सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

प्रथमोऽंशः ४५
(२) 'पश्यन्ती' —परमात्मा 'बहुस्यां प्रजायेय' का जो ईक्षण करता है उसी की
परिणति पश्यन्ती है १—'तादृशमीक्षणमेव प्रवृत्तिनिमित्तीकृत्य तस्यां पश्यन्तीति पदं
प्रवर्तते ।'
(३) 'उत्तीर्णा' — यहीं 'पश्यन्ती' ही उत्तीर्णा भी कही जाती है ।२ 'सैव च
पश्यन्त्याख्यामातृका करणसरणित उत्तीर्णत्वा दुत्तीर्णोत्युच्यते ।।' उसके अवयव
वामादिक ८ शक्तियाँ है—तदवयवाश्च वामादयोऽष्टौ शक्तयोऽन्यत्र प्रपञ्चिताः ।।
(४) 'नौ नाद' — यही पश्यन्ती व्यष्टि-समष्टि रूप से ९ प्रकार की है—
'अतःसैव व्यष्टि-समष्टि वेषेण नवविधा ततो नव नादा अविकृत शून्यादयो जाताः ।।३
(५) उसकी समष्टि—नाद, ध्वनि आदि कही जाती है—(तत्समष्टिश्च नाद
ध्वन्यादि पद वाच्या) ।।
'मध्यमा वाक्'—परा की भाँति अतिसूक्ष्म एवं वैखरी की भाँति अति स्थूल—
इन दोनों कोटियों से परे मध्य स्तर पर व्यक्त वाक् 'मध्यमा' है । ('नातिसूक्ष्मा
परावन्नातिस्थूला वैखरीवद अतो मध्यमाख्या ।।) इसीलिए उसे 'मध्यमा' कहते भी
हैं । मध्यमा की स्थिति 'मध्यमाख्या मातृका मध्यमावयवरूपमविकृत शून्य स्पर्श नाद
ध्वनि बिन्दु शक्ति बीजाक्षराख्यं नादनवकं मूलाधारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च
स्थितम् ।।'४
नव नाद एवं वर्णमाला—(नव नाद—वर्णमाला की उत्पत्ति इन्हीं ९ नादों से
होती है—'नवभिर्नादैरक च ट त प य श ला ख्य वर्ग नवकवती वैखर्याख्या
मातृका जाता ।'५)—९ नादों से वैखरी वाक् उत्पन्न होता है । 'वैखरी' नामकरण
क्यों ?६—
'स्पष्टतरत्वात् खं कर्णविवरवर्ति नभोरूप श्रोत्रेन्द्रियं राति गच्छति, तज्जन्य ज्ञान
विषयो भवति इति ।
'ख' आकाश का नाम है । आकाश का सम्बन्ध श्रोत्रेन्द्रिय से है अतः
आकाश की इन्द्रिय स्रोत में जो (राति) जाता है, प्रवेश करता है (राति = गच्छति)
वह 'वैखरी' है ।६
प्रणवात्मक निश्चल कुण्डलिनी ही 'परावाक्' है । पश्यन्ती आदि परावाक् की
ही विकृतियाँ हैं । 'प्रणव' उच्चारण से पूर्व संविदात्मक 'पर प्रणव' में स्थित रहता
है फिर यह ज्वाला-प्रवाह रूप शब्दभेदों को पार करता हुआ—यह ज्योतिलिङ्गाकार
चिदग्निरूप प्रणव भ्रमर के समान गुञ्जन करता हुआ मूलाधार से सुषुम्णा मार्ग में
प्रवेश करता है । और द्वादशान्त में स्थित हो जाता है ।
'परावाक्' अव्यक्त विश्वबीज है—भारतीय ऋषियों ने मानव जीवन के जो
चार लक्ष्य निर्धारित किये हैं उन्हें ही शब्दान्तर में 'पुरुषार्थ चतुष्टय' कहा गया है ।
१-६. वरिवस्यारहस्यम्

४६ वरिवस्यारहस्ये
पुरुषार्थ चतुष्टय में प्रथम पुरुषार्थ 'धर्म' है । जिन्होंने धर्म का साक्षात्कार किया
