वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ९३
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥ २१ ॥
कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समनाश्रेति सामया ।
निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ॥ २२ ॥१
अकार, उकार, मकार, बिन्दु आदि द्वादश कलाओं के द्वारा ओंकार पृथ्वी से
लेकर शिव पर्यन्त समस्त तत्त्वों एवं भुवनों को आकलित करता है क्योंकि—'ओम्
इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्' प्रणव समस्त प्राणियों का प्राण है, उनका जीवन है—
'प्रणवः प्राणिनां प्राणो जीवनं सम्प्रतिष्ठितम् ।
गृह्णति प्रणवः सर्वं कलाभिः कलयेच्छिवम् ॥२
क्या 'बिन्दु' अर्द्धचन्द्र, रोधिनी आदि वर्ण या अक्षर हैं—भास्करराय
'वरिवस्यारहस्यम्' में कहते हैं कि यद्यपि ककारादि वर्णों की भाँति इनका स्पष्ट
उच्चारण तो संभव नहीं है तथापि ये उक्त बिन्दु आदि नव कलायें सूक्ष्म, सूक्ष्मतर
एवं सूक्ष्मतम काल द्वारा उच्चरित ध्वनि विशेष या वर्ण विशेष हैं । 'योगिनीहृदय'
में भी नाद को अक्षर स्वीकार किया गया है । इसी आधार पर पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
में ५८ वर्णों की संहति स्वीकार की गई है ।३
नव नादों का समष्टिगत नाम—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद नादान्त,
शक्ति, समना एवं उन्मना—इन नवों का समष्टिगत नाम 'नाद' है । बिन्दु से
उन्मनापर्यन्त नव कलाओं की समुदित संज्ञा 'नाद' है । भास्करराय कहते हैं कि
यद्यपि आठ कलाओं का नाम ही 'नाद' है । किन्तु व्यवहार सौकर्य के लिए
'बिन्दु' को भी मिलाकर नौ कलाओं को भी 'नाद' कहा जाता है ।
कलाओं (नादों) की मात्रायें—कमलपुष्प को सुई से एकबारगी छेद करने
पर प्रत्येक दल के भेदन में जितना समय लगता है उसे 'लव' कहते हैं । इससे
अधिक सूक्ष्म काल नहीं होता । २५६ लवों की एक मात्रा होती है ।
उच्चारण-काल—(१) बिन्दु का १२८ लव (२) अर्द्धचन्द्र का ६४ (३) रोधिनी
का ३२ (४) नाद का १६ (५) नादान्त का ८ (६) शक्ति का ४ (७) व्यापिका
का २ (८) समना १ लव (९) उन्मना—सर्वथा कालहीन ॥४ 'योगिनीहृदय' में
'उन्मना' को भी कालात्मक स्वीकार किया गया है—'शक्त्यादीनां तु मात्रांशो
मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥' 'सेतुबंध' में भास्करराय ने इस श्लोक की व्याख्या करते
हुए कहा है कि जिस तरह 'समना' में काल होता है उसी प्रकार 'उन्मना' में भी
काल होता है—"यथा समनायाः कालः तथैवोन्मनी काल ।।"
१-२. नेत्रतन्त्र ३. प्रकाश
४. प्रकाश 'बिन्दु' से लेकर समना पर्यन्त समस्त कलाओं की मात्रा अपनी
पूर्ववर्ती कला से उत्तरोत्तर आधी होती जाती है यथा—बिन्दु की मात्रा से
आधी मात्रा अर्द्धचन्द्र में अर्द्धचन्द्र से आधी मात्रा रोधिनी में, रोधिनी से
आधी मात्रा नाद में, नाद की मात्रा से आधी मात्रा नादान्त में आदि ।।