वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ७१
गायत्री को पञ्चमुखी कहा गया है—(१) गायत्री के पाँच मुख—(क) ॐ
(ख) भूर्भुवः स्वः (ग) तत्सवितुर्वरेण्यम् (घ) भर्गो देवस्य धीमहि (ङ) धियो यो नः
प्रचोदयात् ।। या (१) ४ वेद (२) यज्ञ ।।
गायत्री का स्वरूप—गायत्री के पाँच मुख हैं ।
गायत्री के चरण एवं देवता—(१) गायत्री का प्रथम चरण—ब्रह्मा, (२)
गायत्री का द्वितीय चरण—विष्णु, (३) गायत्री का तृतीय चरण—महेश । (ये देवता
गायत्री के प्रमुख शक्ति पुञ्ज हैं ।)
महर्षि उद्दालक ने इसी गायत्री विद्या की प्राण-प्रतिष्ठा की थी । गायत्री मन्त्र
के पञ्चमुखों के प्रतिकार्थ—(१) चार वेद एवं यज्ञ (२) पञ्चतत्त्वात्मक जगत् एवं
स्वदेह से पृथक् अपने को आत्मसंवित समझने का सङ्केत (३) आत्मा पर चढ़े
पञ्चकोशों से भी अपने को पृथक् समझने का सङ्केत ।
(१) पाँच कोश (२) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (३) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (४) पाँच प्राण
(५) पाँच उपप्राण (६) पाँच तन्मात्रायें (७) पाँच विषय (८) पाँच महाभूत (९)
पाँच यज्ञ (१०) पाँच अवस्था (११) पाँच शूल (१२) पाँच क्लेश (१३) भगवान्
शिव के पाँच मुख (१४) पाँच आकाश आदि विभिन्न पञ्चकों का प्रतिकार्थ अत्यन्त
रहस्यमय हैं ।
'पञ्चस्यास्यास्तु गायत्र्याः विद्यां यस्त्ववगच्छति ।'
गायत्री का महत्त्व—'गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यानमुच्यते । सिद्धि जनानां
सा माता नातः किंचिद् बृहत्तरम् ॥'१
गायत्री में स्थित नौ पद—(१) तत् (२) सवितुः (३) वरेण्यं (४) भर्गो (५)
देवस्य (६) धीमहि (७) धियो (८) यो नः (९) प्रचोदयात । (इसीलिए यज्ञोपवीत
में ९ सूत्र होते हैं । यज्ञोपवीत में तीन ग्रंथियाँ ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि एवं रुद्रग्रंथि—
इन देवों के प्रतीक है । यज्ञोपवीत गायत्री का एवं द्विजत्व का प्रतीक है । बड़ी
ग्रंथि ॐ की एवं तीन शेष ग्रंथियाँ भूः भुवः स्वः की प्रतीक हैं ।
'भूः' = अन्नमय कोश । 'भुवः' = प्राणमय एवं मनोमय कोश । 'स्वः' =
विज्ञानमय-आनन्दमय कोश । (सृष्टि के तीन स्तर = पृथ्वी, पाताल,
स्वर्ग । साधना के पिण्ड गत तीन स्तर—भूः, भुवः, स्वः) गायत्री 'त्रिपदा' कही
गई है ।२
गायत्री का निर्गुण ध्यान—'गायत्रीहृदय' में कहा गया है—'आत्मान आकाशो
भवति, आकाशाद्वायुर्भवति, वायोरग्निर्भवति, अग्नेरोंकारो भवति, ॐकाराद् व्याहति-
१. गायत्री लहरी, गायत्री मञ्जरी ।
२. गायत्री के तीन पाद या चरण—(१) 'भूः'—भूक्षेत्रीय (२) 'भुवः'—
पाताललोकीय (३) 'स्वः'—स्वर्ग एवं स्वर्गोपरि से सम्बद्ध । (१) 'भूः'—में
मन्त्रदीक्षा (२) 'भुवः'—में अग्नि दीक्षा (३) 'स्वः'—में ब्रह्म दीक्षा ।