द्वारा ओंकार पृथ्वी से
लेकर शिव पर्यन्त समस्त तत्त्वों एवं भुवनों को आकलित करता है क्योंकि—'ओम्
इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्' प्रणव समस्त प्राणियों का प्राण है, उनका जीवन है—
'प्रणवः प्राणिनां प्राणो जीवनं सम्प्रतिष्ठितम् ।
गृह्णति प्रणवः सर्वं कलाभिः कलयेच्छिवम् ॥२
क्या 'बिन्दु' अर्द्धचन्द्र, रोधिनी आदि वर्ण या अक्षर हैं—भास्करराय
'वरिवस्यारहस्यम्' में कहते हैं कि यद्यपि ककारादि वर्णों की भाँति इनका स्पष्ट
उच्चारण तो संभव नहीं है तथापि ये उक्त बिन्दु आदि नव कलायें सूक्ष्म, सूक्ष्मतर
एवं सूक्ष्मतम काल द्वारा उच्चरित ध्वनि विशेष या वर्ण विशेष हैं । 'योगिनीहृदय'
में भी नाद को अक्षर स्वीकार किया गया है । इसी आधार पर पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
में ५८ वर्णों की संहति स्वीकार की गई है ।३
नव नादों का समष्टिगत नाम—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद नादान्त,
शक्ति, समना एवं उन्मना—इन नवों का समष्टिगत नाम 'नाद' है । बिन्दु से
उन्मनापर्यन्त नव कलाओं की समुदित संज्ञा 'नाद' है । भास्करराय कहते हैं कि
यद्यपि आठ कलाओं का नाम ही 'नाद' है । किन्तु व्यवहार सौकर्य के लिए
'बिन्दु' को भी मिलाकर नौ कलाओं को भी 'नाद' कहा जाता है ।
कलाओं (नादों) की मात्रायें—कमलपुष्प को सुई से एकबारगी छेद करने
पर प्रत्येक दल के भेदन में जितना समय लगता है उसे 'लव' कहते हैं । इससे
अधिक सूक्ष्म काल नहीं होता । २५६ लवों की एक मात्रा होती है ।
उच्चारण-काल—(१) बिन्दु का १२८ लव (२) अर्द्धचन्द्र का ६४ (३) रोधिनी
का ३२ (४) नाद का १६ (५) नादान्त का ८ (६) शक्ति का ४ (७) व्यापिका
का २ (८) समना १ लव (९) उन्मना—सर्वथा कालहीन ॥४ 'योगिनीहृदय' में
'उन्मना' को भी कालात्मक स्वीकार किया गया है—'शक्त्यादीनां तु मात्रांशो
मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥' 'सेतुबंध' में भास्करराय ने इस श्लोक की व्याख्या करते
हुए कहा है कि जिस तरह 'समना' में काल होता है उसी प्रकार 'उन्मना' में भी
काल होता है—"यथा समनायाः कालः तथैवोन्मनी काल ।।"
१-२. नेत्रतन्त्र ३. प्रकाश
४. प्रकाश 'बिन्दु' से लेकर समना पर्यन्त समस्त कलाओं की मात्रा अपनी
पूर्ववर्ती कला से उत्तरोत्तर आधी होती जाती है यथा—बिन्दु की मात्रा से
आधी मात्रा अर्द्धचन्द्र में अर्द्धचन्द्र से आधी मात्रा रोधिनी में, रोधिनी से
आधी मात्रा नाद में, नाद की मात्रा से आधी मात्रा नादान्त में आदि ।।

९४ वरिवस्यारहस्ये

नादों का क्रमाङ्क९ नाद या प्रणव के अवयवस्थानकलाएँअवस्थाआकारउच्चारण काल (काल की मात्रा या अवधि)पूर्ण ध्वनि की मात्राआकार का स्पष्टीकरण
४बिन्दुआज्ञा चक्र के ऊपर ललाट मेंज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती, सुप्रभा, विमला, शिवासुषुप्ति१२८ लव१/२दीप के सदृश वृत्ताकार
५अर्धचन्द्र<br>अर्द्धेन्दुबिन्दु के ऊपररुन्धती, रोधनी, रौद्री, ज्ञानबोधा, तमोपहा, निरोधिकातुर्यावस्था६४ लव१/४आधे चन्द्र के समान
६निरोधिकाअर्धचन्द्र के ऊपरइन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका३२ लव१/८त्रिकोणाकृति : चन्द्रिका की भाँति
७नादनिरोधिका के ऊपरऊर्ध्वग१६ लव१/१६दो बिन्दुओं के मध्य पद्मराग मणिवत दण्ड के समान
८नादान्तनाद के ऊपरसूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, अमृतसंभवा, व्यापिनी८ लव१/३२वाम भाग में बिन्दु एवं हल के समान : तड़ित के समान

प्रथमोऽंशः ९५

नादों का क्रमाङ्क९ नाद या प्रणव के अवयवस्थानकलाएँअवस्थाआकारउच्चारण काल (काल की मात्रा या अवधि)पूर्ण ध्वनि की मात्राआकार का स्पष्टीकरण
९शक्तिनादान्त के ऊपरव्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता, अनाथा, अनाश्रिता४ लव१/६४जिसमें दो तिरछे बिन्दु हों। वामबिन्दु से एक रेखा निकल रही हो। दक्षिण बिन्दु शिरा शून्य
१०व्यापिनी (व्यापिका)शक्ति के ऊपरसर्वज्ञा, सर्वगा, दुर्गा, सवना, स्पृहणा, धृति२ लव१/१२८बिन्दु से निकलता हुआ त्रिकोण
११समनाव्यापिनी के ऊपर१ लव१/२५६ऊर्ध्व एवं अधोभागस्थ बिन्दुद्वय से संयुक्त रेखाकृति
१२उन्मनासमना के ऊपरकालहीन१/५१२ऊर्ध्वबिन्दु से हीन
०नौ कलाएँ

