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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

प्रथमोंऽशः ६९
(३) 'वरेण्यं' = (वृञ् वरणे)—प्रार्थनीय श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान को जीव प्राप्त करता
है।
(४) 'भर्गो देवस्य' = अज्ञान का भर्जन (विनाश) होता है।
(५) 'धीमहि' = विनाश के बाद जीवन्मुक्ति काल में ध्यानादि साधन
अपनाये जाते हैं। तत्पश्चात्—
(६) 'धियः' = आत्मतत्त्व विषयक चरम साक्षात्काररूप बुद्धि होती है। और
इसके बाद अभेदभाव से परमात्म प्राप्ति रूप मोक्ष होता है। वह परमात्मा कौन
है?
(७) 'यो नः प्रचोदयात्'—(१) जो हमारा सबका अन्तर्यामी प्रेरक है वह
परमात्मा। (२) न्यायदर्शन के अनुसार—सृष्टि की आरम्भावस्था में प्राणियों के
अदृष्टवश परमाणु में आद्य क्रिया प्रारंभ होती है—फिर 'यो नः'—(यूमिश्रणे)—
परमाणु द्वय आदि का मिश्रण होता है। फिर—'धियः' = आत्मा-मन एवं
बुद्धि-संयोग पूर्वक सांसारिक बुद्धिः सांसारिक भोगादि होते हैं। फिर—'धीमहि' =
अर्थात्—ध्यानादि साधनों द्वारा तत्वविषयक धी (ज्ञान) की प्राप्ति होती है।
'अदेवस्य भर्गो'—अज्ञान का भर्जन। 'वरेण्यं' = (मिथ्या ज्ञान के विनाश के
बाद वरेण्य अपवर्ग की प्राप्ति होती है ।) अपवर्ग क्या है? 'सवितुः'—कर्त्तास्वरूप
आत्मा की। 'तत्' = एकविंशति दुःख का अत्यन्त ध्वंस रूप अकर्तृत्व अवस्था।
(३) योगदर्शन के अनुसार गायत्रीमन्त्र की सार्थकता एवं एकात्मता—'प्रचोदयात्'
= कुण्डल्योत्थापन क्रिया में कुण्डलिनी-समुत्थान से लेकर षट्चक्रभेदनपूर्वक सहस्रार
कमल विकास पर्यन्त निःशेष क्रिया-कलाप, प्र + चुद् धातु से सङ्केतित है।
सारांश—सविता (क्लेश आदि से अस्पृष्ट परमात्मा) हमारी बुद्धि को शुभ
योग की क्रिया की ओर प्रवृत्त करे। आदि ॥
'गायत्री' सर्वात्मक है—'गायत्री' चतुर्विंशत्यक्षरात्मक मन्त्र एवं उससे बोधित
देवता का ही वाचक नहीं है—'गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च' (छा०)
'गायत्रीपुरश्चरण' में एकता का विधान भी है। उपासना के प्रसङ्ग में—'मन्त्र गुरु
देवतात्मकत्वेनात्मानं भावयन् यथाशक्ति गायत्री जपसमर्थः ॥'
गायत्री ब्रह्म की हृदय में उपासना—गायत्रीब्रह्म हृदयाकाश में ध्येय है—
योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्तिपूर्णमप्रवर्तिनीं श्रियं लभते य एवं वेद ॥'
(उपनिषद)
गायत्री की अङ्गोपासना—चिदाशाकाशस्वरूप स्वयंज्योति गायत्री ब्रह्म की
उपासना के अङ्गरूप द्वारपालों की उपासना। (छान्दोग्यो०)
गायत्री ब्रह्मभवनरूप हृदय के ५ सुषि (छिद्र) हैं—
(१) पूर्वाभिमुखी पुरुष के हृदय का पूर्व छिद्र रूप द्वार—इसका द्वारपाल
प्राण है, वही चक्षु है, वही आदित्य है। प्राणरूप तेज का ध्यान—

७० वरिवस्यारहस्ये
तेजस्वी, अन्नाद ।
(२) दक्षिण सुषि = द्वारपाल—व्यान है । वही श्रोत्र एवं चन्द्रमा भी है ।
उसका श्री एवं यश रूप से चिन्तन→श्रीमान, यशस्वी ।
(३) पश्चिम सुषि = द्वारपाल—अपान है । वही-वाग एवं अग्नि है इस
अपान का ब्रह्मवर्चस एवं अन्नाद्य रूप से चिन्तन→वह व्यक्ति ब्रह्मवर्चस्वी
एवं अन्नाद हो जाता है ।
(४) उत्तर सुषि = द्वारपाल-समान है । वही मन एवं पर्जन्य दोनों है । समान
का कीर्ति एवं व्युष्टि (अपरोक्ष यश) के रूप में ध्यान→कीर्ति + व्युष्टि ।
(५) ऊर्ध्व सुषि = द्वारपाल = उदान वायु । वही वायु एवं आकाश है,
इसका ओज एवं महः रूप से चिन्तन→ओजस्वी एवं महान हो जाता
है ।
तस्या रूपद्वितयं तत्रैकं यत् प्रपठ्यते ऽस्पष्टम् ।
वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ॥ ७ ॥
(गायत्री के दो रूप)
उस (गायत्री) के दो रूप हैं । उनमें एक अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
(वह) चारों वेदों में भी अत्यन्त एवं परम गोपनीय है ॥ ७ ॥

  • प्रकाश *
    तस्या गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति पदच्छेद आवृत्त्या । चरणत्रयम् 'तत् सवितुः'
    इत्यादि स्पष्टम् । 'परोरजसे सावदोम्' इति चतुर्थचरणं त्वस्पष्टमित्यर्थः । परं
    श्रीविद्याख्यं द्वितीयं रूपम् ॥ ७ ॥
  • सरोजिनी *
    तस्याः = उस गायत्री के । रूपद्वितयं = दो रूप हैं । तत्रैकं = उनमें से
    एक । यत = जो, जिसे । प्रपठ्यतेऽस्पष्टम् = अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
    यहाँ विचारणीय बिन्दु यह है कि यदि दो रूपों में एक अस्पष्ट है तो दूसरा स्पष्ट
    होगा । इसीलिए भास्करराय कहते हैं—'तस्याः गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति ।।' वे
    कहते हैं कि इनमें से 'तत्सवितुः' इत्यादि तो सुस्पष्ट है किन्तु चतुर्थ चरण अस्पष्ट
    है । वेदेषु चतुर्ष्वपि = चारों वेदों में भी । परम—भास्करराय 'परम्' का अर्थ
    'श्रीविद्या' समझते हैं—'परं श्री विद्याख्यं द्वितीयं रूपं' अर्थात् गायत्री का जो दूसरा
    रूप है वह श्रीविद्या है । वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयम् का दूसरा अर्थ यह
    होगा—'चारों वेदों में भी पर विद्या (श्रीविद्या) अत्यन्त गोपनीय है ।' इस पर विद्या
    (पञ्चदशाक्षरी मन्त्र) का स्वरूप निम्नांकित है—'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल
    ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं ॥'

