वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोँऽशः ७५
'हल्लेखा' 'ह्रीं' के अन्तर्गत (१) व्योम, (२) अग्नि, (३) वामलोचना (ई),
(४) बिन्दु (.), (५) अर्धचन्द्र, (६) रोधिनी, (७) नाद, (८) नादान्त, (९)
शक्ति, (१०) व्यापिका, (११) समना, (१२) उन्मनी ॥ (ह्रींकार के १२
अवयव) ॥ 'नाद' किसे कहते हैं? 'बिन्दु', 'अर्धचन्द्र', 'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त',
'शक्ति', 'व्यापिका', 'समना' एवं उन्मनी—इस नव के समूह को नाद कहते हैं—
'बिन्दादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ॥'
'बिन्दु विनिर्मुक्तानामष्टा नामेव नाद संज्ञा मन्त्र शास्त्रे तथापि व्यवहार सौकर्याय
तत्सहितानामेव सात्र कृता इति ध्येयम् ।१ यद्यपि बिन्दु को छोड़कर शेष अङ्गों को
ही 'नाद' कहा जाता है किन्तु-व्यवहार-सौविध्य के लिए उसे भी नाद में (यहाँ)
अन्तर्भुक्त कर लिया गया है ।
(क) १८ वर्ण कूट 'वाग्भव कूट'—१. क् + २. अ ('क'), योनि।
कोणत्रय ३. ('ए'), लक्ष्मी ४. ('ई'), ५. ल् + ६. अ ('ल') । 'ह्रीं' के १२
अवयव = ६ + १२ = १८ अवयव ॥
(ख) २२ वर्ण कूट 'कामराजकूट'—(१) ह + अ ('ह') (२) स + अ
('स') (३) क + अ ('क') (४) ह + अ ('ह') (५) ल् + अ ('ल') = १०
एवं 'ह्रीं' के १२ अवयव = १० + १२ = २२ अवयव ।
(ग) १८ वर्ण कूट 'शक्ति कूट'—'स्' + अ = ('स'), (२) क् + अ
('क') (३) ल् + अ ('ल') = ६ एवं 'ह्रीं' के १२ अवयव = ६ + १२ =
१८ अवयव । 'वाग्भव कूट' के १८, कामराजकूट के २२ अवयव एवं शक्ति कूट
के १८ अवयव = १८ + २२ + १८ = ५८ अवयव ।
सारांश—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में ५८ वर्ण हैं—(प्रथमेऽष्टादश वर्णा द्वाविंशति-
रक्षराणि मध्ये स्युः । प्रथमेन तुल्यमन्त्यं संघाते नाष्टपञ्चाशत ।')२
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का अर्थ—'कादि' 'हादि' एवं 'सादि' ये तीन प्रकार की
विद्यायें भी बहुचर्चित हैं । 'योगिनीहृदय' 'तन्त्रराजतन्त्र' 'मातृकार्णव' 'त्रिपुरार्णव'—
'कादि मत' के ग्रन्थ हैं ।३ भास्करराय ने भावनोपनिषद की टीका में 'योगिनीहृदय'
को 'कादिमत' का कहकर भी 'वरिवस्यारहस्यम्' में 'योगिनीहृदय' की हादि मत के
अनुकूल व्याख्या स्वीकार की है ।
यद्यपि तन्त्रराजादौ सौन्दर्यलहर्यां चं हादिविद्याया एव प्रथममुद्धारो दृश्यते, तथापि
'श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तत्र कादिर्र्यथा परा' इति वचनात्, षोडशीघटकत्वाच्च,
'यदक्षरैकमात्रेऽपि', 'यदेकादशमाधारम्' इत्यादिरहस्यार्थप्रतिपाद्याक्षरशालित्वाच्च,
त्रिंशत्यामस्या एवादराच्च, त्रिपुरोपनिषद्येतन्मूलकत्वेनैवान्यासासुद्धाराच्च, योगिनीहृदया-
दावुक्तानामिहापि वक्ष्यमाणानामर्थनामत्रैव स्वारस्याच्च, शाङ्खायनश्रुतौ 'चत्वार ईं
१. भास्करराय—'प्रकाश' २. 'वरिवस्यारहस्यम्'
३. 'मनोरमा', भास्करराय—भावनोपनिषद की टीका में ।