९६ वरिवस्यारहस्ये
'बिन्दु'—'योगिनीहृदय' के अनुसार 'बिन्दु' दीपक के समतुल्य प्रकाशमान है
और यह ललाट में गोलबिन्दी के रूप में स्थित है । इसका उच्चारण-काल
अर्द्धमात्रा है । ह्रस्व स्वर का उच्चारण-काल 'मात्रा' कहलाता है और इसका आधा
काल अर्धमात्रा है जो कि बिन्दु के उच्चारण में प्रयुक्त होता है ।१
ह्रस्व का उच्चारण-काल एक मात्रा, दीर्घ का उच्चारण-काल दो मात्रा, प्लुत
का उच्चारण-काल तीन मात्रा एवं व्यञ्जन का उच्चारण-काल अर्धमात्रा हुआ करता
है—
'एक मात्रो भवेद्ध्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥'
'मात्रा लध्वक्षरस्य कालः । तद्विगुणो गुर्वक्षरस्य । अतएव कामकला कमला
त्रिकोणा योनिश्च द्विमात्रा । हल्लेखायां द्वयोर्व्यञ्जनयोरे का मात्रा कामकलाया द्वे मात्रे
इति तिस्रः । बिन्दोरपि व्यञ्जन त्वादर्धमात्रा ॥'२
'बिन्दु' भाल के मध्य वृत्ताकार रूप से दीप की भाँति देदीप्यमान है—रहता
है—'मध्येकालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ॥'३ अमृतानन्द कहते हैं—
'दीपाकारोऽर्धमात्रोच्चारणकालो वृत्त सन्निवेशो बिन्दुः इति ॥'४ 'योगिनीहृदय' में बिन्दु
की व्याख्या केवल इस प्रकार की गई है—'दीपाकारो' । अर्थात् बिन्दु दीपक के
आकार का है—दीपक की जैसी कान्ति या भासन वाला है । बिन्दु आदि नव के
समूह को 'नाद' कहा जाता है । (व०र०)
बिन्दु का विस्तार—'स्वच्छन्द तन्त्र' में 'बिन्दु' के विस्तार के विषय में इस
प्रकार कहा गया है—"बिन्दावरणमूर्ध्वतः । 'सूर्यकोटि प्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ।
तन्मध्येशतकोटीनां संख्या योजनपङ्कजम् । तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ।
पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभा कृतिः । निवृत्तिश्चं प्रतिष्ठा च विद्या शान्ति
सुक्रमात । परिवार्य स्थिता श्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि । वामभागे समासीना
शान्त्यतीता मनोन्मनी । पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दसबाह्निन्दु शेखराः । बिन्दुत्वं
समाख्यातं कोट्यर्बुद शतैर्वृतम् ॥'"५
बिन्दु को दीपाकार इसलिए कहा गया है क्योंकि दीपक का भासन जैसा
होता है वैसा ही बिन्दु का होता है—'दीपाकारो दीपकस्य यादृशं भासनं
तादृशम ।'’६ दीपस्यैवाकारः कान्तिर्यस्य स दीपाकारः ॥७ (१) निवृत्ति (२) प्रतिष्ठा
(३) विद्या (४) शान्ति—ये तत्पुरुष की कलायें हैं । इनका स्थान भ्रू मध्य है और
यह बिन्दुरूप ईश्वर तत्व में स्थित हैं । 'इन्दु' फिर 'बोधिनी' फिर 'नाद' फिर
१. भास्करराय—वरिवस्यारहस्यम् २. भास्करराय—'प्रकाश'
३. वरिवस्यारहस्यम् ४. दीपिका
५. नेत्रतन्त्र ६. दीपिका
७. सेतुबन्ध

प्रथमोऽंशः ९७
'महानाद' फिर 'कला' (आज्ञी) फिर 'उन्मनी' ।। 'बिन्दु एवं मात्रार्ध के ऊपर स्थित
है—'नाद' । 'नाद' के ऊपर स्थित है—'महानाद' (वायु के लय का स्थान) ।।
व्यापिका ही 'आज्ञी' है । आज्ञा चक्र, फिर-'बिन्दु' (शिव) फिर 'बोधिनी' (अर्धमात्रा
के आकार की) फिर 'नाद' (शिवशक्ति का संमिलन) (अर्धचन्द्र के, आकार का),
फिर व्यापिका, (वक्रा आज्ञी) फिर 'समनी' फिर 'उन्मनी' परशक्तिमय, अपने को
तीन रूपों में प्रकट करता है— (१) बिन्दु, (२) नाद, (३) बीज नाद । 'बिन्दु'
नादात्मक है । 'बीज' शक्ति है । 'नाद'—बिन्दु + बीज का सम्मिलन ।।
'बिन्दु'—आज्ञा चक्र के ऊर्ध्व में बिन्दु का स्थान है । 'बिन्दु' ही योगियों का
'तृतीय नेत्र' या 'ज्ञानचक्षु' है । इसी स्थान से ज्ञानभूमि की सूचना प्राप्त होती है ।
जब तक चित्त को एकाग्र करके उपसंहृत न किया जाय तब तक 'बिन्दु' में प्रवेश
पाना असंभव है क्योंकि विक्षिप्त अवस्था में बिन्दु स्थान में स्थिति संभव नहीं है ।
इस भूमि में साधक अहंभाव युक्त होकर और द्रष्टा बनकर निम्नवर्ती संसार को
तटस्थ दृष्टि से देख सकता है किन्तु बिन्दु में अहंभाव के पूर्ण समर्पण या विसर्जन
के पूर्व महाबिन्दु या शिवभाव की अभिव्यक्ति संभव नहीं है । बिन्दुभाव अधिगत
करने के उपरान्त साधक को समस्त कलाओं का क्षय करते-करते विगतकल
अवस्था प्राप्त करनी चाहिए । इस बिन्दु को 'चन्द्रबिन्दु' कहा जाता है । इसीलिए
इसकी उत्तरवर्ती अवस्था का अभिधान है—'अर्धचन्द्र' ।।
सृष्टि के मूल उत्स के रूप में जो तत्त्व स्थित है वह है—'बिन्दु' । यह
'महाबिन्दु' के नाम से प्रसिद्ध है । प्रकाश या शिवांश एवं विमर्श या शक्त्यंश
जब समभाव में प्रतिष्ठित रहते हैं तब उनकी आख्या 'बिन्दु' होती है । सृष्टि के
आरम्भ में एक ही बिन्दु तीन रूपों में विभाजित होकर उदित होता है । समष्टिगत
बिन्दु व्यष्टिरूपात्मना तीन बिन्दुओं में रूपान्तरित हो जाता है । 'अम्बिका' या
प्रकाशांश तथा 'शान्ता' या विमर्शांश इन दोनों का मूल स्रोत की सृष्टि का मूल
स्रोत है । अम्बिका का प्रकाशन— (१) वामा (२) ज्येष्ठा एवं (३) रौद्री नाम्नी
तीन शक्तियों एवं—'शान्ता' का प्रकाशन (१) इच्छा (२) ज्ञान एवं (३) क्रिया—
इन तीन शक्तियों के रूप में होता है । जहाँ अम्बिका एवं शान्ता साम्यभाव में
स्थित रहती हैं उसे समष्टि बिन्दु या मूल बिन्दु कहते हैं ।
(क) 'समष्टिबिन्दु' = अम्बिका एवं शान्ता में साम्यभाव की भूमि—
'परावाक्' ।।
(ख) 'व्यष्टि बिन्दु' = (१) वामा एवं इच्छा में साम्य से जिस बिन्दु का
आविर्भाव होता है—अर्थात = 'पश्यन्तीवाक्' ।।
(२) ज्येष्ठा एवं ज्ञान के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है—अर्थात् =
'मध्यमावाक्'
(३) रौद्री एवं क्रिया शक्ति के साम्य (दातादात्म्य) से जो बिन्दु प्रकट होता
है—अर्थात् = 'वैखरीवाक्'
७ वरि.