प्रथमोऽंशः ७१
गायत्री को पञ्चमुखी कहा गया है—(१) गायत्री के पाँच मुख—(क) ॐ
(ख) भूर्भुवः स्वः (ग) तत्सवितुर्वरेण्यम् (घ) भर्गो देवस्य धीमहि (ङ) धियो यो नः
प्रचोदयात् ।। या (१) ४ वेद (२) यज्ञ ।।
गायत्री का स्वरूप—गायत्री के पाँच मुख हैं ।
गायत्री के चरण एवं देवता—(१) गायत्री का प्रथम चरण—ब्रह्मा, (२)
गायत्री का द्वितीय चरण—विष्णु, (३) गायत्री का तृतीय चरण—महेश । (ये देवता
गायत्री के प्रमुख शक्ति पुञ्ज हैं ।)
महर्षि उद्दालक ने इसी गायत्री विद्या की प्राण-प्रतिष्ठा की थी । गायत्री मन्त्र
के पञ्चमुखों के प्रतिकार्थ—(१) चार वेद एवं यज्ञ (२) पञ्चतत्त्वात्मक जगत् एवं
स्वदेह से पृथक् अपने को आत्मसंवित समझने का सङ्केत (३) आत्मा पर चढ़े
पञ्चकोशों से भी अपने को पृथक् समझने का सङ्केत ।
(१) पाँच कोश (२) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (३) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (४) पाँच प्राण
(५) पाँच उपप्राण (६) पाँच तन्मात्रायें (७) पाँच विषय (८) पाँच महाभूत (९)
पाँच यज्ञ (१०) पाँच अवस्था (११) पाँच शूल (१२) पाँच क्लेश (१३) भगवान्
शिव के पाँच मुख (१४) पाँच आकाश आदि विभिन्न पञ्चकों का प्रतिकार्थ अत्यन्त
रहस्यमय हैं ।
'पञ्चस्यास्यास्तु गायत्र्याः विद्यां यस्त्ववगच्छति ।'
गायत्री का महत्त्व—'गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यानमुच्यते । सिद्धि जनानां
सा माता नातः किंचिद् बृहत्तरम् ॥'१
गायत्री में स्थित नौ पद—(१) तत् (२) सवितुः (३) वरेण्यं (४) भर्गो (५)
देवस्य (६) धीमहि (७) धियो (८) यो नः (९) प्रचोदयात । (इसीलिए यज्ञोपवीत
में ९ सूत्र होते हैं । यज्ञोपवीत में तीन ग्रंथियाँ ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि एवं रुद्रग्रंथि—
इन देवों के प्रतीक है । यज्ञोपवीत गायत्री का एवं द्विजत्व का प्रतीक है । बड़ी
ग्रंथि ॐ की एवं तीन शेष ग्रंथियाँ भूः भुवः स्वः की प्रतीक हैं ।
'भूः' = अन्नमय कोश । 'भुवः' = प्राणमय एवं मनोमय कोश । 'स्वः' =
विज्ञानमय-आनन्दमय कोश । (सृष्टि के तीन स्तर = पृथ्वी, पाताल,
स्वर्ग । साधना के पिण्ड गत तीन स्तर—भूः, भुवः, स्वः) गायत्री 'त्रिपदा' कही
गई है ।२
गायत्री का निर्गुण ध्यान—'गायत्रीहृदय' में कहा गया है—'आत्मान आकाशो
भवति, आकाशाद्वायुर्भवति, वायोरग्निर्भवति, अग्नेरोंकारो भवति, ॐकाराद् व्याहति-
१. गायत्री लहरी, गायत्री मञ्जरी ।
२. गायत्री के तीन पाद या चरण—(१) 'भूः'—भूक्षेत्रीय (२) 'भुवः'—
पाताललोकीय (३) 'स्वः'—स्वर्ग एवं स्वर्गोपरि से सम्बद्ध । (१) 'भूः'—में
मन्त्रदीक्षा (२) 'भुवः'—में अग्नि दीक्षा (३) 'स्वः'—में ब्रह्म दीक्षा ।

७२ वरिवस्यारहस्ये
र्भवति, व्याहृतितो गायत्री भवति, गायत्र्याः सावित्री भवति, सावित्र्याः सरस्वती भवति,
सरस्वत्या वेदा भवन्ति, वेदेभ्यो लोकाः ॥१
सम्पूर्ण लोकों का वेदों में, वेदों का सरस्वती में, सरस्वती का सावित्री में,
सावित्री का गायत्री में, गायत्री का व्याहृतियों में, व्याहृतियों का ओंकार में,
ओंकार का अग्नि में, अग्नि का वायु में, वायु का आकाश में एवं आकाश का
ब्रह्मस्वरूप अपनी आत्मा में लय करने का ध्यान करें । 'सर्वमस्मीत्युपासीत तद्
व्रतम् तद् व्रतम् ॥'२
गायत्री का स्वरूप—'गायत्री पुरश्चरण पद्धति' नामक ग्रन्थ में ऋषि
याज्ञवल्क्यं ब्रह्मा से गायत्री के गोत्र, अक्षर, पाद, शिर एवं कुक्षि के विषय में
प्रश्न करते हैं । ब्रह्माजी का उत्तर निम्नांकित है—
(१) गायत्री का गोत्र = सांख्सायन । (२) गायत्री के वर्ण = बत्तीस ।
(३) गायत्री के पाद = चार, अन्त के पाद की गणना न होने के कारण गायत्री
त्रिप

