वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 186, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ वरिवस्यारहस्ये
'पञ्चदशाक्षरी' मन्त्र या 'पञ्चदशी विद्या' (पञ्चदशाक्षरी विद्या)—
१. स्वरूप—'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं ।'
२. प्रादुर्भाव-स्रोत—'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्र-
मिन्द्रः ।'
३. निहित वर्ण—इसमें वर्ण निहित हैं इसीलिए इसे 'पञ्चदशाक्षरी' कहते
हैं ।
४. मूल वर्ण—पुनरावृत्ति-रहित वर्णों की दृष्टि से इस मन्त्र में निम्न ७ वर्ण
मात्र स्थित हैं—'क' 'ए' 'ई' 'ल' 'ह्रीं' 'ह' 'स' ।
५. वर्ण-सङ्घटन—(क) तीन ककार (ख) एक एकार (ग) एक ईकार (घ)
तीन लकार (ङ) तीन ह्रींकार (च) दो हकार (छ) दो सकार ।
६. पुनरावृत्ति-शून्य वर्ण—'ए' 'ई' । इसमें भी 'ह्रीं' में निहित ईकार को
ध्यान में रखा जाय तो ईकार चार हो जायेंगे अतः पुनरावृत्ति-शून्य वर्ण
मात्र एक ही शेष रह जाएगा और वह है 'ए' ।
७. कूट—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में तीन कूट हैं—(१) वाग्भवकूट (२) कामराज
कूट (३) शक्तिकूट ।
८. कूटों की वर्ण संख्या—(क) 'वाग्भव कूट' (पाँच) + (ख)
'कामराजकूट' (छः) + (ग) 'शक्तिकूट' (चार) = १५
१०. नाद समन्वित एवं आत्मप्रतिष्ठित सूक्ष्म वर्णों सहित वर्ण संख्या—
(क) 'वाग्भवकूट' = १८
(ख) 'कामराजकूट' = २२
(ग) 'शक्तिकूट' १८
महायोग = (१८ + २२ + १८) = ५८
'प्रथमेऽष्टादश वर्णा द्वाविंशविरक्षराणि मध्ये स्युः ।
प्रथमेन तुल्यमन्त्यं सङ्घातेनाष्ट पञ्चाशत् ।।
११. वर्ण-संख्या ५८ कैसे?
ह्रीं में १२ वर्ण कहाँ से आ गए ? उत्तर—
हृल्लेखायाः स्वरूपं तु व्योमाग्निर्वाम लोचना । ┐
बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।। │ ह्रींकार में
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादश संहति । ┤ निहित १२
बिन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ।। ┘ वर्ण