वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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है ।।' कादिविद्या का उद्धार आथर्वणात्रिपुरोपनिषद में—'कामोयोनिः.... विश्वमातादि
विद्या' द्वारा किया गया है ।
'लोपामुद्रा विद्या' ही 'हादिविद्या' है । यह भी पञ्चदशवर्णात्मिका है ।
कामेश्वराङ्कस्थिता कामेश्वरी के पूजामन्त्रों में 'कादि' एवं 'हादि' दोनों विद्याओं से
युक्त नाममन्त्र की योजना प्रचलित है । मनु, चन्द्र, कुबेर, अगस्ति, अग्नि, सूर्य,
इन्द्र, स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा) १० विद्यायें केवल आम्नायपाठ मात्र
में उल्लिखित है । प्रचलित उपासना-पद्धतियों में उनका विशेष उपयोग नहीं है ।
वस्तुतः श्रीविद्या के १२ सम्प्रदाय थे । जो निम्न है—'मनुश्चन्द्रः कुबेरश्च लोपामुद्रा
च मन्मथः । अगस्तिः सूर्यश्च इन्द्रः स्कन्दः शिवस्तथा । क्रोधभट्टारको देव्या
द्वादशामी उपासकाः ॥'
इनमें से मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्ति, अग्नि, सूर्य, इन्द्र,
स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा)—सभी बारहों श्रीविद्या के उपासकों का
पृथक्-पृथक् अपना सम्प्रदाय था किन्तु इनमें चतुर्थ और पञ्चम (लोपामुद्रा एवं
मन्मथ) को छोड़कर अन्य सम्प्रदाय प्रचलित नहीं है । इनमें भी 'कामराजविद्या'
(मन्मथ सम्प्रदाय) का ही अधिक प्रसार है । 'त्रिपुरारहस्य' के माहात्म्यखण्ड के
अनुसार कामदेव ने भगवती त्रिपुरा की निर्व्याज, एकनिष्ठ उपासना करके उनसे जो
वर प्राप्त किए उसमें स्वोपासित 'कामराजविद्या' के उपासकों के लिए बहुत अधिक
सुविधायें प्राप्त करा दीं अतः 'कादि विद्या' अधिक प्राधान्य प्राप्त कर गई ।
'कामकलाविलास' के टीकाकार नटनानन्दनाथ ने 'चिद्वल्ली' में कहा है कि—
'इह श्रीविद्यारत्नागमे सन्तानद्वयमस्ति । कामराज सन्तानो लोपामुद्रासन्तानश्चेति ।
कामराजसन्तानक्रमस्तु सकल विद्यानुसन्ध्यविच्छिन्न इति प्राचीनगुरवोऽप्याचक्षते ।
लोपामुद्रासन्तानक्रमस्तु विच्छिन्नतया प्रवर्तत इति वर्णयन्ति ।।' इस प्रकार
नटनानन्दनाथ—(१) 'कामराज विद्या' (कादि विद्या) एवं (२) 'लोपामुद्रा विद्या'
(हादि विद्या) दो का ही उल्लेख करते हैं ।
'कामराज विद्या' (कादि विद्या)—यह विद्या ककारादिपञ्चदशवर्णात्मिका है
इसीलिए इसका नाम 'कादिविद्या' है । 'लोपामुद्रा' ऋग्वेद के अन्यतम ऋषि हैं
(ऋग्वेद १।१७९।१-२) ।
पञ्चदशाक्षरी विद्या—
(क) 'वाग्भवकूट' (आद्य खण्ड) : क ए ई ल ह्रीं ।—कादि विद्या ।
(प्रथम खण्ड)
(ख) 'कामकूट' : ह स क ह ल ह्रीं । हादि विद्या (द्वितीय खण्ड)
(ग) 'शक्तिकूट' : स क ल ह्रीं । सादि विद्या (तृतीय खण्ड)
१. 'लोपामुद्राविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
२. 'क्रोधमुनिविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।