प्रथमोऽंशः ७३
'य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम् तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ । स लोके न
प्रणश्यति ।'१ मनुस्मृतिकार कहते हैं कि—एक अक्षर, मात्र परब्रह्म है, परमतप मात्र
प्राणायाम है, परात्पर मात्र सावित्री है एवं सत्य मात्र मौन है—क्योंकि उसी से
उसकी उत्कृष्टता है—'एकाक्षरं परब्रह्म प्राणायामः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति
मौनात्सत्यं विशिष्यते ।'२ 'पद्मपुराण' में गायत्री-जाप को सर्व-पाप-विनाशक कहा
गया है—'ब्रह्महत्यादि पापानि गुरूणि च लघूनि च । नाशयत्यचिरेणैव गायत्री जापको
द्विजः ।।३
आचार्य शङ्कर ने 'प्रपञ्चसार तन्त्र' में गायत्री की विशद व्याख्या की है—
(१) गायत्री 'चतुर्विंशत्यक्षरात्मक'४ है । इसीलिए शङ्कराचार्य कहते हैं—
'चतुर्विंशतितत्त्वभेदैः ।'५
(२) यह वेदों का सार है—'अन्वर्थकं मन्त्रमिमन्तु वेदसारं पुनर्वेदविदो
वदन्ति ।।'६
(३) तार एवं व्याहृति आदि के साथ ही इस पराशक्ति गायत्री की उपासना
की जानी चाहिए—'तार व्याहृतिसंयुता सहशिरो गायत्र्युपास्या परा ।'७
(४) सप्त व्याहृतियों का सम्बन्ध (क) भूलोक (ख) भुवर्लोक (ग) स्वर्लोक
(घ) महर्लोक (ङ) जनलोक (च) तपलोक (छ) सत्यलोक—इन सातों लोकों से
है—'सभूर्भुवः स्वश्च महोजनस्तपः समन्वितं सत्यमिति क्रमेण ।'८
(५) गायत्री में प्रयुक्त प्रणव 'ॐ' के दो रूप हैं—१. निर्गुण २. सगुण ।९
आचार्य भास्कर के कथनानुसार—'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा
मातरिश्वाऽभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया च, पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या ।।' यह
ऋचा गायत्री मन्त्र को प्रकट करती है । इस ऋचा में पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का उद्धार
भी निहित है । यह ऋचा आदि विद्या गायत्री की उद्धारिका है । यह कामराजो-
पासिता (कादि) विद्या का मन्त्र है । उक्त मन्त्र का रहस्यार्थ निम्नांकित है—
'काम' (क), 'योनि' (ए), 'कमला' (ई), 'वज्रपाणि' (इन्द्र = ल), 'गुहा'
(ह्रीं), ह, स, मातरिश्वा—वायु (क), अभ्र—आकाश (हा) इन्द्र (ल), गुहा (ह्रीं),
स क ल, माया (ह्रीं) ।।
सारांश—'क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं' (पञ्चदशाक्षरी
मन्त्र) ।।
१. महाभारत (भीष्मपर्व अ० १४।१६) २. मनुस्मृति ।
३. पद्मपुराण 'ऐहिकामुष्मिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत् (अग्नि पु०) सर्वपापानि
नश्यन्ति गायत्री जपतोन्नृप । (भवि०पु०)
४. प्रपञ्चसार विवरण (पद्मपादाचार्य) ५-८. प्रपञ्चसार तन्त्र
९. प्रपञ्चसार विवरण

७४ वरिवस्यारहस्ये
इस ‘पञ्चदशाक्षरी विद्या’ में तीन कूट विद्यमान हैं—
(१) ‘वाग्भव कूट’ = १८ वर्ण ⎤ योग = ५८ वर्ण ॥
(२) ‘कामराज कूट’ = २२ वर्ण¹ ⎥ ‘संहत्याष्टपञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्या’
(३) ‘शक्ति कूट’ = १८ वर्ण² ⎦ (भास्कर राय-‘प्रकाश’)
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯
५८
(१) क ए ई ल ह्रीं = (वाग्भव कूट) — ‘कादिविद्या’
(२) ह स क ह ल ह्रीं = (कामराज कूट) — ‘हादिविद्या’
(३) स क ल ह्रीं = (शक्ति कूट) — ‘सादिविद्या’
मनु, चन्द्र कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, शिव, दुर्वासा आदि के सम्प्रदायों में से
अब मात्र (१) ‘कामदेव (मन्मथ)’ एवं (२) ‘लोपामुद्रा’ सम्प्रदाय ही अवशिष्ट रह
गए हैं । इन दोनों में भी ‘मन्मथ सम्प्रदाय’ अधिक प्रचलित है । ‘कामराज-विद्या’
(१५ अक्षर वाली) के दो भेद हैं—(क) शाक्त (ख) शांभव । शाक्त
कामराज-विद्या—ऊर्ध्वाम्नाय से सम्बद्ध है और कीलित नहीं है । जबकि शांभव
कामराज-विद्या पूर्वाम्नाय से सम्बद्ध है तथा सदोष है । ‘लोपामुद्रा विद्या’ भी १५
अक्षरों वाली है और यह द्विभेदात्मक है—(१) शाक्त (२) शाम्भव ।
(१) मनु द्वारा उपासित श्रीविद्या—१८ वर्ण । (२) दुर्वासोपासित विद्या के
वर्ण—१३ वर्ण । (३) चन्द्र एवं कुबेर से उपासित श्रीविद्या—२२ वर्ण । (४)
कहीं-कहीं इन्द्र एवं अग्नि के स्थान पर नन्दी एवं विष्णु के सम्प्रदाय का उल्लेख
मिलता है । (५) बह्वचोपनिषद् में जिस ‘कादि’ ‘हादि’ एवं ‘सादि’ विद्याओं का
उल्लेख किया गया है इसका सम्बन्ध शांभव विद्या से है ।³
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र एवं उसका स्वरूप—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र—क ए ई ल ह्रीं ।
ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं (१५ वर्ण) ॥
मन्त्रावयव—(१) ३ ककार (२) १ एकार (३) १ ई (४) ३ लकार (५)
३ ह्रींकार (६) २ हकार (७) २ सकार (८) ह्रीं में—ह, र, ई, बिन्दु । ‘ह्रीं’—
ह, र, ई, बिन्दु । ‘ह्रीं’—ह, र, ई बिन्दु । (सामान्य गणनानुसार २७ वर्ण या
मातृकायें) पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के तीन विभाग (१) वाग्भव कूट (२) कामराज कूट
(३) शक्ति कूट ।
(१) प्रथम कूट = १८ वर्ण ⎤ ‘एवं च प्रथम-तृतीय कूटे अष्टादश
(२) द्वितीय कूट = २२ वर्ण ⎥ वर्णात्मके । मध्यमकूटं तु चतुरधिकम
(३) तृतीय कूट = १८ वर्ण ⎥ संहत्याष्ट पञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्येति
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ⎥ सिद्धम् ॥’
५८ ⎦
१. भास्करराय प्रथम तृतीय कूटे अष्टादशवर्णात्मके । (प्रकाश)
२. मध्यमकूटं तु चतुरधिकम्
३. गोपीनाथकविराजः ‘योगिनीहृदय की भूमिका’ (Preface to the 2nd edition)

