वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोंऽशः ८३
(१) ‘कादिविद्या’ मूल विद्या है । कामदेव ने इसी मूल ‘कादिविद्या’ की
उपासना की थी । इसी विद्या के आधार पर (२) अन्य ११ विद्यायें प्रचलित हुईं ।
अगस्त मुनि की पत्नी लोपामुद्रा, दुर्वासा, कुबेर, चन्द्र, नन्दि, मनु, अगस्त्य,
सूर्य, षडानन, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, यमराज, इन्द्र एवं कामदेव—सभी ने
अपने-अपने इष्ट के अनुसार मूल विद्या को भिन्न-भिन्न विद्याओं का रूप दिया और
वे विद्यायें उन ऋषियों एवं देवों के नाम से प्रसिद्ध हुईं ।
प्रणव एवं देवी प्रणव में साम्य—
उद्गीथोपासना में उपासित प्रणव एवं देवी प्रणव (ह्रीं) में ऐकात्म्य है । प्रणव
का स्वरूप निम्नांकित है ।
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्द्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥ २२५ ॥
कौण्डिली व्यापिनी शक्तिः समनैकादशी स्मृता ।
उन्मना च ततोऽतीता तदतीतं निरामयम् ॥
(स्वच्छन्द तन्त्र : ४ पटल)
ॐ
के १२ अवयव
१. अकार —————————————
२. उकार —————————————
३. मकार —————————————
४. बिन्दु —————————————
५. अर्द्धचन्द्र —————————————
६. निरोधिनी —————————————
७. नाद —————————————
८. नादान्त —————————————
९. शक्ति —————————————
१०. व्यापिनी —————————————
११. समना —————————————
१२. उन्मना —————————————