उन्होंने अनुभव किया कि चराचर समस्त जगत् का मूलाधारभूत तत्त्व सूक्ष्म वाक् है
और जो धर्मतत्त्व का साक्षात्कार नहीं कर पाये वे जगदाधिष्ठान रूप में स्थित इस
सूक्ष्म वाक् तत्त्व का संधान नहीं कर सकते—
'यां सूक्ष्मां नित्यामतीन्द्रियां वाचम् ऋषयः साक्षात्कृतधर्माणो मन्त्रदृशः पश्यन्ति,
ताम् असाक्षात्कृतधर्मेभ्यः परेभ्यः आदि ।।'१
यह सूक्ष्म वाक् 'परावाक्' का पर्याय है । सूक्ष्म वाक् के विषय में दो दृष्टियाँ
हैं । शब्दब्रह्मवादी आचार्यों की दृष्टि के अनुसार सूक्ष्म वाक् पुरुष की समवायिनी
शक्ति तथा अमृत कला है । सिद्धान्त शैव मत के अनुसार सूक्ष्म वाक् 'बिन्दु' का
कार्य है । शैव दृष्टि के अनुसार सूक्ष्म वाक् पुरुष भी समवायिनी शक्ति नहीं है
प्रत्युत् यह आत्मा में अविभक्त रूप में स्थित रहती है । यह सूक्ष्म वाक् (परावाक्)
नित्य भी नहीं है । प्रत्युत् यह कार्यरूप एवं अनित्य है । इसी का नामान्तर
शब्दब्रह्म, रवि, या सूर्य है । इसका भेदन करने से विवेक ज्ञान का उदय होता है
और शब्दब्रह्म का भेदन करने से मुक्ति होती है । शब्दब्रह्मवादी सूक्ष्म वाक् से
'पश्यन्ती' को अभिन्न स्वीकार करते हैं जबकि शाक्त आचार्य इसे आत्मा या
परमशिव की पराशक्ति मानते हैं । जब आत्मस्वरूप में आत्मस्वरूप की दिदृक्षा
होती है तब प्रकाशांश एवं विमर्शांश (शान्ता एवं अम्बिका शक्तियाँ) दोनों में
सामरस्यागम होता है । इसी सामरस्य का अभिधान है 'परावाक्' या परमातृका' ।
इसी में जगत् के मूल तत्त्व (३६ .तत्त्व) विश्वबीज के रूप में अव्यक्तावस्था में
विद्यमान रहते हैं और सृष्टिबेला में अभिव्यक्त हुआ करते हैं । 'परावाक्' अद्वैतात्मक
अखण्ड ज्ञान, समस्त भावों की पूर्णता, पर बोध, एवं 'परम परामर्श' है ।
जगद्रचना के प्रारम्भ में परावाक् में स्थित वेदशास्त्रादिक निम्नभूमिका में अवतीर्ण
होते हैं और सर्वप्रथम हृदय के अन्दर परम बोध के रूप में अस्फुट अहंसंज्ञान के
उस स्वरूप का आविर्भाव होता है जिसके विमर्श से वाच्य-वाचकभाव विद्यमान नहीं
रहता ।
तन्त्र का मूलस्वरूप भी परावाक् रूप है क्योंकि 'परावाक्' परमात्मा की
'पराशक्ति' है । यह आत्मबोध की परावस्था है । 'परमाकला' द्वारा आत्मस्फुरण के
साक्षात्कार की परिणति ही 'परावाक्' है ।'
आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला ।
अम्बिकारूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ।।'२
अमृतानन्द 'दीपिका' में कहते हैं कि 'वह सर्ववर्णाशिभूत विमर्शरूपा ('परमा')
विमर्शशक्ति ('कला') अपने अर्थात् परशिव के ('आत्मनः') पश्यन्ती आदि के क्रम
से वैखरीपर्यन्त, विमर्शन ('स्फुरण') का जब दर्शन करना चाहती है तब
परमाशान्तात्मिका होकर प्रकाशांशस्वरूपा अम्बिका के साथ सामरस्य प्राप्त करके
