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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 530 में से

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पृष्ठ 189

प्रथमोऽंशः ८७
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
कूटत्रय का उच्चारण काल
(मात्राकाल जो जप के लिए नियत है)
१. प्रथमकूट = १० मात्राएँ
२. द्वितीयकूट = साढ़े दस मात्राएँ
३. तृतीयकूट = एक लव कम उन्तीस मात्राएँ
मन्त्राविर्भाव
क ए ई ल ह्रीं पञ्चदशी विद्या
(प्रथम कूट) (पञ्चदशाक्षरी मन्त्र)
वाग्भव कूट
ह स क ह ल ह्रीं
(मध्य कूट) कामराज कूट
स क ल ह्रीं
(अन्तिम कूट) शक्ति कूट
[चक्र-केन्द्र एवं वृत्त: क ए ई ल ह्रीँ / ह स क ह ल ह्रीँ / स क ल ह्रीँ — पञ्चदशाक्षरी श्रीविद्या]
कूटों के प्रत्येक अक्षर में—ब्रह्मा-भारती, विष्णु-पृथ्वी, रुद्र-रुद्राणी अधिपति निवास करते हैं ।
'पञ्चदशी मन्त्र' की स्थिति एवं स्वरूप—
(१) प्रथम कूट—प्रलयाग्नि के समान भासित होने वाला । अनाहत स्पर्शी ।
(मूलाधार से अनाहत तक व्याप्त)
(२) द्वितीय कूट—कोटि सूर्यवत भासमान । आज्ञाचक्र स्पर्शी । (अनाहत से
आगे से प्रारंभ होकर आज्ञा चक्र तक व्याप्त)
(३) तृतीय कूट—कोटि चन्द्रों के समान भासमान । (आज्ञा चक्र से आरम्भ
करके उन्मना एवं महाबिन्दु तक ।)
'सुषुम्नानाड़ी' के मूलाग्र भागों में दो 'सहस्रदल कमल' स्थित हैं । मध्य में
अष्टदल आदि तीस कमल स्थित है ।¹ मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत,
विशुद्ध आज्ञा नामक ६ कमल हैं ।
१. स्वच्छन्द तन्त्र