प्रथमोँऽशः ७५
'हल्लेखा' 'ह्रीं' के अन्तर्गत (१) व्योम, (२) अग्नि, (३) वामलोचना (ई),
(४) बिन्दु (.), (५) अर्धचन्द्र, (६) रोधिनी, (७) नाद, (८) नादान्त, (९)
शक्ति, (१०) व्यापिका, (११) समना, (१२) उन्मनी ॥ (ह्रींकार के १२
अवयव) ॥ 'नाद' किसे कहते हैं? 'बिन्दु', 'अर्धचन्द्र', 'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त',
'शक्ति', 'व्यापिका', 'समना' एवं उन्मनी—इस नव के समूह को नाद कहते हैं—
'बिन्दादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ॥'
'बिन्दु विनिर्मुक्तानामष्टा नामेव नाद संज्ञा मन्त्र शास्त्रे तथापि व्यवहार सौकर्याय
तत्सहितानामेव सात्र कृता इति ध्येयम् ।१ यद्यपि बिन्दु को छोड़कर शेष अङ्गों को
ही 'नाद' कहा जाता है किन्तु-व्यवहार-सौविध्य के लिए उसे भी नाद में (यहाँ)
अन्तर्भुक्त कर लिया गया है ।
(क) १८ वर्ण कूट 'वाग्भव कूट'—१. क् + २. अ ('क'), योनि।
कोणत्रय ३. ('ए'), लक्ष्मी ४. ('ई'), ५. ल् + ६. अ ('ल') । 'ह्रीं' के १२
अवयव = ६ + १२ = १८ अवयव ॥
(ख) २२ वर्ण कूट 'कामराजकूट'—(१) ह + अ ('ह') (२) स + अ
('स') (३) क + अ ('क') (४) ह + अ ('ह') (५) ल् + अ ('ल') = १०
एवं 'ह्रीं' के १२ अवयव = १० + १२ = २२ अवयव ।
(ग) १८ वर्ण कूट 'शक्ति कूट'—'स्' + अ = ('स'), (२) क् + अ
('क') (३) ल् + अ ('ल') = ६ एवं 'ह्रीं' के १२ अवयव = ६ + १२ =
१८ अवयव । 'वाग्भव कूट' के १८, कामराजकूट के २२ अवयव एवं शक्ति कूट
के १८ अवयव = १८ + २२ + १८ = ५८ अवयव ।
सारांश—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में ५८ वर्ण हैं—(प्रथमेऽष्टादश वर्णा द्वाविंशति-
रक्षराणि मध्ये स्युः । प्रथमेन तुल्यमन्त्यं संघाते नाष्टपञ्चाशत ।')२
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का अर्थ—'कादि' 'हादि' एवं 'सादि' ये तीन प्रकार की
विद्यायें भी बहुचर्चित हैं । 'योगिनीहृदय' 'तन्त्रराजतन्त्र' 'मातृकार्णव' 'त्रिपुरार्णव'—
'कादि मत' के ग्रन्थ हैं ।३ भास्करराय ने भावनोपनिषद की टीका में 'योगिनीहृदय'
को 'कादिमत' का कहकर भी 'वरिवस्यारहस्यम्' में 'योगिनीहृदय' की हादि मत के
अनुकूल व्याख्या स्वीकार की है ।
यद्यपि तन्त्रराजादौ सौन्दर्यलहर्यां चं हादिविद्याया एव प्रथममुद्धारो दृश्यते, तथापि
'श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तत्र कादिर्र्यथा परा' इति वचनात्, षोडशीघटकत्वाच्च,
'यदक्षरैकमात्रेऽपि', 'यदेकादशमाधारम्' इत्यादिरहस्यार्थप्रतिपाद्याक्षरशालित्वाच्च,
त्रिंशत्यामस्या एवादराच्च, त्रिपुरोपनिषद्येतन्मूलकत्वेनैवान्यासासुद्धाराच्च, योगिनीहृदया-
दावुक्तानामिहापि वक्ष्यमाणानामर्थनामत्रैव स्वारस्याच्च, शाङ्खायनश्रुतौ 'चत्वार ईं
१. भास्करराय—'प्रकाश' २. 'वरिवस्यारहस्यम्'
३. 'मनोरमा', भास्करराय—भावनोपनिषद की टीका में ।

७६ वरिवस्यारहस्ये
बिभ्रति' इत्यस्यामृचि च प्रथममस्या एवोद्धाराच्च कादिविद्यायाः प्राधान्यमिति
१द्योतयंस्तस्याः प्रतीकमादत्ते—
कामो योनिः कमलेत्येवं २साङ्केतिकैः शब्दैः ।
व्यवहरति न तु प्रकटं यां विद्यां वेदपुरुषोऽपि ॥ ८ ॥
(श्रीविद्या की गोपनीयता)
जिस विद्या को वेद पुरुष भी 'कामो योनिः कमला' इस प्रकार के सांकेतिक
शब्दों द्वारा (प्रतीकात्मक रीति से) व्यवहृत करता है न कि प्रकट रूप से (वही यह
परमगोप्या श्रीविद्या है ।) ॥ ८ ॥

  • प्रकाश *
    'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
    पुनर्गुहासकला मायया च पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या ॥'
    इति शाङ्खायनश्रुतिः । कामो मातरिश्वा च ककारः । योनिरकारः । कमला
    तुरीयः स्वरः । वज्रपाणिरिन्द्रश्च लकारः । गुहाद्वयं माया च लज्जाबीजम् । हसेति
    सकलेति च स्वरूपम् । गुहया सह समासाद्बहुवचनं न पुनः सकारो दीर्घः । एवं
    लकारोऽपि । अभ्रं हकारः । एतादृशैः साङ्केतिकैः शब्दैर्व्यवहारादत्यन्तगोपनीयत्वं
    समर्थितं भवति ॥ ८ ॥
  • सरोजिनी *
    कामो = क । न तु प्रकटं—न कि प्रकट रूप से । प्रकट रूप से क्यों
    नहीं ? 'मन्त्र' स्वयं शिव हैं । यथा किसी व्यक्ति का नाम लेने से वह व्यक्ति स्वयं
    सम्मुख उपस्थित हो जाता है उसी प्रकार मन्त्र-प्रयोग से मन्त्र का देवता प्रकट हो
    जाता है अतः—'तस्माद् मन्त्र महासेन रहस्यं न प्रकाशय ।' (वातुल० तन्त्र)
    योनी = एकार । कमला = तुरीय स्वर—'ई'। वज्रपाणि = इन्द्र । लकार ।
    गुहाद्वय = माया एवं लज्जाबीज । अभ्र = नभ । हकार ।
    कामो योनिः कमला—यह वाक्यांश निम्न श्लोक का प्रारंभिक अंश है—
    'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया
    च पुरुच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् । कामो = क, योनिः = ए, कमला = ई,
    वज्रपाणि = इन्द्र अर्थात् 'ल', गुहा = ह्रीं, ह, स—दो वर्ण, मातरिश्वा = वायु
    अर्थात् 'क', अभ्र = आकाश अर्थात् 'ह', 'इन्द्रः' (शतक्रतु) = 'ल', पुनः 'गुहा'
    (गुफा)—'ह्रीं', स, क, ल,—३ वर्ण, 'माया' अर्थात् 'ह्रीं'—यह सर्वात्मिका
    जगन्माता की मूल विद्या है और ब्रह्मरूपिणी है ॥' यह मन्त्र इस प्रकार है—
    'क ए ई ल ह्री, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं' ॥
    १. द्योतयन्नस्याः २. संकेतितैः

