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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 530 में से

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७२ वरिवस्यारहस्ये
र्भवति, व्याहृतितो गायत्री भवति, गायत्र्याः सावित्री भवति, सावित्र्याः सरस्वती भवति,
सरस्वत्या वेदा भवन्ति, वेदेभ्यो लोकाः ॥१
सम्पूर्ण लोकों का वेदों में, वेदों का सरस्वती में, सरस्वती का सावित्री में,
सावित्री का गायत्री में, गायत्री का व्याहृतियों में, व्याहृतियों का ओंकार में,
ओंकार का अग्नि में, अग्नि का वायु में, वायु का आकाश में एवं आकाश का
ब्रह्मस्वरूप अपनी आत्मा में लय करने का ध्यान करें । 'सर्वमस्मीत्युपासीत तद्
व्रतम् तद् व्रतम् ॥'२
गायत्री का स्वरूप—'गायत्री पुरश्चरण पद्धति' नामक ग्रन्थ में ऋषि
याज्ञवल्क्यं ब्रह्मा से गायत्री के गोत्र, अक्षर, पाद, शिर एवं कुक्षि के विषय में
प्रश्न करते हैं । ब्रह्माजी का उत्तर निम्नांकित है—
(१) गायत्री का गोत्र = सांख्सायन । (२) गायत्री के वर्ण = बत्तीस ।
(३) गायत्री के पाद = चार, अन्त के पाद की गणना न होने के कारण गायत्री
त्रिप