१. पुराकल्प २. योगिनीहृदय

प्रथमोऽंशः ४७
(‘अम्बिका रूपमापन्ना’) जिस स्वरूप में प्रकट होती हैं उसे ‘परावाक्’ कहते हैं—
‘सा परमा सर्ववर्णांशभूतविमर्शरूपा, कला विमर्शशक्ति, आत्मनः परशिवस्य, स्फुरणं
पश्यन्त्यादि क्रमेण वैखरीपर्यन्तं विमर्शनम्, पश्येद्, द्रष्टुमिच्छेत् तदा परमा
शान्तात्मिका भूत्वा अम्बिका रूपमापन्ना प्रकाशांशमात्राया अम्बिकायाः सामरस्यमापन्ना
‘परावाक्’ समुदीरिता ।।' यही परावाक् ‘परामातृका’ भी कही जाती है ।१
वाक् तत्व के - चारों रूपों का परमात्मा की संविदात्मक आत्म शक्तियों के
साथ सम्बन्ध है, यथा—
इच्छाशक्ति—पश्यन्ती वाक् = इच्छाशक्ति + वामाशक्ति—पश्यन्ती
ज्ञानशक्ति—मध्यमा वाक् = ज्ञानशक्ति + ज्येष्ठाशक्ति—मध्यमा
क्रियाशक्ति—वैखरी वाक् = क्रियाशक्ति + रौद्रीशक्ति—वैखरी२
शक्तिचक्र के चार प्रकार हैं—(१) खेचरी (२) गोचरी (३) दिक्चरी (४)
भूचरी । इन्हें ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी भी कहते हैं । इन्हीं में
आनन्द, इच्छा, ज्ञान, एवं क्रिया भी निवास करती है । ये समस्त शक्तियाँ
आत्मसंवित से अभिन्न हैं ।३ इन समस्त शक्तियों के मूलकारण स्पन्दरूप भगवान्
ही है ।४
'शारदातिलक' में शब्दब्रह्ममयी कुण्डलिनी से 'शक्ति' के आविर्भाव का
उल्लेख हैं । यह क्रम इस प्रकार है—कुण्डलिनी—शक्ति—ध्वनि—नाद—निरोधिका
—अर्द्धेन्दु । बिन्दु—परा—पश्यन्ती—मध्यमा—वैखरी ।।
सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ।
शक्ति ततो ध्वनिस्तस्मान्नादस्तस्मान्निरोधिका ।।
ततोऽर्द्धेन्दुस्ततो बिन्दुस्तस्मादासीत् परा ततः ।
पश्यन्ती मध्यमा वाचि वैखरी शब्द जन्मभूः ।।
इच्छाज्ञान क्रियात्मासौ तेजोरूपा गुणात्मिका ।
क्रमेणानेन सृजति कुण्डली वर्णमालिकाम् ।।५
'मातृका' के चार रूप हैं—
मातृका
↓
┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐
परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी
'अनेन मातृकायाः परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी इति चत्वारिरूपाणि ।।'६
१. 'परामातृकोच्यते' (दीपिका) २. योगिनीहृदय, सेतुबन्ध, दीपिका
३-४. स्पन्दप्रदीपिका ५. शारदातिलक (त०प्र० पटल)
६. लक्ष्मीधरा

४८ वरिवस्यारहस्ये
'परा' क्या है?—'परा' नाम सान्तरोहरूपा ।' 'अन्तरे अन्तःकरणे ऊहेन
तर्केण सहितं रूपं यस्याः सा सान्तरोहरूपा ।' 'कामकला विलास' में भी इसीलिए
कहा गया है—'या सान्तरोहरूपा परा महेशी परा नाम ।।'
'पश्यन्ती' क्या है?—'स्पष्टा पश्यन्त्याख्या त्रिमातृका चक्रतां याता ।।'
'त्रिमातृका त्रिखण्डयुक्ता मातृका पञ्चदशाक्षरी, तदात्मिका । सा च चक्रतां चक्रत्वं.