प्रथमोऽंशः ७७
यह मन्त्र समस्त मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्रशास्त्र में 'पञ्चदशी'
'श्रीविद्या' आदि के नाम से प्रख्यात है । इसके छः प्रकार के अर्थ हैं—भावार्थ,
वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, लौकिकार्थ, रहस्यार्थ, तत्वार्थ ।¹ इसमें जो 'ह्रीं' अक्षर है वह
देवी का बीज है—यह स्वतन्त्र रूप में एक मन्त्र है—यह मन्त्र देवी प्रणव है—
ओंकारवत व्यापक अर्थों से परिपूरित है । इसका संक्षिप्त अर्थ है—
इच्छा-ज्ञान-क्रिया, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसीभूत, शिवशक्तिस्फुरण । इसी
के विषय में 'श्रीदेव्यथर्वशीर्ष, में कहा गया है—'वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्र
समन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ।।'
वियत् (आकाश) = 'ह' । 'ईकार' । 'वीतिहोत्र' (अग्नि) अर्थात् 'र' ।
'अर्धचन्द्र' अर्थात् ( ँ ) । 'एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्ध चेतसः । ध्यायन्ति
परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ।।' यह 'ह्रीं' नामक देवी प्रणव 'एकाक्षर ब्रह्म' है ।
आचार्य भास्करराय कहते हैं ² कि यद्यपि 'तन्त्रराजतन्त्र' एवं शङ्कराचार्य की
'सौन्दर्यलहरी' में हादि विद्या का ही 'प्रथमोद्धार दिखाई पड़ता है'—अर्थात् उसको
ही प्राधान्य प्रदान किया गया है तथापि शास्त्रों में तो यह कहा गया है कि—'मन्त्रों
में श्रीविद्या एवं उसमें भी कादि विद्या प्रमुख है'—'श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र
कादिर्यथा परा ।।'
भास्करराय कहते हैं कि विद्याओं में 'कादिविद्या' ही प्रमुख है क्योंकि—
१. श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र कादिर्यथा परा'
२. 'यदक्षरैकमात्रेऽपि' (षोडशीघटक)
३. 'यदेकादशमाधारम्' (रहस्यार्थ प्रतिपाद्याक्षरशालित्व के कारण)
४. 'त्रिपुरोपनिषद' के एतन्मूलक एवं प्राधान्यप्रद होने के कारण
५. 'योगिनीहृदय' आदि ग्रन्थों में इसके प्राधान्य के कारण
६. शाङ्खायन श्रुति में 'चत्वार ई विभ्रति' में कादि विद्या को प्राधान्य दिये
जाने के कारण—
७. 'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला
मायया च पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या, —इस शाङ्खायन श्रुति में 'काम'
शब्द के प्रतीकात्मक प्रयोग के कारण 'कादिविद्या' ही अधिक प्रशस्त एवं
प्रमुख है ।
'कादि विद्या'—कामराजविद्या ककादिपञ्चदशवर्णात्मक है । इसीको कादि
विद्या' भी कहते हैं । तन्त्रराज तन्त्र में शिवजी देवी से कहते हैं—'हे देवी पार्वती ।
कादिविद्या तुम्हारा स्वरूप ही है । और उससे सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती
१. 'नित्यषोडशिकार्णव' 'वरिवस्यारहस्यम्'
२. प्रकाश

७८ वरिवस्यारहस्ये
है ।।' कादिविद्या का उद्धार आथर्वणात्रिपुरोपनिषद में—'कामोयोनिः.... विश्वमातादि
विद्या' द्वारा किया गया है ।
'लोपामुद्रा विद्या' ही 'हादिविद्या' है । यह भी पञ्चदशवर्णात्मिका है ।
कामेश्वराङ्कस्थिता कामेश्वरी के पूजामन्त्रों में 'कादि' एवं 'हादि' दोनों विद्याओं से
युक्त नाममन्त्र की योजना प्रचलित है । मनु, चन्द्र, कुबेर, अगस्ति, अग्नि, सूर्य,
इन्द्र, स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा) १० विद्यायें केवल आम्नायपाठ मात्र
में उल्लिखित है । प्रचलित उपासना-पद्धतियों में उनका विशेष उपयोग नहीं है ।
वस्तुतः श्रीविद्या के १२ सम्प्रदाय थे । जो निम्न है—'मनुश्चन्द्रः कुबेरश्च लोपामुद्रा
च मन्मथः । अगस्तिः सूर्यश्च इन्द्रः स्कन्दः शिवस्तथा । क्रोधभट्टारको देव्या
द्वादशामी उपासकाः ॥'
इनमें से मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्ति, अग्नि, सूर्य, इन्द्र,
स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा)—सभी बारहों श्रीविद्या के उपासकों का
पृथक्-पृथक् अपना सम्प्रदाय था किन्तु इनमें चतुर्थ और पञ्चम (लोपामुद्रा एवं
मन्मथ) को छोड़कर अन्य सम्प्रदाय प्रचलित नहीं है । इनमें भी 'कामराजविद्या'
(मन्मथ सम्प्रदाय) का ही अधिक प्रसार है । 'त्रिपुरारहस्य' के माहात्म्यखण्ड के
अनुसार कामदेव ने भगवती त्रिपुरा की निर्व्याज, एकनिष्ठ उपासना करके उनसे जो
वर प्राप्त किए उसमें स्वोपासित 'कामराजविद्या' के उपासकों के लिए बहुत अधिक
सुविधायें प्राप्त करा दीं अतः 'कादि विद्या' अधिक प्राधान्य प्राप्त कर गई ।
'कामकलाविलास' के टीकाकार नटनानन्दनाथ ने 'चिद्वल्ली' में कहा है कि—
'इह श्रीविद्यारत्नागमे सन्तानद्वयमस्ति । कामराज सन्तानो लोपामुद्रासन्तानश्चेति ।
कामराजसन्तानक्रमस्तु सकल विद्यानुसन्ध्यविच्छिन्न इति प्राचीनगुरवोऽप्याचक्षते ।
लोपामुद्रासन्तानक्रमस्तु विच्छिन्नतया प्रवर्तत इति वर्णयन्ति ।।' इस प्रकार
नटनानन्दनाथ—(१) 'कामराज विद्या' (कादि विद्या) एवं (२) 'लोपामुद्रा विद्या'
(हादि विद्या) दो का ही उल्लेख करते हैं ।
'कामराज विद्या' (कादि विद्या)—यह विद्या ककारादिपञ्चदशवर्णात्मिका है
इसीलिए इसका नाम 'कादिविद्या' है । 'लोपामुद्रा' ऋग्वेद के अन्यतम ऋषि हैं
(ऋग्वेद १।१७९।१-२) ।
पञ्चदशाक्षरी विद्या—
(क) 'वाग्भवकूट' (आद्य खण्ड) : क ए ई ल ह्रीं ।—कादि विद्या ।
(प्रथम खण्ड)
(ख) 'कामकूट' : ह स क ह ल ह्रीं । हादि विद्या (द्वितीय खण्ड)
(ग) 'शक्तिकूट' : स क ल ह्रीं । सादि विद्या (तृतीय खण्ड)
१. 'लोपामुद्राविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
२. 'क्रोधमुनिविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।