९८ वरिवस्यारहस्ये
यह त्रिकोण मूलत्रिकोण है । इसका मध्य बिन्दु 'परामातृका' है । तीन
दिशाओं के तीन बिन्दुओं को 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' कहते हैं । इस
त्रिकोण की वाम दिशा की वक्ररेखा 'पश्यन्तीवाक्' का प्रसार है । इसके ऊर्ध्व की
सरल रेखा 'मध्यमा वाक् का प्रसार है । इसके दक्षिण दिशा की रेखा 'वैखरी
वाक्' है । यही है योनिस্বরূপ विश्वमातृका का स्वरूप । समग्र विश्व का जो
मूलबिन्दू है वही सर्वोच्च बिन्दु है इसी बिन्दु से सर्वप्रथम त्रिकोण का जन्म होता
है । समग्र विश्व के केन्द्र में पराशक्ति के आत्मप्रकोशन की भूमि के रूप में इसी
त्रिकोण का प्रकटीकरण होता है । लुप्त हो जाता है । यह स्तर समाधिजन्य प्रज्ञा
से उत्कृष्टतर है । योगिगम्य पञ्चशून्यों में प्रथम शून्य बिन्दु है । जहाँ ज्ञाता, ज्ञान
एवं ज्ञेय एकाकार होते हैं वही, मात्रा से मात्राहीन में जाने की, भूमि 'बिन्दु' है ।
'बिन्दु' में काल विद्यमान है और उसकी मात्रा १२८ लवों की है—'बिन्दौ' लवाः
शतं ज्ञेया अष्टाविंशतिसंयुतम् ।'
अन्य चक्रों में काल की मात्रा निम्नानुसार है—(१) उन्मना—काल है ही नहीं
है । (२) 'समना'—एक लव (३) 'व्यापिका'—४ लव (४) 'नादान्त'—८ 'लव'
(५) 'नाद'—१६ लव (६) 'रोधिनी'—३२ लव (७) 'अर्धचन्द्र'—६४ लव (७)
'बिन्दु'—१२८ लव । नालिनीदलसंहति को सूची द्वारा अभिवेधन किये जाने पर
प्रत्येक दल के अभिवेधन में जितना समय लगता है उस काल को 'लव' कहा
जाता है—"दले दले तु यः कालः स कालो लवसंज्ञकः ॥१'
इन समस्त चक्रों की अवस्थायें निम्नानुसार हैं—(१) बिन्दु—सौषुप्त सन्निभ
(२) अर्धचन्द्र से नादान्त पर्यन्त तुर्यावस्था । (३) नादान्त से उन्मनी तक =
तुर्यातीता । अन्य मत—(१) बिन्दु—सुषुप्ति । (२) अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद =
तुर्यावस्था (३) नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना, उन्मनी = तुर्यातीत । तुर्यातीतपद
= आनन्दैकघनावस्थाः आकार निम्नानुसार है—
(१) महाबिन्दु (२) उन्मनी (३) समना (४) व्यापिका (५) शक्ति (६)
नादान्त (७) नाद (८) रोधिनी (९) अर्धचन्द्र (१०) बिन्दु
चूँकि "महाबिन्दु" काल एवं अवस्थाओं से परे हैं अतः उसकी किसी
अवस्था, काल, मात्रा आदि की कल्पना करना संभव नहीं है । "महाबिन्दु
समाश्रित्यावस्था कपि न संभवेत् ।"
'बिन्दु', 'अर्धचन्द्र', 'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त', 'शक्ति', 'व्यापिका',
'समना', एवं 'उन्मना' इन सभी का समष्टिगत नाम 'नाद' है—
"बिन्द्वर्ध चन्द्ररोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समतोन्मन्य इति नाद पदाभिधाः ॥"
ये सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, एवं सूक्ष्मतम काल से उपलक्षित हैं तथा इनकी विशिष्ट
१. शङ्कराचार्यः 'प्रपञ्चसारतन्त्र'

