वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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(क) द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम शून्य = ‘अवान्तर शून्य’।
(ख) द्वादश शून्य (उन्मना) = ‘महाशून्य’।
(ग) सुषुप्तिभावना का स्थान भ्रूमध्य स्थित बिन्दु में है। इस बिन्दु को
‘हल्लेखा’ का ऊर्ध्व बिन्दु जानना चाहिए।
(घ) अर्द्धचन्द्र, रोधिनी एवं नाद—इन तीन मन्त्रावयवों में ‘तुरीय’ की भावना
करना उचित है।
(ङ) नादान्त से शक्ति। व्यापिनी, समना एवं उन्मना में ‘तुरीयातीत अवस्था’
व्याप्त है। उन्मना से परे किसी प्रकार की अवस्था नहीं है। ‘बिन्दु’ मात्रा से
मात्राहीन की ओर जाने का द्वार है जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान एकाकार हो जाते हैं,
उन्मना पर्यन्त सम्पूर्ण मन्त्रावयव १०८१७ बार उच्चारित होने पर नाद का अन्त
एवं तत्वज्ञान का उदय होकर परमपद की प्राप्ति होती है। समना में भी ‘नाद’ का
अन्त नहीं होता। शाक्त योगियों के मतानुसार ‘उन्मना’ में भी नाद का अन्त नहीं
होता। उन्मना में काल तो नहीं है फिर भी वह परमतत्त्व नहीं है। जब तक नाद
का अन्त नहीं होता तब तक तत्वबोध नहीं हो पाता। उन्मना का भेदन होने के
बाद ही ‘नाद’ का अन्त होता है।१
‘विश्वचक्र’ (अकुल से महाबिन्दु पर्यन्त समस्त अवान्तर चक्रों की समष्टि ही
विश्वचक्र है।)
(१) अकुल से आज्ञा चक्र तक के अंश = ‘सकल’
(२) बिन्दु से उन्मना तक के अंश = ‘सकल निष्कल’
(३) उन्मना के बाद महाबिन्दु अंश = ‘निष्कल’
‘महाबिन्दु’ = विश्वातीत परमेश्वर या शिवशक्ति का आसन) ।। ‘महाबिन्दु’
ही सदाशिव है। इसके ऊपर चिच्छक्ति क्रीडा करती है।
प्रणव के द्वादश अवयव हैं—(१) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के द्योतक—
अकार, उकार, मकार (२) तुरीय, तुरीयातीत के द्योतक—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र,
रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना, उन्मना।
बिन्दौ तदर्धे रोधिन्या नादे नादान्त एवं च।
शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनि गोचरे ॥
महाबिन्दौ पुनश्चैवं त्रिधा चक्रं तु भावयेत् ॥२
‘नेत्रतन्त्र’ के अनुसार प्रणव की निम्न कलायें हैं—(१) अकार (२) उकार
(३) मकार (४) बिन्दु (५) अर्द्धचन्द्र (६) रोधिनी (७) नाद (८) नादान्त (९)
व्यापिनी (१०) शक्ति (११) समना (१२) उन्मना—
१. गोपीनाथ कविराज—‘भारतीय संस्कृति और साधना’; (पृ० ३३८-३३९)
२. योगिनीहृदय । (चक्र संकेत)