प्रथमोऽंशः ७९
३. 'मानवीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह
ल ह्रीं ।
४. 'चान्द्रीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क, ए, ई, ल, ह्रीं, ह स क
ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
५. 'कौबेरीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह, स, क,
ह, ल, ह्रीं, स क ल ह्रीं, ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
६. 'अगस्त्यविद्या'—ह ह स क ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल
ह्रीं ।
७. 'नन्दिविद्या'—ह, ह, स क ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल
ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं ।
८. 'प्रभाकरीविद्या'—क ए ल ह्रीं, ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह
ल ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
९. 'षण्मुखीमुद्रा'—ह्रीं, क्लीं हंसः, क्लीं लं ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, सोहं
क्लीं हंसः, ह्रीं, हंसः सोहं हंसः । ह्रीं क्लीं हंसः, क्लीं लं ह्रीं, ह स
क ह ल ह्रीं, सोहं क्लीं हंसः ह्रीं हंसः, सोहं हंसः ह स क ए ल ह्रीं
ह स ह स क ह ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं ।
१०. 'वैष्णवी विद्या'—ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल ह्रीं, ह स
स क ल ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं,
ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, ह स क ह ल
ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
११. आदिविद्या (शक्ति-शिव विद्या)—(१) क ए ई ल ह्रीं (वाग्भवकूट)
(२) ह स क ह ल ह्रीं (कामकूट) (३) स क ल ह्रीं, (शक्तिकूट)
द्वादशविद्यायें—शक्तिशिव विद्या । लोपामुद्रा विद्या । क्रोधमुनिविद्या । मानवी
विद्या । चान्द्री विद्या । कौबेरी विद्या । अगस्त्य विद्या । नन्दि विद्या । प्रभाकरी
विद्या । षण्मुखी विद्या । परमशिव विद्या । वैष्णवी विद्या ॥
श्री विद्या का उपासना क्रम
काली क्रम सुन्दरी क्रम तारा क्रम
(कुण्डलिनी क्रम, (हंस क्रम, (समवरोधिनी क्रम,
कादिविद्या, हादिविद्या, सादिविद्या,
सत्वगुण प्रधान) रजोगुण प्रधान ।) तमोगुण प्रधान)
दश महाविद्यायें—'काली तारा षोडशी च बगला भुवनेश्वरी । धूमा छिन्ना च
मातङ्गी भैरवी कमलात्मिका ॥'

८० वरिवस्यारहस्ये
(१) 'कादि विद्या'—'क' से प्रारंभ (२) 'हादि विद्या'--'ह' से प्रारंभ (३)
'सादिविद्या'—'स' से प्रारंभ । पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के ३ ककार + २ हकार =
('शिववर्ण') शेष बीजाक्षर = ('शक्ति वर्ण') ३ ह्रींकार (शिवशक्त्यात्मक) ।
('पञ्चदशीविद्या' = षोडशी 'विद्या' = पञ्चदशाक्षरी विद्या ।)
विद्यावर्णानुद्धरति—
क्रोधीशः श्रीकण्ठारूढः कोणत्रयं लक्ष्मीः ।
मांसमनुत्तररूढं वाग्भवकूटं प्रकीर्तितं प्रथमम् ॥ ९ ॥
शिवहंसब्रह्मवियच्छक्राः प्रत्येकमक्षरारूढाः ।
द्वितीयीकं कूटं कथितं तत् कामराजाख्यम् ॥ १० ॥
शिवतो वियतो मुक्तं तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।
हृल्लेखानां त्रितयं 'कूटत्रितयेऽपि योज्यमन्ते स्यात् ॥ ११ ॥
(कूटत्रय का स्वरूप)
(क) वाग्भव कूट का स्वरूप—'क ए ई ल'-ह्रीं—
श्रीकण्ठ (अ) से समन्वित क्रोधीश (क), कोणत्रय (त्रिकोण = त्रिभुज 'ए'),
लक्ष्मी (ई), अनुत्तर (अ) एवं मांस (ल) से युक्त प्रथम कूट 'वाग्भवकूट' कहा गया
है ॥ ९ ॥
(ख) कामराज कूट का स्वरूप— 'ह स क ह ल'-ह्री—
शिव (ह), हंस (स्), ब्रह्मा (क्), वियत् (ह), एवं शक्र (ल्),
(वर्ण-समुदाय) अक्षर (अ) से समन्वित होकर द्वितीय कूट 'कामराजकूट' कहा गया
है ॥ १० ॥
(ग) शक्ति कूट का स्वरूप—'स क ल-ह्रीं'—
शिव (ह) एवं वियत् (ह) से विरहित यही ('कामराज कूट') 'शक्तिकूट' नाम
वाला तृतीय (कूट) है । तीनों कूटों में अन्त में हृल्लेखा त्रिक जोड़ लेना चाहिए
(अर्थात् प्रत्येक कूट के अन्त में 'ह्रीं' जोड़ लेना चाहिए) ॥ ११ ॥

  • प्रकाश *
    क्रोधीशो ब्रह्मा च ककारः । श्रीकण्ठोऽनुत्तरमक्षरं चाकारः । तमारूढस्तेन
    युक्तः । कोणत्रयं योनिः । लक्ष्मीः कमला । मांसं शक्रश्चेन्द्रः । शिवो वियच्च हकारः ।
    हंसः सकारः । अक्षरसमूहात्मकत्वात् कूटत्वव्यपदेशः ॥ ९-११ ॥
  • सरोजिनी *
    उपर्युक्त श्लोक त्रय में पञ्चदशी (पञ्चदशाक्षरी । षोडशी) मन्त्र एवं उसके कूटों
    का विवरण प्रस्तुत किया गया है जो इस प्रकार है—

left: त्र.
Here, it is clearly त् and त: चित्त. Let's look really closely:
च + ि = चि
then त्त: vertical stem with the horizontal curved hook of double t. There is no right leg or left slant. But wait, is there an aa matra? No, it ends at the stem. Wait, could it be चित्त or चित्रा? It definitely looks like चित्त (or maybe typo in the printed book for चित्रा, but we transcribe what is printed: चित्त).

At the very bottom left:
६ वरि.
(This is the signature/quire mark: 6 Vari. meaning Varivasyarahasya, 6th gathering).

Wait! Let's decide on the transcription format:
Should we use Markdown columns, or transcribe column-by-column?
Column-by-column is so much cleaner, readable, and standard for vertical columns!
Let's see:
Header:
प्रथमोऽशः ८१

Then Column 1, Column 2, Column 3.
Wait, let's clearly label them so that the table structure is fully preserved:

(१) वाग्भवकूट

...
[L..] ### (२) (कामराजकूट)
...
[L..] ### (३) शक्तिकूट)
...
Wait, or can we present it as a table using markdown?
Wait!