प्रथमोऽंशः ९९
ध्वनियाँ हैं तथा अनुस्वार विसर्गवत वर्ण है। अर्द्धचन्द्र से नीचे पूर्णचन्द्राकार ज्ञान
शक्ति प्रधान, नादपरामर्श को उदरस्थ किए हुए समस्त स्रष्टव्य वेद्य वर्ग से
अविभक्त, क्रियात्मकशक्त्यात्मा ईश्वर रूप 'बिन्दु' का उदय होता है।¹ इनका प्रकाश
करोड़ों सूर्यों के समान है। ये सृष्टि-संसार के कारण है।
“नाद”-ब्रह्मरन्ध्र के मुख में नादस्थान है। यह मन्त्र महेश्वरों से परिवृत है।
'उन्मना'-में काल नहीं है किन्तु 'नाद' में है। यह काल की मात्रा १६ लवों की
है-'नादे षोडशैलवाः पुनः ।।' 'नाद' सृष्टिप्राक अवस्था का वह स्तर है जो
तत्वतः 'सदाशिव' है एवं जो अप्रतिम वेग से प्रसरण करता हुआ समस्त जगत को
ध्वनि से आपूरित कर देता है—
“प्रसरत्यतिवेगेन ध्वनिनापूरयञ्जगत् ।
स नादो देवदेवेशः प्रोक्तश्चैव सदाशिवः ।।” (नेत्रतन्त्र)
अर्धचन्द्र की ऊर्ध्वभूमि में प्रतिष्ठित इस नाद पद की अनेक शक्तियाँ हैं।
नाद की निम्न शक्तियाँ हैं-(१) इंधिका (२) दीपिका (३) रोचिका (४) मोचिका
(५) ऊर्ध्वगामिनी ।
‘इंधिका दीपिका चैव रोचिका मोचिका तथा ।
ऊर्ध्वगामिन्यः यत्येताः कला नाद समुद्भवाः ।।'²
इनका विवरण निम्नानुसार है—
‘एताः स्वतन्त्रता युक्ताः सकले निष्कले स्थिताः ।
ज्ञानशक्तिस्वरूपास्तु ज्ञाताः सार्वज्ञ्यदायिकाः ॥'³
अर्धचन्द्रोर्ध्ववर्तिनी 'नादशक्ति' की शक्तियाँ विमर्श प्रधान एवं परदीप्तिमय हैं।⁴
बिन्दु आदि नव के समूह को 'नाद' कहा जाता है-“बिन्दादीनां नवानां तु
समष्टिर्नाद उच्यते ।।''५
ये 'बिन्दादि' निम्न हैं—(१) बिन्दु (२) अर्द्धचन्द्र (३) रोधिनी (४) नाद
(५) नादान्त (६) शक्ति (७) व्यापिका (८) समना (९) उन्मनी—
'बिन्द्धर्धचन्द्र रोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥
बिन्दादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ।⁶
'बिन्दौ तदर्धे रोधिन्यां नादे नादान्त एव च ॥
शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनि गोचरे ।
महाबिन्दौ पुनश्चैव त्रिधा चक्रं तु भावयेत् ।।'⁷
१. 'बिन्दुश्चेश्वरः स्मृतः' (नेत्रतन्त्र) २-३. नेत्रतन्त्र
४. नेत्रोद्योत ५-६. वरिवस्यारहस्यम्
७. योगिनीहृदय (चक्र सङ्केत)

१०० वरिवस्यारहस्ये
भास्करराय कहते हैं कि यद्यपि बिन्दु विनिर्मुक्त आठ अष्ट अवयवों की आख्या
ही ‘नाद’ है तथापि व्यवहार-सौकर्य के लिए उसके सहित नौ के अवयवों की
समष्टि को ‘नाद’ कह दिया गया है—
‘यद्यपि बिन्दुविनिर्मुक्तानामष्टानामेव नाद संज्ञा मन्त्र शास्त्रे तथापि व्यवहार
सौकर्याय तत्सहितानामेव सात्र कृतेति साध्यम् ॥’१
“नाद” का काल मात्रा काल होता है—
‘संहत्यैकलवोनो मात्राकालोऽस्य नादस्य ।’२
मूलाधार से उठने वाला ‘नाद’ वर्णों के मध्य से होता हुआ सूत्र की भाँति
प्रतीत होता है—‘आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णमध्यगतः ॥’३
‘नाद’—‘निरोधिका’ के अनन्तर नादभूमि आती है । ‘नाद’ की मात्रा १/१६
है । नाद को चारों ओर से घेरकर अनन्त मन्त्र महेश्वर स्थित हैं । इसका स्थान
ब्रह्मरन्ध्र के मुख में है । विशुद्धचित् की तरङ्ग यहीं से प्रारम्भ होती है । इस भूमि
में त्रिगुणातीत विशुद्धचित् का आभासयुक्त शब्द श्रुतिगोचर होता है । ‘नाद’ मन्त्र
महेश्वररूपी महापुरुषों से परिवृत है । नाद के भीतर ही भुवन पञ्चक की मध्यवर्ती
शक्ति ‘ऊर्ध्वगा’ के नाम से प्रख्यात है । यहीं से शुद्ध चिद् बोध का शुभारम्भ
होता है । बिन्दु की परवर्ती अवस्था ही ‘नाद’ है । ‘बिन्दु’ का अनुभव भ्रूमध्य के
मध्य में होता है जबकि उसके भी ऊर्ध्व में ब्रह्मरन्ध्र की अंतिम सीमा तक ‘नाद’
का अनुभव होता है । नाद का आश्रय लेकर ही नाद के अन्त में पहुँचा जाता
है । वाचकों की महासमष्टि से एकीभूत स्थिति का नाम ‘नाद’ है । जिस प्रकार
बिन्दुरूप ज्योति में यथाभीष्ट अर्थ का साक्षात्कार होता है तद्वत् ‘नाद’ में निःशेष
विश्व, अनन्तवाचक एवं अनन्त मन्त्रों का साक्षात्कार होता है । परिणामतः प्रत्येक
मन्त्र चेतन होने पर नादावस्था में उपनीत होता है । ‘बिन्दु’ एवं ‘नाद’ जगत के
असंख्य वाच्यवाचकों की एकीभूत समष्टि के वाचक हैं । ‘नाद’ का अन्त हुए बिना
देहात्मबोध विगलित नहीं होता ।
मन्त्रशास्त्र में जिसे ‘मन्त्र चैतन्य’ की संज्ञा दी गई है वह प्राणात्मक नाद
शक्ति का उदय मात्र है । जिस प्रकार पयोधि में अनिल के आघात से ऊर्मियाँ
उठती हैं । तद्वत् ‘बिन्दु’ में भी ऊर्मियाँ उठती हैं । ये ऊर्मियाँ ही बाहर की ओर
‘नाद’ एवं ‘ज्योति’ के रूप में प्रकट होती है । ‘नाद’ का उदय वाक् के रूप में
एवं ‘ज्योति’ का उदय अर्थ के रूप में हुआ करता है ।
कुण्डलिनी के व्यक्त होने के साथ वेग उत्पन्न होता है । वेग के उत्पन्न होने
पर स्फोट उत्पन्न होता है । यह स्फोट ही ‘नाद’ है । ‘नाद’ से प्रकाश उत्पन्न
होता है । प्रकाश का व्यक्तरूप ही ‘महाबिन्दु’ है । जीव = सृष्टि में उत्पन्न ‘नाद’
ॐकार है । शब्द ब्रह्म (ओङ्कार) से ५२ मातृकाओं का जन्म होता है । इनमें
१. ‘प्रकाश’ २-३. वरिवस्यारहस्यम्