याता । त्रिखण्डात्मक चक्रैक्यं त्रिखण्डात्मकमातृकाया इति रहस्यम् । 'स्पष्टा'
युक्तावस्थायां अतिसूक्ष्मतया प्रतीता ।।२
'मध्यमा' क्या है?—'मध्यमा नाम परापश्यन्त्योः उच्चानुच्चावस्थात्मिका ।'
इसके दो रूप हैं—(१) वामादि व्यष्टिरूपा (२) वामादि समष्टिरूपा । वामादि
शक्तियाँ निम्न हैं—(१) वामा (२) ज्येष्ठा (३) रौद्री (४) अम्बिका । ये चारों
शक्तियाँ श्रीचक्र के अन्तर्गत अधोमुख हैं और चतुर्योन्यात्मक हैं । (१) इच्छा (२)
ज्ञान (३) क्रिया (४) शान्ता (५) परा—ये ५ शक्तियाँ श्रीचक्र के अन्तर्गत
ऊर्ध्वमुख एवं शक्तियोन्यात्मक हैं । इसीलिए कहा गया है—'एका परात्तदन्या
वामादिव्यष्टि मातृसृष्ट्यात्मा । तेन नवात्मा माता जाता सा मध्यमाऽभिधानाभ्याम् ।
द्विविधा हि मध्यमा सा सूक्ष्मा स्थूलाकृतिः स्थिरा सूक्ष्मा । नवनादमयी स्थूला
नववर्गात्मा तु भूतलिपियाख्या ।'२
'परा' क्या है?—'एक परेति सत्त्वरजस्तमोगुणसाम्यरूपा ।' 'पश्यन्ती' क्या
है?—'पश्यन्ती अन्यतरगुण वैषम्यरूपा ।' 'मध्यमा' क्या है?—'मध्यमा वामादि-
व्यष्टिरूपा स्थूलात्मिका ।'३
'मध्यमा'—सूक्ष्मा स्थूला : नव नादमयी, नववर्गात्मा, भूतलिपव्याख्या । (नव
नाद = अ, क, च, ट, त, प, य, श, क्ष ।)
(१) 'आद्या सूक्ष्मरूपा मध्यमा'—स्थूलरूपा (नव वर्गात्मिका) मध्यमा ।४
'पश्यन्ती' के ३ रूप हैं—(१) 'पश्यन्ती' (२) 'महापश्यन्ती' (३) 'परम
महापश्यन्ती ।'५ आचार्य सोमानन्द—'पश्यन्ती' को 'ज्ञानशक्ति' कहते हैं ।
सृष्टि—'अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमय्यापि च सृष्टिः ।।' आचार्य
भास्करराय जिसे 'सृष्टि' कहते हैं उसका स्वरूप क्या है? (१) स्पन्दकारिकाकार का
मत—जगत् की सृष्टि नहीं होती प्रत्युत् प्रकटीकरण होता है क्योंकि प्रलय में जगत्
का ध्वंस होने पर भी मूलतः उसका ध्वंस नहीं होता क्योंकि उस स्थिति में जगत्
शक्ति में उपसंहृत होकर स्थित हो जाता है किन्तु सांसारिक प्राणी उसे प्रलय
महाध्वंस या विनाश कहने लग जाते हैं । 'जगत' का 'उदय' और अस्त होता है ।
इसे ही स्पन्दकारिका में—'उन्मेष' एवं 'निमेष' कहा गया है—'यस्योन्मेष निमेषाभ्यां
जगत्ः प्रलयो दयौ । तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ।।६
१-४. लक्ष्मीधरा ५. ई०प्र०वि० (अभिनवगुप्त)
६. स्पन्दकारिका

प्रथमोऽंशः ४९
(२) ‘सृष्टि’ ईक्षणमात्र है—‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय ।’
(३) योगिनीहृदय का मत—‘सृष्टि’ शक्ति द्वारा स्फुरत्ता का दर्शन है ।१
‘शब्दमयी’—शब्द का वाक् तत्त्व से सम्बन्ध है । वाक् क्या है?
वाक् तत्त्व—समस्त सृष्टि वाक्तत्त्वात्मक या शब्दमयी है । जगत् ‘शब्द’ या
वाक्तत्त्व का परिणाम है ‘अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदुच्यते । विवर्ततेऽर्थभावेन
प्रक्रिया जगतो यतः ।।’२
(१) समस्त शक्तियाँ वाक्तत्त्वात्मक या वर्णात्मक है—स्पन्दप्रदीपिकाकार ने
कहा है—‘समस्त शक्तियाँ वर्णात्मक हैं ।’
(२) वाक् तत्त्व ‘पशुपति’ को ‘पशु’ भी बना देता है—कल्लट इस सिद्धान्त
की पुष्टि करते हुए कहते हैं—
‘शब्द राशि समुत्थस्य शक्ति वर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्त विभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ।।'
स्पन्द प्रदीपिकाकार उत्पल ने ठीक ही कहा है कि पुरुष जिन शक्तियों का
स्वामी है उन्हीं का भोग्य बनकर (पुरुष के स्थान पर) ‘पशु’ बन जाता है । कादि
रूप या ब्रह्मादि शक्तिरूप चक्र की कलाओं से (ककारादि अक्षरों के श्रवण और
उच्चारण द्वारा) पुरुष अपने वैभव एवं अपनी महाव्याप्ति खोकर स्वभावच्युत हो