८२ वरिवस्यारहस्ये
चान्द्रखण्ड का 'ह्रीं' = चित्रा ॥
भगवती का त्रिखण्डात्मक रूप

खण्डमन्त्र का भागमन्त्र का भागषड् कमलों का भागकुण्डलिनी भाग
सोमखण्डशक्तिकूटशिव के ४ चक्रआज्ञा एवं विशुद्धसोमकुण्डलिनी
सूर्यखण्डकामकूटचतुर्दशार एवं बहिर्दशारहृदय एवं मणिपूरसूर्य कुण्डलिनी
अग्निखण्डवाग्भवकूटअन्तर्दशार, अष्टार, बिन्दुस्वाधिष्ठान एवं मूलाधार सहितं त्रिकोणअग्निकुण्डलिनी
(१) वाग्भव कूट : आग्नेय : भगवती का मुख है ।
(२) कामकला कूट : सौर : भगवती का कण्ठ से कटिपर्यन्त रूप है ।
(३) शक्ति कूट : चान्द्र : भगवती का कटि के नीचे का भाग है जो कि
सृजन शक्ति का रूप है ।
(क) प्रथम कूट : वाग्भव कूट : ११ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक
१७, श्लोक ३१, (१०)
(ख) द्वितीय कूट : कामराज कूट : ११ १/२ मात्रा काल—एक लव कम ।
श्लोक १७ (१० १/२)
(ग) तृतीय कूट : शक्ति कूट : ८ १/२ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक
१८ एक लव कम । (८ १/२)
श्रीविद्या का मन्त्र पंद्रह अक्षरों का है अतः इस मन्त्र को 'पञ्चदशी' कहते
हैं । उसमें १६वाँ बीज और लगा देने से वही 'षोडशीविद्या' बन जाती है ।
'कूट' एवं विद्या—
पञ्चदशीमन्त्र के (१) प्रथम पञ्चाक्षर = 'वाग्भवकूट' कहलाते हैं ।
(२) द्वितीय षडाक्षर = 'कामकलाकूट' कहलाते हैं ।
(३) अन्तिम अक्षरचतुष्टय = 'शक्तिकूट' कहलाते हैं ।

प्रथमोंऽशः ८३
(१) ‘कादिविद्या’ मूल विद्या है । कामदेव ने इसी मूल ‘कादिविद्या’ की
उपासना की थी । इसी विद्या के आधार पर (२) अन्य ११ विद्यायें प्रचलित हुईं ।
अगस्त मुनि की पत्नी लोपामुद्रा, दुर्वासा, कुबेर, चन्द्र, नन्दि, मनु, अगस्त्य,
सूर्य, षडानन, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, यमराज, इन्द्र एवं कामदेव—सभी ने
अपने-अपने इष्ट के अनुसार मूल विद्या को भिन्न-भिन्न विद्याओं का रूप दिया और
वे विद्यायें उन ऋषियों एवं देवों के नाम से प्रसिद्ध हुईं ।
प्रणव एवं देवी प्रणव में साम्य—
उद्गीथोपासना में उपासित प्रणव एवं देवी प्रणव (ह्रीं) में ऐकात्म्य है । प्रणव
का स्वरूप निम्नांकित है ।
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्द्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥ २२५ ॥
कौण्डिली व्यापिनी शक्तिः समनैकादशी स्मृता ।
उन्मना च ततोऽतीता तदतीतं निरामयम् ॥
(स्वच्छन्द तन्त्र : ४ पटल)
ॐ
के १२ अवयव
१. अकार —————————————
२. उकार —————————————
३. मकार —————————————
४. बिन्दु —————————————
५. अर्द्धचन्द्र —————————————
६. निरोधिनी —————————————
७. नाद —————————————
८. नादान्त —————————————
९. शक्ति —————————————
१०. व्यापिनी —————————————
११. समना —————————————
१२. उन्मना —————————————

८४ वरिवस्यारहस्ये
'पञ्चदशाक्षरी' मन्त्र या 'पञ्चदशी विद्या' (पञ्चदशाक्षरी विद्या)—
१. स्वरूप—'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं ।'
२. प्रादुर्भाव-स्रोत—'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्र-
मिन्द्रः ।'
३. निहित वर्ण—इसमें वर्ण निहित हैं इसीलिए इसे 'पञ्चदशाक्षरी' कहते
हैं ।
४. मूल वर्ण—पुनरावृत्ति-रहित वर्णों की दृष्टि से इस मन्त्र में निम्न ७ वर्ण
मात्र स्थित हैं—'क' 'ए' 'ई' 'ल' 'ह्रीं' 'ह' 'स' ।
५. वर्ण-सङ्घटन—(क) तीन ककार (ख) एक एकार (ग) एक ईकार (घ)
तीन लकार (ङ) तीन ह्रींकार (च) दो हकार (छ) दो सकार ।
६. पुनरावृत्ति-शून्य वर्ण—'ए' 'ई' । इसमें भी 'ह्रीं' में निहित ईकार को
ध्यान में रखा जाय तो ईकार चार हो जायेंगे अतः पुनरावृत्ति-शून्य वर्ण
मात्र एक ही शेष रह जाएगा और वह है 'ए' ।
७. कूट—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में तीन कूट हैं—(१) वाग्भवकूट (२) कामराज
कूट (३) शक्तिकूट ।
८. कूटों की वर्ण संख्या—(क) 'वाग्भव कूट' (पाँच) + (ख)
'कामराजकूट' (छः) + (ग) 'शक्तिकूट' (चार) = १५
१०. नाद समन्वित एवं आत्मप्रतिष्ठित सूक्ष्म वर्णों सहित वर्ण संख्या—
(क) 'वाग्भवकूट' = १८
(ख) 'कामराजकूट' = २२
(ग) 'शक्तिकूट' १८
महायोग = (१८ + २२ + १८) = ५८
'प्रथमेऽष्टादश वर्णा द्वाविंशविरक्षराणि मध्ये स्युः ।
प्रथमेन तुल्यमन्त्यं सङ्घातेनाष्ट पञ्चाशत् ।।
११. वर्ण-संख्या ५८ कैसे?
ह्रीं में १२ वर्ण कहाँ से आ गए ? उत्तर—
हृल्लेखायाः स्वरूपं तु व्योमाग्निर्वाम लोचना । ┐
बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।। │ ह्रींकार में
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादश संहति । ┤ निहित १२
बिन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ।। ┘ वर्ण