(१) ५० अक्षरम् (२) ५१वीं मातृका (प्रकाशरूपा) (३) ५२वीं मातृका पकाश
का प्रवाह—६वीं ‘जीवनकला’ है । ५० मातृकाएँ लोम एवं विलोम से १०० हैं ।
ये ही १०० मातृकाएँ १०० कुण्डल हैं । इन कुण्डलों को धारण किए हुई
मातृकामयी ‘कुण्डलिनी’ है । सहस्रार चक्र में अव्यक्त नाद है वही आज्ञा चक्र में
आकर ॐकार रूप में व्यक्त होता है । ॐसे उत्पन्न होने वाली ५० मातृकाओं
की अव्यक्त स्थिति का स्थान सहस्रार चक्र है और यही ‘अकुल स्थान’ है । यहीं
शिवशक्ति का स्थान है । ‘शक्ति’ व्यक्त है, ‘शिव’ अव्यक्त है ।
जब कुण्डलिनी उद्बुद्ध होकर ऊपर की ओर बढ़ती है तो उससे ‘स्फोट’ होता
है जिसे ‘नाद’ कहा जाता है । विवरण निम्नानुसार है—कुण्डलिनी का जागरण—
स्फोट (नाद)—प्रकाश—प्रकाश का व्यक्त रूप ‘महाबिन्दु’—(१) इच्छा (सूर्य,
ब्रह्मा), (२) ज्ञान (चन्द्र, विष्णु), (३) क्रिया (अग्नि, शिव) ।
यह ‘नाद’ एवं ‘बिन्दु’ अखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनाहत नाद का व्यष्टि में
व्यक्त रूप है । जो ‘नाद’ अनाहतभाव से समस्त विश्व में सर्वत्र व्याप्त है जब उसी
का प्रकाश व्यक्ति में होता है तब उसे ‘नाद’ कहते हैं । ‘स्फोट’ अखण्ड सत्ता
रूप ब्रह्मतत्त्व का वाचक है । ‘स्फोट’ शब्दब्रह्म है जबकि सत्ता ब्रह्म है । ‘स्फोट’
वाचक शब्द है जबकि सत्ता वाच्य है । यह ‘नाद’ मूलाधार में उदित होता है एवं
सहस्रार में लय हो जाता है ।
गोरक्षसिद्धान्त संग्रह में कहा गया है कि ‘नाथ’ का अंश ‘नाद’ है, नाद का
अंश प्राण है, शक्ति का अंश बिन्दु है एवं बिन्दु का अंश शरीर है । सृष्टि-क्रम
निम्नानुसार है—शिव + शक्ति (प्रकृति) का संयोग—सगुण शिव-शक्ति—परनाद—
परबिन्दु—अपरबिन्दु (-रुद्र) + बीज (-विष्णु) + अपर नाद (-ब्रह्मा) । सोपाधिशिव

  • सोपाधिशक्ति का संयोग—विश्व में विक्षोभ (नाद, परनाद)—विक्षोभ में
    क्रियाशीलता (बिन्दु, परबिन्दु) ।
    नाद + बीज + बिन्दु = इच्छा + ज्ञान + क्रिया । अपरनाद = इच्छा ।
    ‘बीज’ = ज्ञान । अपरबिन्दु = क्रिया ।
    ‘नाद’ की भी अपनी श्रेणियाँ एवं स्तर हैं यथा—(१) नाद ब्रह्मग्रंथि का
    भेदन करने पर ‘शून्य’ में और उसके ऊर्ध्व में (२) विष्णु ग्रंथि का भेदन करने
    पर—‘अतिशून्य’ में, और उसके भी ऊर्ध्व में (३) रुद्र ग्रंथि का भेदन करने पर
    ‘महाशून्य’ में पहुँच जाता है ।
    ‘परमाकला’ नादशक्ति ही है । कुण्डलिनी मूलाधार पद्म में सुषुम्ना के प्रवेश
    द्वार में (ब्रह्मद्वार में) मुख में अपनी पूँछ डालकर पायूपस्थ के मध्यवर्ती चतुरङ्गुल
    प्रमाण योनिकन्द में सो रही है । यह कुलकुण्डलिनी ही मूल नाद शब्दब्रह्म है और
    समस्त मन्त्र उसकी स्वरूप-विभूतियाँ हैं । इसी निमित्त इसे ‘मन्त्रदेवता’ एवं
    (अक्षरमयी होने के कारण) ‘मातृका’ कहते हैं। इसे ही षट्चक्र निरूपमाकार ने
    परमाकला (नाद शक्ति) कहा है—

१०२ वरिवस्यारहस्ये
तन्मध्ये परमा कलातिकुशला सूक्ष्मातिसूक्ष्मा परा । नित्यानन्दपरंपराति- कुशला
पीयूषधाराधरा ।
‘ब्रह्माऽदि कटाहमेव सकलं यद् भासया भासते ।
सेयं श्रीपरमेश्वरी विजयते नित्यं प्रबोधोदया ॥’
व्यापक एवं शिथिल अर्थों में ‘नाद’ शब्द बहुत व्यापक है क्योंकि इसके
भीतर ‘बिन्दु’, ‘अर्धचन्द्र’, ‘रोधिनी’, ‘नाद’, ‘नादान्त’, ‘शक्ति’, ‘व्यापिका’,
‘समना’ एवं ‘उन्मना’ ये सभी आ जाते हैं—
‘बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादनादान्त शक्तयः ।
व्यापिकासमनोन्मन्य इति नादपदाभिधाः ॥’ (पूर्णता प्रत्यभिज्ञा)
समस्त वर्णों में ‘नाद’ ही तो अनुस्यूत है—‘वर्णेषु नादोऽनुस्यूतः ॥’
नादनवक मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपुर-अनाहत-विशुद्धाख्यआज्ञा (चक्रषट्क) एवं नाद,
नादान्त एवं ब्रह्मरन्ध्र तक स्थित है—
‘नाद नवकं मूलाधारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च स्थितम् ॥’२
परमात्मा ने “ईक्षण” किया । ‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ । इस ‘ईक्षण’ का
सम्बन्धं ‘पश्यन्ती’ वाक् से है । इस पश्यन्ती वाक् के वामादिक आठ अवयव हैं
जो कि अष्ट शक्तियाँ हैं । ये व्यष्टि-समष्टि रूप से नौ रूपों में व्यक्त होती हैं उन्हीं
से अविकृत शून्यादिक नौ नाद उत्पन्न होते हैं ।३ इन्हें ही ‘नाद’ एवं ‘ध्वनि’ आदि
कहा जाता है ।४ इन्हीं नौ नादों से अ-क-च-ट-त-प-य-श-ल (वर्ग नवक) वैखरी
मातृका का जन्म होता है ।५
‘नाद’ पद्मराग की कान्ति वाला, दो अण्डों के मध्य वर्तमान सिरा (नाडिका)
की भाँति विराजमान रहता है—‘नादस्तु पद्मरागवद्द्वयमध्यवर्तिनीव सिरा ॥’६ यही है
नाद का आकार—“बिन्दुद्वयान्तरे दण्डःशेवरूपो मणिप्रभः ॥” यह प्रश्वेत मणि के
समतुल्य प्रभास्वर है और इसका आकार दो बिन्दु एवं उसके मध्य खींची गई एक
रेखा के तुल्य है इसका उच्चारण-काल मात्रा का सोलहवाँ भाग है ।
नादोत्पन्न कलायें निम्न हैं—
इन्धिका दीपिका चैव रोचिका मोचिका तथा ।
ऊर्ध्वगामिन्य इत्येताः कला नाद समुद्भवाः ॥७
(१) तारा (२) सुतारा (३) तरणी (४) तारयन्ती (५) सुतारिणी—ये ईशान
कलायें हैं । सदाशिवात्मक ‘नादतत्तव’ से सम्बद्ध हैं । ‘नाद कलायें’ निम्न हैं—(१)
इन्धिका (२) दीपिका (३) रोचिका (४) मोचिका ।
‘नादान्त’—नाद के अनन्तर नादान्त की भूमि आती है । इसकी मात्रा
१/३२ है । नादान्त ही तृतीय शून्य है । नाद एवं नादान्त आचार्यों द्वारा ईश्वर
१-६. प्रकाश .७. नेत्रतन्त्र

