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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 530 में से

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प्रथमोंऽशः ६९
(३) 'वरेण्यं' = (वृञ् वरणे)—प्रार्थनीय श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान को जीव प्राप्त करता
है।
(४) 'भर्गो देवस्य' = अज्ञान का भर्जन (विनाश) होता है।
(५) 'धीमहि' = विनाश के बाद जीवन्मुक्ति काल में ध्यानादि साधन
अपनाये जाते हैं। तत्पश्चात्—
(६) 'धियः' = आत्मतत्त्व विषयक चरम साक्षात्काररूप बुद्धि होती है। और
इसके बाद अभेदभाव से परमात्म प्राप्ति रूप मोक्ष होता है। वह परमात्मा कौन
है?
(७) 'यो नः प्रचोदयात्'—(१) जो हमारा सबका अन्तर्यामी प्रेरक है वह
परमात्मा। (२) न्यायदर्शन के अनुसार—सृष्टि की आरम्भावस्था में प्राणियों के
अदृष्टवश परमाणु में आद्य क्रिया प्रारंभ होती है—फिर 'यो नः'—(यूमिश्रणे)—
परमाणु द्वय आदि का मिश्रण होता है। फिर—'धियः' = आत्मा-मन एवं
बुद्धि-संयोग पूर्वक सांसारिक बुद्धिः सांसारिक भोगादि होते हैं। फिर—'धीमहि' =
अर्थात्—ध्यानादि साधनों द्वारा तत्वविषयक धी (ज्ञान) की प्राप्ति होती है।
'अदेवस्य भर्गो'—अज्ञान का भर्जन। 'वरेण्यं' = (मिथ्या ज्ञान के विनाश के
बाद वरेण्य अपवर्ग की प्राप्ति होती है ।) अपवर्ग क्या है? 'सवितुः'—कर्त्तास्वरूप
आत्मा की। 'तत्' = एकविंशति दुःख का अत्यन्त ध्वंस रूप अकर्तृत्व अवस्था।
(३) योगदर्शन के अनुसार गायत्रीमन्त्र की सार्थकता एवं एकात्मता—'प्रचोदयात्'
= कुण्डल्योत्थापन क्रिया में कुण्डलिनी-समुत्थान से लेकर षट्चक्रभेदनपूर्वक सहस्रार
कमल विकास पर्यन्त निःशेष क्रिया-कलाप, प्र + चुद् धातु से सङ्केतित है।
सारांश—सविता (क्लेश आदि से अस्पृष्ट परमात्मा) हमारी बुद्धि को शुभ
योग की क्रिया की ओर प्रवृत्त करे। आदि ॥
'गायत्री' सर्वात्मक है—'गायत्री' चतुर्विंशत्यक्षरात्मक मन्त्र एवं उससे बोधित
देवता का ही वाचक नहीं है—'गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च' (छा०)
'गायत्रीपुरश्चरण' में एकता का विधान भी है। उपासना के प्रसङ्ग में—'मन्त्र गुरु
देवतात्मकत्वेनात्मानं भावयन् यथाशक्ति गायत्री जपसमर्थः ॥'
गायत्री ब्रह्म की हृदय में उपासना—गायत्रीब्रह्म हृदयाकाश में ध्येय है—
योऽयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत्पूर्णमप्रवर्तिपूर्णमप्रवर्तिनीं श्रियं लभते य एवं वेद ॥'
(उपनिषद)
गायत्री की अङ्गोपासना—चिदाशाकाशस्वरूप स्वयंज्योति गायत्री ब्रह्म की
उपासना के अङ्गरूप द्वारपालों की उपासना। (छान्दोग्यो०)
गायत्री ब्रह्मभवनरूप हृदय के ५ सुषि (छिद्र) हैं—
(१) पूर्वाभिमुखी पुरुष के हृदय का पूर्व छिद्र रूप द्वार—इसका द्वारपाल
प्राण है, वही चक्षु है, वही आदित्य है। प्राणरूप तेज का ध्यान—