प्रथमोऽंशः ८५
पञ्चदशी मन्त्र में वर्ण-संघटन
वाग्भवकूट : कामराजकूट : शक्तिकूट :
(१८ वर्ण) (२२ वर्ण) (१८ वर्ण)
क(१) + अ(१) + ह(१) + अ(१) + स(१) + अ(१) +
ए(१) + ई(१) + स(१) + अ(१) + क(१) + अ(१) +
ल(१) + अ(१) + क(१) + अ(१) + ल(१) + अ(१) +
ह्रीं(१२) ह(१) + अ(१) + ह्रीं(१२)
ल(१) + अ(१) +
ह्रीं(१२)
६ + १२ = १८ १० + १२ = २२ ६ + १२ = १८
१८ + २२ + १८ = ५८
ह्रींकार में निहित
१२ वर्ण
देवी प्रणव
१. ह ─────────────────────────┐
२. र ─────────────────────────┤
३. ई ─────────────────────────┤
४. बिन्दु ────────────────────────┤
५. अर्द्धचन्द्र ────────────────────┤
६. रोधिनी ──────────────────────┤ ह्रीं
७. नाद────────────────────────┤
८. नादान्त ─────────────────────┤
९. शक्ति ──────────────────────┤
१०. व्यापिका ────────────────────┤
११. समना ─────────────────────┤
१२. उन्मना ─────────────────────┘
'प्रणव' = ओंकार । ओंकार जीवों का प्राण है ।¹
──────────────────────────────────────────
१. नेत्र तन्त्र

८६ वरिवस्यारहस्ये
[तालिका : संहार क्रम एवं सृष्टि क्रम]

संहार क्रमसृष्टि क्रम
अ ↓उन्मना ↓
उ ↓समना ↓
म ↓व्यापिनी ↓
बिन्दु ↓शक्ति ↓
अर्धचन्द्र ↓नादान्त ↓
रोधिनी ↓नाद ↓
नाद ↓रोधिनी ↓
नादान्त ↓अर्धचन्द्र ↓
शक्ति ↓बिन्दु ↓
व्यापिनी ↓मकार ↓
समना ↓उकार ↓
उन्मनाअकार
[मध्य चक्र : द्वादश कला वृत्त (बाह्य से अन्तर्मुख)]
१. अकार
२. उकार
३. मकार
४. बिन्दु
५. अर्धचन्द्र
६. रोधिनी
७. नाद
८. नादान्त
९. शक्ति
१०. व्यापिनी
११. समना
१२. उन्मना
केन्द्र : ॐ
अधोभाग पार्श्व-द्वय : (वाम) ॐ(दक्षिण) ॐ
[अधोवर्ती सोपान-चित्र (संहार-सृष्टि क्रम)]
संहार क्रम ← ———————————————— → सृष्टि क्रम
( मुक्ति क्रम )( बन्धन क्रम )
[ आरोह क्रम ↗ ] ------------------------- [ अवरोह क्रम ↘ ]
↗महाबिन्दु
↗उन्मना १२ ↑
↗समना ११ ↑
↗व्यापिनी १० ↑
↗शक्ति ९ ↑
↗नादान्त ८ ↑
↗नाद ७ ↑
↗रोधिनी ६ ↑
↗अर्धचन्द्र ५ ↑
↗बिन्दु ४ ↑
↗मकार ३ ↑
↗उकार २ ↑
अकार १ ↑↓ १ अकार

प्रथमोऽंशः ८७
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
कूटत्रय का उच्चारण काल
(मात्राकाल जो जप के लिए नियत है)
१. प्रथमकूट = १० मात्राएँ
२. द्वितीयकूट = साढ़े दस मात्राएँ
३. तृतीयकूट = एक लव कम उन्तीस मात्राएँ
मन्त्राविर्भाव
क ए ई ल ह्रीं पञ्चदशी विद्या
(प्रथम कूट) (पञ्चदशाक्षरी मन्त्र)
वाग्भव कूट
ह स क ह ल ह्रीं
(मध्य कूट) कामराज कूट
स क ल ह्रीं
(अन्तिम कूट) शक्ति कूट
[चक्र-केन्द्र एवं वृत्त: क ए ई ल ह्रीँ / ह स क ह ल ह्रीँ / स क ल ह्रीँ — पञ्चदशाक्षरी श्रीविद्या]
कूटों के प्रत्येक अक्षर में—ब्रह्मा-भारती, विष्णु-पृथ्वी, रुद्र-रुद्राणी अधिपति निवास करते हैं ।
'पञ्चदशी मन्त्र' की स्थिति एवं स्वरूप—
(१) प्रथम कूट—प्रलयाग्नि के समान भासित होने वाला । अनाहत स्पर्शी ।
(मूलाधार से अनाहत तक व्याप्त)
(२) द्वितीय कूट—कोटि सूर्यवत भासमान । आज्ञाचक्र स्पर्शी । (अनाहत से
आगे से प्रारंभ होकर आज्ञा चक्र तक व्याप्त)
(३) तृतीय कूट—कोटि चन्द्रों के समान भासमान । (आज्ञा चक्र से आरम्भ
करके उन्मना एवं महाबिन्दु तक ।)
'सुषुम्नानाड़ी' के मूलाग्र भागों में दो 'सहस्रदल कमल' स्थित हैं । मध्य में
अष्टदल आदि तीस कमल स्थित है ।¹ मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत,
विशुद्ध आज्ञा नामक ६ कमल हैं ।
१. स्वच्छन्द तन्त्र

८८ वरिवस्यारहस्ये
श्रीविद्या के विभिन्न रूप
श्रीविद्या के विभिन्न स्वरूप विभिन्न सम्प्रदायों को दृष्टि में रखने पर
श्रीविद्या के विभिन्न स्वरूप इस प्रकार निर्मित होंगे—

[चक्रान्तर्गत विद्या-मन्त्र-स्वरूप :]
१. वैष्णवीविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं
२. षण्मुखीविद्या : ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं...
३. नन्दिविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं...
४. कौबेरीविद्या : ह स क ल ह्रीं सोऽहं क्रीं हंसः ह्रीं हंसः सोऽहं हंसः ह स क ए ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं...
५. मानवीविद्या : ह स क ल ह्रीं क्रीं लँ ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सोऽहं क्रीं हंसः ह्रीं हंसः सोऽहं हंसः...
६. लोपामुद्रा विद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं...
७. शक्तिशिवविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं...
८. आदिविद्या : क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं
९. क्रोधमुनीविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं
१०. चान्द्रीविद्या : ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं
११. अगस्त्य विद्या : क ए ई ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं
१२. प्रभाकरीविद्या : ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं
१३. परमशिवविद्या : सो हं

[चक्र-निर्देशित विद्या-नामावली :]
वैष्णवीविद्या
षण्मुखीविद्या
नन्दिविद्या
कौबेरीविद्या
मानवीविद्या
लोपामुद्रा विद्या
शक्तिशिवविद्या
आदिविद्या
क्रोधमुनीविद्या
चान्द्रीविद्या
अगस्त्य विद्या
प्रभाकरीविद्या
परमशिवविद्या