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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 530 में से

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पृष्ठ 172

७० वरिवस्यारहस्ये
तेजस्वी, अन्नाद ।
(२) दक्षिण सुषि = द्वारपाल—व्यान है । वही श्रोत्र एवं चन्द्रमा भी है ।
उसका श्री एवं यश रूप से चिन्तन→श्रीमान, यशस्वी ।
(३) पश्चिम सुषि = द्वारपाल—अपान है । वही-वाग एवं अग्नि है इस
अपान का ब्रह्मवर्चस एवं अन्नाद्य रूप से चिन्तन→वह व्यक्ति ब्रह्मवर्चस्वी
एवं अन्नाद हो जाता है ।
(४) उत्तर सुषि = द्वारपाल-समान है । वही मन एवं पर्जन्य दोनों है । समान
का कीर्ति एवं व्युष्टि (अपरोक्ष यश) के रूप में ध्यान→कीर्ति + व्युष्टि ।
(५) ऊर्ध्व सुषि = द्वारपाल = उदान वायु । वही वायु एवं आकाश है,
इसका ओज एवं महः रूप से चिन्तन→ओजस्वी एवं महान हो जाता
है ।
तस्या रूपद्वितयं तत्रैकं यत् प्रपठ्यते ऽस्पष्टम् ।
वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ॥ ७ ॥
(गायत्री के दो रूप)
उस (गायत्री) के दो रूप हैं । उनमें एक अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
(वह) चारों वेदों में भी अत्यन्त एवं परम गोपनीय है ॥ ७ ॥

  • प्रकाश *
    तस्या गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति पदच्छेद आवृत्त्या । चरणत्रयम् 'तत् सवितुः'
    इत्यादि स्पष्टम् । 'परोरजसे सावदोम्' इति चतुर्थचरणं त्वस्पष्टमित्यर्थः । परं
    श्रीविद्याख्यं द्वितीयं रूपम् ॥ ७ ॥
  • सरोजिनी *
    तस्याः = उस गायत्री के । रूपद्वितयं = दो रूप हैं । तत्रैकं = उनमें से
    एक । यत = जो, जिसे । प्रपठ्यतेऽस्पष्टम् = अस्पष्ट रूप में पढ़ा जाता है ।
    यहाँ विचारणीय बिन्दु यह है कि यदि दो रूपों में एक अस्पष्ट है तो दूसरा स्पष्ट
    होगा । इसीलिए भास्करराय कहते हैं—'तस्याः गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति ।।' वे
    कहते हैं कि इनमें से 'तत्सवितुः' इत्यादि तो सुस्पष्ट है किन्तु चतुर्थ चरण अस्पष्ट
    है । वेदेषु चतुर्ष्वपि = चारों वेदों में भी । परम—भास्करराय 'परम्' का अर्थ
    'श्रीविद्या' समझते हैं—'परं श्री विद्याख्यं द्वितीयं रूपं' अर्थात् गायत्री का जो दूसरा
    रूप है वह श्रीविद्या है । वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयम् का दूसरा अर्थ यह
    होगा—'चारों वेदों में भी पर विद्या (श्रीविद्या) अत्यन्त गोपनीय है ।' इस पर विद्या
    (पञ्चदशाक्षरी मन्त्र) का स्वरूप निम्नांकित है—'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल
    ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं ॥'