वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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८२ वरिवस्यारहस्ये
चान्द्रखण्ड का 'ह्रीं' = चित्रा ॥
भगवती का त्रिखण्डात्मक रूप
| खण्ड | मन्त्र का भाग | मन्त्र का भाग | षड् कमलों का भाग | कुण्डलिनी भाग |
|---|---|---|---|---|
| सोमखण्ड | शक्तिकूट | शिव के ४ चक्र | आज्ञा एवं विशुद्ध | सोमकुण्डलिनी |
| सूर्यखण्ड | कामकूट | चतुर्दशार एवं बहिर्दशार | हृदय एवं मणिपूर | सूर्य कुण्डलिनी |
| अग्निखण्ड | वाग्भवकूट | अन्तर्दशार, अष्टार, बिन्दु | स्वाधिष्ठान एवं मूलाधार सहितं त्रिकोण | अग्निकुण्डलिनी |
| (१) वाग्भव कूट : आग्नेय : भगवती का मुख है । | ||||
| (२) कामकला कूट : सौर : भगवती का कण्ठ से कटिपर्यन्त रूप है । | ||||
| (३) शक्ति कूट : चान्द्र : भगवती का कटि के नीचे का भाग है जो कि | ||||
| सृजन शक्ति का रूप है । | ||||
| (क) प्रथम कूट : वाग्भव कूट : ११ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक | ||||
| १७, श्लोक ३१, (१०) | ||||
| (ख) द्वितीय कूट : कामराज कूट : ११ १/२ मात्रा काल—एक लव कम । | ||||
| श्लोक १७ (१० १/२) | ||||
| (ग) तृतीय कूट : शक्ति कूट : ८ १/२ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक | ||||
| १८ एक लव कम । (८ १/२) | ||||
| श्रीविद्या का मन्त्र पंद्रह अक्षरों का है अतः इस मन्त्र को 'पञ्चदशी' कहते | ||||
| हैं । उसमें १६वाँ बीज और लगा देने से वही 'षोडशीविद्या' बन जाती है । | ||||
| 'कूट' एवं विद्या— | ||||
| पञ्चदशीमन्त्र के (१) प्रथम पञ्चाक्षर = 'वाग्भवकूट' कहलाते हैं । | ||||
| (२) द्वितीय षडाक्षर = 'कामकलाकूट' कहलाते हैं । | ||||
| (३) अन्तिम अक्षरचतुष्टय = 'शक्तिकूट' कहलाते हैं । |