प्रथमोंऽशः १०३
पद के रूप में भी स्वीकृत किये गए हैं । इस भूमि में वेद्य का भेद प्रधान है और
समस्त वाचक शब्द अभिन्न रूप में विमर्शन का विषय है । इसके अनन्तर ललाट
में अनाहत नाद ध्वनित होता है । नादान्त अधः शक्ति द्वारा सकल जगत का
उद्भेदन करके ऊर्ध्वशक्ति में समाप्त होता है । यह नाड्याधार एवं ब्रह्मविल में
लीन है—और मोक्ष का द्वार अवरुद्ध करके स्थित है । यह ब्रह्मरन्ध्र में स्थित है ।
नादान्त भी शून्यपद वाच्य है । इस स्थान में नाद एवं चित् सद्भाव में स्थित है ।
नादान्त में काल तो है किंतु आठ लव का है—'नादान्तेऽष्टौलवा' । नादान्त की
कला केवल एक है और वह है 'ऊर्ध्वगा' ॥
परनादात्मक प्रकाशानन्दघन शिव से स्फोटात्मक शब्दब्रह्म अपनी ध्वनि
(अनुरणन) के द्वारा समस्त प्रपञ्च को आपूरित करता हुआ अप्रतिम वेग से सर्वत्र
फैल जाता है । इसी नाद को देवदेवेश सदाशिव कहा जाता है । उपर्युक्त
परनादात्मक शिव को परमेश्वरी परावाक्रूप 'उन्मना' समझना चाहिए तथा इसमें
घण्टा सदृश अनुरणन को 'नादान्त' समझना चाहिए ।¹
बाईं ओर स्थित बिन्दु से युक्त, विद्युत के समान प्रकाशित होने वाला
'नादान्त' हल की भाँति प्रतीत होता है—
'नादान्तस्तडिदाभः सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ॥'²
'ऊर्ध्वाग्रं दक्षिणारं लाङ्गलम् वामभागे बिन्दुरेक नादान्ताकारः ॥'³
'नादान्त' सौदामिनी के समतुल्य प्रभास्वर है । इसका आकार हल के समान
है और इसके वामभाग में एक बिन्दु रहता है । इसका उच्चारण-काल मात्रा का
बतीसवाँ भाग है ।
नादान्त की कलायें निम्नांकित हैं—'ऊर्ध्वगा' (मात्र एक कला है ।) नादान्त
का अवस्थान 'ब्रह्मरन्ध्र' में है । नाद के भीतर भुवनपञ्चक की मध्यवर्ती शक्ति ही
'ऊर्ध्वगा' है । ब्रह्मरन्ध्र की दृष्टि से—(ब्रह्मरन्ध्र सुषुम्ना के ऊपर स्थित है) ब्रह्मरन्ध्र
में 'नादान्त' है जबकि ब्रह्मरन्ध्र के मुख में 'नाद' का स्थान है । नादान्त 'शून्य'
है । 'ब्रह्मरन्ध्र' सुषुम्ना के ऊपर अवस्थित है जबकि 'शक्ति' ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर
अवस्थित है ।
'शक्ति'—नादान्त के अनन्तर स्थित चिद्भूमिस्वरूपिणी, ब्रह्मरन्ध्रो- परिस्थिता,
अनुन्मिषितविश्वगर्भा, विश्वाधारा, कलाचतुष्टयवेष्टिता, व्यापिनीकेन्द्रा इस भूमि का नाम
ही 'शक्ति है । इसकी मात्रा १/६४ है । इसके मध्य में ही आनन्दसत्ता की
अनुभूति होती है । इसके अनन्तर ब्रह्म की सगुण शक्ति के आनन्द का आभास
होता है । शक्ति से उन्मनी पर्यन्त प्रत्येक भूमि द्वादश आदित्यवत् समुज्ज्वल एवं
१. 'प्रसरत्यतिवेगेनध्वनिनापूरञ्जगत् । स नादो देवदेवेशः प्रोक्तश्चैव सदाशिव ॥'
(नेत्रतन्त्र)
२. 'वरिवस्यारहस्यम्' ३. प्रकाश

द्वितीय विश्राम: गायत्री-साधर्म्य, कामकला-स्वरूप एवं कुण्डलिनी सामरस्य

दीप्त है । पृथ्वी तक सभी तत्व, भुवन शक्ति के ही विस्तार है । शक्तितत्व ही
‘निरालम्बपुरी’ या अनाश्रित भुवन है । अनाश्रित भुवन के चतुर्दिक चार शक्तियाँ
हैं—मध्य में अनाश्रित शक्ति अवस्थित है । शिवरूपी अनाश्रित देव के उत्सङ्ग में
अनाश्रिता शक्ति प्रतिष्ठित है । शक्ति में आनन्दमय स्पर्श की अनुभूति होती है ।
‘ब्रह्मरन्ध्र’ सुषुम्ना के ऊपर है जबकि ‘शक्ति’ ब्रह्मरन्ध्र के भी ऊपर स्थित है।
यहीं ऊर्ध्वकुण्डलिनी प्रसुप्त, सर्पाकार एवं ऊर्णान्तन्तु सन्निभ प्रकाश करती हुई स्थित
है । समस्त अनुन्मिषित विश्व इन्हीं के गर्भ में स्थित है और इस प्रकार वे विश्वाधार
हैं । समस्त तत्व एवं भुवन इन्हीं का आश्रय लेकर स्थित हैं । इस भूमि में एक
अव्यक्त आनन्द की अनुभूति होती है । पृथ्वीपर्यन्त तत्व जो कुछ भी प्रसृत है—
अस्तित्व में है—सब ‘शक्ति तत्व’ का विस्तार है ।
शक्ति की कलायें = सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, अमृतसंभवा और व्यापिनी—
ये ही शक्ति की कलायें हैं—
'सूक्ष्मा चैव सुसू

