वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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इस ‘पञ्चदशाक्षरी विद्या’ में तीन कूट विद्यमान हैं—
(१) ‘वाग्भव कूट’ = १८ वर्ण ⎤ योग = ५८ वर्ण ॥
(२) ‘कामराज कूट’ = २२ वर्ण¹ ⎥ ‘संहत्याष्टपञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्या’
(३) ‘शक्ति कूट’ = १८ वर्ण² ⎦ (भास्कर राय-‘प्रकाश’)
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(१) क ए ई ल ह्रीं = (वाग्भव कूट) — ‘कादिविद्या’
(२) ह स क ह ल ह्रीं = (कामराज कूट) — ‘हादिविद्या’
(३) स क ल ह्रीं = (शक्ति कूट) — ‘सादिविद्या’
मनु, चन्द्र कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, शिव, दुर्वासा आदि के सम्प्रदायों में से
अब मात्र (१) ‘कामदेव (मन्मथ)’ एवं (२) ‘लोपामुद्रा’ सम्प्रदाय ही अवशिष्ट रह
गए हैं । इन दोनों में भी ‘मन्मथ सम्प्रदाय’ अधिक प्रचलित है । ‘कामराज-विद्या’
(१५ अक्षर वाली) के दो भेद हैं—(क) शाक्त (ख) शांभव । शाक्त
कामराज-विद्या—ऊर्ध्वाम्नाय से सम्बद्ध है और कीलित नहीं है । जबकि शांभव
कामराज-विद्या पूर्वाम्नाय से सम्बद्ध है तथा सदोष है । ‘लोपामुद्रा विद्या’ भी १५
अक्षरों वाली है और यह द्विभेदात्मक है—(१) शाक्त (२) शाम्भव ।
(१) मनु द्वारा उपासित श्रीविद्या—१८ वर्ण । (२) दुर्वासोपासित विद्या के
वर्ण—१३ वर्ण । (३) चन्द्र एवं कुबेर से उपासित श्रीविद्या—२२ वर्ण । (४)
कहीं-कहीं इन्द्र एवं अग्नि के स्थान पर नन्दी एवं विष्णु के सम्प्रदाय का उल्लेख
मिलता है । (५) बह्वचोपनिषद् में जिस ‘कादि’ ‘हादि’ एवं ‘सादि’ विद्याओं का
उल्लेख किया गया है इसका सम्बन्ध शांभव विद्या से है ।³
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र एवं उसका स्वरूप—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र—क ए ई ल ह्रीं ।
ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं (१५ वर्ण) ॥
मन्त्रावयव—(१) ३ ककार (२) १ एकार (३) १ ई (४) ३ लकार (५)
३ ह्रींकार (६) २ हकार (७) २ सकार (८) ह्रीं में—ह, र, ई, बिन्दु । ‘ह्रीं’—
ह, र, ई, बिन्दु । ‘ह्रीं’—ह, र, ई बिन्दु । (सामान्य गणनानुसार २७ वर्ण या
मातृकायें) पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के तीन विभाग (१) वाग्भव कूट (२) कामराज कूट
(३) शक्ति कूट ।
(१) प्रथम कूट = १८ वर्ण ⎤ ‘एवं च प्रथम-तृतीय कूटे अष्टादश
(२) द्वितीय कूट = २२ वर्ण ⎥ वर्णात्मके । मध्यमकूटं तु चतुरधिकम
(३) तृतीय कूट = १८ वर्ण ⎥ संहत्याष्ट पञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्येति
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ⎥ सिद्धम् ॥’
५८ ⎦
१. भास्करराय प्रथम तृतीय कूटे अष्टादशवर्णात्मके । (प्रकाश)
२. मध्यमकूटं तु चतुरधिकम्
३. गोपीनाथकविराजः ‘योगिनीहृदय की भूमिका’ (Preface to the 2nd edition)