सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 184

८२ वरिवस्यारहस्ये
चान्द्रखण्ड का 'ह्रीं' = चित्रा ॥
भगवती का त्रिखण्डात्मक रूप

खण्डमन्त्र का भागमन्त्र का भागषड् कमलों का भागकुण्डलिनी भाग
सोमखण्डशक्तिकूटशिव के ४ चक्रआज्ञा एवं विशुद्धसोमकुण्डलिनी
सूर्यखण्डकामकूटचतुर्दशार एवं बहिर्दशारहृदय एवं मणिपूरसूर्य कुण्डलिनी
अग्निखण्डवाग्भवकूटअन्तर्दशार, अष्टार, बिन्दुस्वाधिष्ठान एवं मूलाधार सहितं त्रिकोणअग्निकुण्डलिनी
(१) वाग्भव कूट : आग्नेय : भगवती का मुख है ।
(२) कामकला कूट : सौर : भगवती का कण्ठ से कटिपर्यन्त रूप है ।
(३) शक्ति कूट : चान्द्र : भगवती का कटि के नीचे का भाग है जो कि
सृजन शक्ति का रूप है ।
(क) प्रथम कूट : वाग्भव कूट : ११ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक
१७, श्लोक ३१, (१०)
(ख) द्वितीय कूट : कामराज कूट : ११ १/२ मात्रा काल—एक लव कम ।
श्लोक १७ (१० १/२)
(ग) तृतीय कूट : शक्ति कूट : ८ १/२ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक
१८ एक लव कम । (८ १/२)
श्रीविद्या का मन्त्र पंद्रह अक्षरों का है अतः इस मन्त्र को 'पञ्चदशी' कहते
हैं । उसमें १६वाँ बीज और लगा देने से वही 'षोडशीविद्या' बन जाती है ।
'कूट' एवं विद्या—
पञ्चदशीमन्त्र के (१) प्रथम पञ्चाक्षर = 'वाग्भवकूट' कहलाते हैं ।
(२) द्वितीय षडाक्षर = 'कामकलाकूट' कहलाते हैं ।
(३) अन्तिम अक्षरचतुष्टय = 'शक्तिकूट' कहलाते हैं ।