वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० वरिवस्यारहस्ये
(१) 'कादि विद्या'—'क' से प्रारंभ (२) 'हादि विद्या'--'ह' से प्रारंभ (३)
'सादिविद्या'—'स' से प्रारंभ । पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के ३ ककार + २ हकार =
('शिववर्ण') शेष बीजाक्षर = ('शक्ति वर्ण') ३ ह्रींकार (शिवशक्त्यात्मक) ।
('पञ्चदशीविद्या' = षोडशी 'विद्या' = पञ्चदशाक्षरी विद्या ।)
विद्यावर्णानुद्धरति—
क्रोधीशः श्रीकण्ठारूढः कोणत्रयं लक्ष्मीः ।
मांसमनुत्तररूढं वाग्भवकूटं प्रकीर्तितं प्रथमम् ॥ ९ ॥
शिवहंसब्रह्मवियच्छक्राः प्रत्येकमक्षरारूढाः ।
द्वितीयीकं कूटं कथितं तत् कामराजाख्यम् ॥ १० ॥
शिवतो वियतो मुक्तं तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।
हृल्लेखानां त्रितयं 'कूटत्रितयेऽपि योज्यमन्ते स्यात् ॥ ११ ॥
(कूटत्रय का स्वरूप)
(क) वाग्भव कूट का स्वरूप—'क ए ई ल'-ह्रीं—
श्रीकण्ठ (अ) से समन्वित क्रोधीश (क), कोणत्रय (त्रिकोण = त्रिभुज 'ए'),
लक्ष्मी (ई), अनुत्तर (अ) एवं मांस (ल) से युक्त प्रथम कूट 'वाग्भवकूट' कहा गया
है ॥ ९ ॥
(ख) कामराज कूट का स्वरूप— 'ह स क ह ल'-ह्री—
शिव (ह), हंस (स्), ब्रह्मा (क्), वियत् (ह), एवं शक्र (ल्),
(वर्ण-समुदाय) अक्षर (अ) से समन्वित होकर द्वितीय कूट 'कामराजकूट' कहा गया
है ॥ १० ॥
(ग) शक्ति कूट का स्वरूप—'स क ल-ह्रीं'—
शिव (ह) एवं वियत् (ह) से विरहित यही ('कामराज कूट') 'शक्तिकूट' नाम
वाला तृतीय (कूट) है । तीनों कूटों में अन्त में हृल्लेखा त्रिक जोड़ लेना चाहिए
(अर्थात् प्रत्येक कूट के अन्त में 'ह्रीं' जोड़ लेना चाहिए) ॥ ११ ॥
- प्रकाश *
क्रोधीशो ब्रह्मा च ककारः । श्रीकण्ठोऽनुत्तरमक्षरं चाकारः । तमारूढस्तेन
युक्तः । कोणत्रयं योनिः । लक्ष्मीः कमला । मांसं शक्रश्चेन्द्रः । शिवो वियच्च हकारः ।
हंसः सकारः । अक्षरसमूहात्मकत्वात् कूटत्वव्यपदेशः ॥ ९-११ ॥ - सरोजिनी *
उपर्युक्त श्लोक त्रय में पञ्चदशी (पञ्चदशाक्षरी । षोडशी) मन्त्र एवं उसके कूटों
का विवरण प्रस्तुत किया गया है जो इस प्रकार है—