होता है । समना के अनन्तर जो 'उन्मना' है वही`

  • Line 21: 'अमावस्या' है । 'बिन्दु' को पूर्णिमा कहने पर भी उसे पूर्णरूप से पूर्णिमा नहीं
  • Line 22: कहा जा सकता क्योंकि प्रकृत पूर्णिमा षोडशी है पञ्चदशी नहीं । ठीक पूर्णिमा होने
  • Line 23: पर पूर्णता अखण्ड रहती है और उसके अनन्तर कृष्णपक्ष नहीं आता । बिन्दु में
  • Line 24: १५ कलाएँ हैं किन्तु एक कला नहीं है यही कला 'अमृतकला' या 'षोडशी' है ।
  • Line 25: समना अनाश्रित भुवन के ऊपर स्थित है । 'समना' ब्रह्मविल के बाहर अतीत मन
  • Line 26: की भूमि है । इस भूमि में मन है भी और नहीं भी है । नादान्त से इस मन की
  • Line 27: सूचना प्राप्त होती है । 'सूक्ष्म समष्टि मन' नाद में लय हो जाता है—समाप्त हो
  • Line 28: जाता है उसके परे 'अतिमानस' है । 'समना' समस्त कारणों की कारणभूता एवं
  • Line 29: महेश्वर की पराशक्ति है ब्रह्म की चिद्रूप ईसरमशक्ति 'समना' के रूप में अवतरित

१०६ वरिवस्यारहस्ये
बिन्दु का, निरोधिका में अर्धचन्द्र का अर्धांश है और यही क्रम 'समना' तक
चलता है । मात्रा का सूक्ष्म अंश केवल 'समना' तक ही है । 'उन्मना' अमात्र हैं
क्योंकि वहाँ मात्रा नहीं है क्योंकि वहाँ मन ही नहीं है और मन की ही तो मात्रायें
होती है ।
उन्मना तो कालशून्य है किन्तु समना में काल है । 'समना' से जो काल है
उसकी संज्ञा है एकाणुर्लव 'समनायां पुनःकाल एकाणुर्लव संज्ञकः ।'¹ वस्तुतः
'समना' ही सृष्टिव्यापारा है—
“समनासौ निविर्दिष्टा शक्तिः सर्वाध्ववर्तिनी ।
क्रीडीकरोति या विश्वं सहृत्य सृजते पुनः ॥” (नेत्र तन्त्र) ॥
समना की कलायें निम्नांकित हैं—
सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः ।
समना चेति विख्याता एताः शिवकलाः स्मृताः ।
इच्छाशक्तिमधिष्ठाय इच्छासिद्धिप्रदायिकाः ॥
शिव तत्वं समाश्रित्य सुसम्पूर्णार्णवप्रभा ।
अनन्त शक्तिसंस्थानाः सूक्ष्माश्चात्यन्तनिर्मलाः ॥²
'समना' की कलायें—सर्वज्ञा, सर्वगा, दुर्गा, सवना, स्पृहणा, धृति ॥
समना व्योमरूपात्मिका है । इससे शून्य नाम्नी व्यापिनी शक्ति का उदय होता
है । सदाशिव अनाश्रित पदात्मक सम्पूर्ण भावाभासों की भित्ति रूप अशेष मनन,
मन्तव्य मात्रात्मक 'समना' है जो कि उन्मना की स्वस्वरूपगोपन क्रीड़ा के
परिणामस्वरूप स्फुरित होती है ।³ 'समना' का प्रकाश द्वादश आदित्यों के समतुल्य
है । एक सीधी रेखा के ऊपर एवं नीचे बिन्दु स्थापित कर देने से निर्मित होने
वाला आकार ही 'समना' का आकार है इसका उच्चारण-काल २५६वाँ भाग मात्र
है ।
'समना' की आकृति रेखा के ऊपर नीचे स्थित दो बिन्दुओं के समान होती
है—
'ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ॥'³
'बिन्दुद्वयान्तरालस्थऋजुरेखामयी पुनः समना ॥'⁴
'समना' और 'उन्मना' में अन्तर यह है कि ऊपर वाले बिन्दु के बिना
उपर्युक्त समना ही 'उन्मना' है ।⁵ भास्करराय कहते हैं—'सैवोर्ध्वबिन्दुहीनोन्मना'⁶ इसी
उन्मना के ऊपर 'महाबिन्दु' है—'तदूर्ध्व महाबिन्दु ॥'⁷
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. 'वरिवस्यारहस्यम्' ४. प्रकाश
५-७. 'वरिवस्यारहस्यम्'

