वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ९१
'हल्लेखा' 'ह्रीं' (ह, र, ई एवं अनुस्वार) की भी द्योतिका है। 'हल्लेखा'
का ऊर्ध्व बिन्दु 'बिन्दु' है। १ प्रथम कूट में जो हल्लेखा है उसके अन्तर्गत ही
'कामकला' है। उसमें गुरुमुखैकवेद्या जो सर्पयोग मार्ग के अनुसार 'षडदल कमल'
के ऊपर मूलाधार और उसके ऊपर शक्ति या 'हल्लेखा' का स्थान है। यह
अनङ्गादि देवताओं से परिवेष्टित है और आधार कमल से ढाई अङ्गुल ऊपर नील
वर्ण की कर्णिका के भीतर प्रतिष्ठित है। 'हल्लेखा' से दो अङ्गुल ऊपर स्वाधिष्ठान
कमल का स्थान है। इसके बाद क्रमशः मणिपूर, अनाहत, 'विशुद्ध', लम्बिकाग्र
(अष्टदल कमल) और अन्त में आज्ञाचक्र है। आज्ञाचक्र के ऊपर बिन्दु से उन्मना
पर्यन्त प्रणव की भूमिकाओं के रूप में निम्न भूमियाँ स्थित हैं—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र,
निरोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका (यापिनी) समना और उन्मना। २ आचार्य
शङ्कर ने 'हल्लेखा' की व्याप्ति के विषय में इस प्रकार लिखा है—
'सचराचरस्य जगतो मूलत्वान् मूलताऽस्य बीजस्य ।।' और 'हल्लेखा' के ज्ञान
का फल इस प्रकार निरूपित किया है—यां ज्ञात्वा सकलमपास्य कर्मबंधं, तद्विष्णोः
परमपदं प्रयाति लोकः । तामेतां त्रिजगति जन्तुजीवभूतां, हल्लेखां जपत इति
नित्यमर्चयीत् ।।३
'स्वच्छन्द संग्रह' में 'हल्लेखा' का इस प्रकार विवरण प्रस्तुत किया गया है—
'आधारपङ्कजस्योर्ध्वं सार्द्धद्वयङ्गुले कोपरि। तैजसं साष्टपत्रञ्च पीतकर्णिकया युतम्।
हल्लेखाकर्णिका मध्ये स्थितानङ्गादि देवता। एतस्माद द्वयङ्गुलादूर्ध्वे स्वाधिष्ठानं
षडरकम् ।'४
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│ प्रणव के बारह अवयव │
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१ २ ३ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९
अ उ म बिन्दु अर्द्धचन्द्र रोधिनी नाद नादान्त शक्ति व्यापिनी समना उन्मना
┌ १. जाग्रत् ┐ └───────────────────────────────────────────────────┘
│ २. स्वप्न् │ (३ अवयव) (९ अवयव)
└ ३. सुषुप्ति ┘
(तुरीय एवं तुरीयातीत अवस्थाओं के द्योतक ३ + ९
= १२ अवयव = प्रणवावयव ॥)
द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम, द्वादश—ये छः अवयव 'शून्य' कहलाते हैं।
१. गोपीनाथ कविराज—'भारतीय संस्कृति और साधना'; (पृ० ४०)
२. तत्रैव; (पृ० ३३६) ३. प्रपञ्चसारतन्त्र (चतुर्थ पटल)
४. स्वच्छन्दतन्त्र