वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ७७
यह मन्त्र समस्त मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्रशास्त्र में 'पञ्चदशी'
'श्रीविद्या' आदि के नाम से प्रख्यात है । इसके छः प्रकार के अर्थ हैं—भावार्थ,
वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, लौकिकार्थ, रहस्यार्थ, तत्वार्थ ।¹ इसमें जो 'ह्रीं' अक्षर है वह
देवी का बीज है—यह स्वतन्त्र रूप में एक मन्त्र है—यह मन्त्र देवी प्रणव है—
ओंकारवत व्यापक अर्थों से परिपूरित है । इसका संक्षिप्त अर्थ है—
इच्छा-ज्ञान-क्रिया, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसीभूत, शिवशक्तिस्फुरण । इसी
के विषय में 'श्रीदेव्यथर्वशीर्ष, में कहा गया है—'वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्र
समन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ।।'
वियत् (आकाश) = 'ह' । 'ईकार' । 'वीतिहोत्र' (अग्नि) अर्थात् 'र' ।
'अर्धचन्द्र' अर्थात् ( ँ ) । 'एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्ध चेतसः । ध्यायन्ति
परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ।।' यह 'ह्रीं' नामक देवी प्रणव 'एकाक्षर ब्रह्म' है ।
आचार्य भास्करराय कहते हैं ² कि यद्यपि 'तन्त्रराजतन्त्र' एवं शङ्कराचार्य की
'सौन्दर्यलहरी' में हादि विद्या का ही 'प्रथमोद्धार दिखाई पड़ता है'—अर्थात् उसको
ही प्राधान्य प्रदान किया गया है तथापि शास्त्रों में तो यह कहा गया है कि—'मन्त्रों
में श्रीविद्या एवं उसमें भी कादि विद्या प्रमुख है'—'श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र
कादिर्यथा परा ।।'
भास्करराय कहते हैं कि विद्याओं में 'कादिविद्या' ही प्रमुख है क्योंकि—
१. श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र कादिर्यथा परा'
२. 'यदक्षरैकमात्रेऽपि' (षोडशीघटक)
३. 'यदेकादशमाधारम्' (रहस्यार्थ प्रतिपाद्याक्षरशालित्व के कारण)
४. 'त्रिपुरोपनिषद' के एतन्मूलक एवं प्राधान्यप्रद होने के कारण
५. 'योगिनीहृदय' आदि ग्रन्थों में इसके प्राधान्य के कारण
६. शाङ्खायन श्रुति में 'चत्वार ई विभ्रति' में कादि विद्या को प्राधान्य दिये
जाने के कारण—
७. 'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला
मायया च पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या, —इस शाङ्खायन श्रुति में 'काम'
शब्द के प्रतीकात्मक प्रयोग के कारण 'कादिविद्या' ही अधिक प्रशस्त एवं
प्रमुख है ।
'कादि विद्या'—कामराजविद्या ककादिपञ्चदशवर्णात्मक है । इसीको कादि
विद्या' भी कहते हैं । तन्त्रराज तन्त्र में शिवजी देवी से कहते हैं—'हे देवी पार्वती ।
कादिविद्या तुम्हारा स्वरूप ही है । और उससे सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती
१. 'नित्यषोडशिकार्णव' 'वरिवस्यारहस्यम्'
२. प्रकाश