प्रथमोऽंशः १०७
'उन्मना'—'समना' की ऊर्ध्ववर्ती भूमि ही 'उन्मना' है । उन्मना की मात्रा
१/५१२ है । अन्य आचार्यों की दृष्टि से इसके उच्चारण का काल नहीं है । यहीं
शब्दब्रह्मरूपी परम नाद का अन्त है । यही पञ्चम शून्य भी है और नव नादों में
नवम भूमि है । यह भूमि मन के अतीत है । मन के नहीं रहने से नाद भी नहीं
रहता एवं नाद के नहीं रहने से मन भी नहीं रहता । जब तक नाद का अन्त नहीं
होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना में नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना
में काल नहीं है किन्तु फिर भी उन्मना परम तत्व नहीं है क्योंकि उन्मना में भी
नाद का आत्यन्तिक लय नहीं है । उन्मना में कला का अभाव है तथापि नहीं
रहते हुए भी रहती है । इसकी स्थिति इसी प्रकार की है यथा—असम्प्रज्ञात समाधि
में चित्त वृत्ति रूप में नहीं रहता किन्तु तो भी रहता है । अर्थात् संस्कार रूप में
रहता है । समना में सूक्ष्ममन की विद्यमानता है किन्तु उन्मना में नहीं है, केवल
संस्कार है ।
नाद-श्रवण की दृष्टि से स्थिति इस प्रकार है—
(क) आवरणवशात् नाद न सुनाई देने पर-क्षिप्त, विक्षिप्त या मूढ़ दशा ।
(ख) नाद का श्रुतिगोचर होने पर-एकाग्रावस्था या ज्ञानावस्था ।
(ग) नाद-श्रवण के स्थगित होने पर-चित्त की निरोधावस्था ।
(इस अवस्था में मन की वृत्ति नहीं रहती संस्कारमात्र रूप में मन विद्यमान
रहता है । जब यह संस्कार भी नहीं रहता तब चिन्मात्र या शुद्ध आत्मा की
रूपस्थिति हुआ करती है ।)
जब तक नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्त्व बोध नहीं होता । नादान्त
ही नहीं शक्ति एवं समना में भी नाद का अन्त नहीं होता । शाक्त योगियों के मन
में तो उन्मना में भी नाद का अन्त नहीं होता । उन्मना का भेदन करने के
अनन्तर उन्मना की ऊर्ध्व भूमि में ही 'नाद' का लय हो पाता है । और तभी
तत्वबोध या आत्मसाक्षात्कार संभव हो पाता है । उन्मनापर्यन्त समस्त मन्त्रावयव
१०८१७ बार उच्चारित होने पर नाद का अन्त एवं तत्वज्ञान का उदय हो पाता
है तथा परमपद की सम्प्राप्ति हो पाती है । ६ शून्य, ५ अवस्था एवं ७ विषुव के
कोलाहल से अतीत भूमि में ही विश्व की परम विश्रान्ति भूमि एवं परमानन्दस्वरूप
'परमपद' स्थित है । उन्मनापर्यन्त नाद के चिन्तन को 'कालविषुव' कहते हैं और
उसके अनन्तर 'तत्वविषुव' है । 'नाद' तत्व का अभिव्यञ्जक तो है किन्तु जब तक
नाद का अन्त नहीं होता तब तक तत्वबोध नहीं होता । उन्मना के भेदन के बाद
ही नाद अन्त हो पाता है अतः स्पष्ट है कि उन्मनी में तत्वबोध नहीं हो पाता
अतः उन्मनी 'परमपद' नहीं माना जा सकता ॥
'उन्मना' वह प्रदेश है जहाँ न मन है, न मात्रा है, न काल है, न देश है,
न देवता है; न प्रपञ्च का कोई अंश है । यह विशुद्ध चिदानन्दभूमि है । यही परम
लक्ष्य है ।

१०८ वरिवस्यारहस्ये
मन्त्र शास्त्र की दृष्टि से प्रणव के द्वादशावयवों में 'उन्मना' अंतिम अवयव
है। जप विज्ञान एवं योग विज्ञान की सीढ़ी का अंतिम सोपान 'उन्मना' ही है—
साधना की अंतिम मंजिल उन्मना ही है क्योंकि उसके ऊपर तो साधना की गति
ही नहीं केवल साध्य मात्र का अवस्थान है।
'उन्मना' तक की यात्रा प्रत्येक साधक का कर्तव्य है क्योंकि उन्मना पद के
पूर्व तक मनोराज्य है और वह शुद्धाशुद्ध रूप में स्थित है। उसका अशुद्ध भाग
मायात्मक एवं विशुद्ध भाग शुद्धमायात्मक या योगमायात्मक है। उसके अशुद्ध भाग
में प्रणव के अवयवत्रय—अकार, उकार एवं मकार (स्थूल-सूक्ष्म-कारण, जाग्रत,
स्वप्न, सुषुप्ति) स्थित है और विशुद्ध भाग में बिन्दु—अर्धचन्द्र, निरोधिका, नाद,
नादान्त, शक्ति, व्यापिनी एवं समना स्थित है। और इनके अनन्तर सबसे अतीत
'उन्मना पद है जो मनोराज्य से अतीत है।
उन्मना में न तो मात्रा है और न तो काल है—“अमात्रमुन्मना शक्ति
कालस्तत्र न विद्यते ।।” उन्मना 'परमाशक्ति' है और शिवरूपिणी है—
'सा शक्तिः परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्व मात्रमात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते सदा ॥' १
वस्तुतः परविमर्शमयी अहन्तकरसा पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति ही 'उन्मना' है
जो कि स्वरूप गोपनक्रीड़ोत्सुका होकर 'समना' के रूप में स्फुरित होती है ।२
एक प्रश्न उठता है कि क्या मन की अन्तिम सीमा 'बुद्धि' के पूर्व तक ही
है और उसके बाद उसका प्रसार नहीं है क्योंकि श्रुति में कहा गया है—'मनसस्तु
परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान परः ।।' वस्तुतः ऐसा नहीं है क्योंकि मन 'समना' तक
है। उपर्युक्त वेदा श्रुति-वाक्य मात्र अन्तःकरण के अवयव रूप मन की ओर इंगित
कर रहा है जिसके चार अवयव हैं—(१) 'मन' (२) 'बुद्धि' (३) 'चित्त' (४)
'अहङ्कार'। 'योग' एवं तन्त्रशास्त्र में विवेचित मन के इस सूक्ष्मतम एवं व्यापक
स्वरूप की ओर उसका सङ्केत नहीं है।
उन्मना का उच्चारण-काल मात्रा का ५१२वाँ भाग है। अन्य आचार्यों ने
कहा है कि उन्मनी कला मन से अतीत होने के कारण आकार-शून्य है। 'विज्ञान
भैरव' के ४२वें श्लोक में 'शून्या' शब्द से 'उन्मनी' को ही अङ्गीकृत किया गया
है। आचार्य भास्करराय ने 'समना' एवं 'उन्मना' का उच्चारण-काल मात्रा का
२५६वाँ भाग ही स्वीकार किया है। योगी अमृतानन्द ने उन्मना को निराकारा एवं
निरुच्चारा माना है। 'उन्मना' अतीत मन के भी अतीत हैं। नौ नादों में यह
नवम् नाद है ।३
१. नेत्रतन्त्र २. स्वच्छन्दोद्योत
३. बिन्दु में जिस नाद समूह की सूचना मिलती है 'उन्मना' में उसका अन्त हो
जाता है।