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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 530 में से

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पृष्ठ 175

प्रथमोऽंशः ७३
'य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम् तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ । स लोके न
प्रणश्यति ।'१ मनुस्मृतिकार कहते हैं कि—एक अक्षर, मात्र परब्रह्म है, परमतप मात्र
प्राणायाम है, परात्पर मात्र सावित्री है एवं सत्य मात्र मौन है—क्योंकि उसी से
उसकी उत्कृष्टता है—'एकाक्षरं परब्रह्म प्राणायामः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति
मौनात्सत्यं विशिष्यते ।'२ 'पद्मपुराण' में गायत्री-जाप को सर्व-पाप-विनाशक कहा
गया है—'ब्रह्महत्यादि पापानि गुरूणि च लघूनि च । नाशयत्यचिरेणैव गायत्री जापको
द्विजः ।।३
आचार्य शङ्कर ने 'प्रपञ्चसार तन्त्र' में गायत्री की विशद व्याख्या की है—
(१) गायत्री 'चतुर्विंशत्यक्षरात्मक'४ है । इसीलिए शङ्कराचार्य कहते हैं—
'चतुर्विंशतितत्त्वभेदैः ।'५
(२) यह वेदों का सार है—'अन्वर्थकं मन्त्रमिमन्तु वेदसारं पुनर्वेदविदो
वदन्ति ।।'६
(३) तार एवं व्याहृति आदि के साथ ही इस पराशक्ति गायत्री की उपासना
की जानी चाहिए—'तार व्याहृतिसंयुता सहशिरो गायत्र्युपास्या परा ।'७
(४) सप्त व्याहृतियों का सम्बन्ध (क) भूलोक (ख) भुवर्लोक (ग) स्वर्लोक
(घ) महर्लोक (ङ) जनलोक (च) तपलोक (छ) सत्यलोक—इन सातों लोकों से
है—'सभूर्भुवः स्वश्च महोजनस्तपः समन्वितं सत्यमिति क्रमेण ।'८
(५) गायत्री में प्रयुक्त प्रणव 'ॐ' के दो रूप हैं—१. निर्गुण २. सगुण ।९
आचार्य भास्कर के कथनानुसार—'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा
मातरिश्वाऽभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया च, पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या ।।' यह
ऋचा गायत्री मन्त्र को प्रकट करती है । इस ऋचा में पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का उद्धार
भी निहित है । यह ऋचा आदि विद्या गायत्री की उद्धारिका है । यह कामराजो-
पासिता (कादि) विद्या का मन्त्र है । उक्त मन्त्र का रहस्यार्थ निम्नांकित है—
'काम' (क), 'योनि' (ए), 'कमला' (ई), 'वज्रपाणि' (इन्द्र = ल), 'गुहा'
(ह्रीं), ह, स, मातरिश्वा—वायु (क), अभ्र—आकाश (हा) इन्द्र (ल), गुहा (ह्रीं),
स क ल, माया (ह्रीं) ।।
सारांश—'क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं' (पञ्चदशाक्षरी
मन्त्र) ।।
१. महाभारत (भीष्मपर्व अ० १४।१६) २. मनुस्मृति ।
३. पद्मपुराण 'ऐहिकामुष्मिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत् (अग्नि पु०) सर्वपापानि
नश्यन्ति गायत्री जपतोन्नृप । (भवि०पु०)
४. प्रपञ्चसार विवरण (पद्मपादाचार्य) ५-८. प्रपञ्चसार तन्त्र
९. प्रपञ्चसार विवरण