जाता है और फलतः पशु बन जाता है ।
(३) समस्त ज्ञान शब्दानुविद्ध हुआ करते हैं—आचार्य भट्टकल्लट इस
सिद्धान्त की पुष्टि करते हुए ‘स्पन्दकारिका’ में कहते हैं—
‘यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ।।'
(४) शब्द शक्तियाँ पर तत्त्व के स्वरूप की आच्छादिका हैं—आचार्य
भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिका’ में कहा है—‘स्वस्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोद्यता’
अर्थात् पुरुष के स्वस्वरूप को आच्छादित करने के लिए ये शब्दरूप शक्तियाँ
सर्वदा उद्यत रहती हैं अर्थात् क्रियाशक्ति के द्वारा ये पुरुष रूप को सदैव ढकना
चाहती हैं ।
(५) बिना वर्णानुगम (शब्दानुवेध) के किसी ज्ञानसंवेदनरूप प्रत्यय का उदय
ही नहीं होता—‘यतः शब्दानुवेधेनं न बिना प्रत्ययोद्भवः ।।' (स्पन्दकारिका)
‘वाक्यपदीय’ में ठीक ही कहा गया है कि ‘ऐसा कोई प्रत्यय नहीं होता
जिसमें शब्द का अनुगम न हो । सभी ज्ञान शब्द से अनुविद्ध देखे जाते हैं ।’
(६) समस्त विश्व-व्यवहार का आधार भी वाक् तत्त्व ही है—
१. ‘यदा सा परमा शक्तिः.......स्फुरन्तात्मनः पश्येतदा चक्रस्य संभवः'
२. ‘वाक्यपदीय’
४ वरि.

५० वरिवस्यारहस्ये
स्पन्दप्रदीपिकाकार उत्पलदेव ने कहा है कि समस्त विश्व-व्यवहार का कारण वाक्
तत्त्व ही है ।
(७) चित् तत्त्व की उन्मुखता में बाधक तत्त्व के रूप में भी वाक् तत्त्व ही
है । स्पन्दप्रदीपिका में कहा गया है कि वाक् शक्ति ही प्रत्यवमर्शिनी शक्ति भी है
और साथ ही वही चित् शक्ति की उन्मुखता में बाधक भी है ।
वाक् तत्त्व—अपनी मूल प्रकृति में चितिशक्ति मात्र है । शास्त्रों में इसके चार
प्रकार बताये गये हैं—
'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानिविदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ॥'
'बिन्दु' की शब्दात्मिका वृत्ति चतुष्टयात्मिका है जो निम्न है—(१) वैखरी (२)
मध्यमा (३) पश्यन्ती (४) परा । बिन्दुरूपी रत्नाकर में उठती हुई तरङ्गें बाह्यात्मना
'नाद' एवं 'ज्योति' के रूप में उदित होती है । 'नाद' वाक् के रूप में एवं ज्योति
अर्थ के रूप में प्रकट होती है । वाक् एवं अर्थ परस्पर 'वागर्थाविव संपृक्तौ' परस्पर
संश्लिष्ट रहते हैं । इनमें प्रत्येक अवस्थात्रयात्मक होता है—(१) परम (२) सूक्ष्म
एवं (३) स्थूल । इसे ही अवरोह क्रम कहते हैं । इस प्रकार बिन्दु से वाक् की
यात्रा में निम्न पड़ाव आते हैं—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा एवं (४)
वैखरी ॥
वाक् तत्त्व का मूल स्वरूप—वाक् तत्त्व अपने मूल में चिति शक्ति है और
इस प्रकार वाक् तत्त्व चितिशक्ति का ही रूपान्तरण है । 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा
गया है कि संविद् ही प्राणों के द्वारा वाग् रूप धारण करती है । वही वैखरी,
मध्यमा, पश्यन्ती एवं परा है । संविद् के आरोहण से ही परा, पश्यन्ती आदि
वाणियों का उदय होता है । संविद् सर्वमय है और वाक् का मूल संविद् है ।
वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने वाक् तत्व को 'शब्द' के रूप में ग्रहण करके शब्द
को ब्रह्मस्वरूप स्वीकार किया है—
'अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥'
उन्होंने जगत् को शब्द का विवर्त मानकर समस्त स्थूल-सूक्ष्म जगत्, जागतिक
प्रपञ्च एवं उसके मूलभूत उपादानों को शब्द की परिणति स्वीकार किया है और
इस प्रकार वास्तविक सत्ता शब्द या वाक् तत्त्व को स्वीकार करते हुए जगत् को
उसकी प्रतिच्छाया, विवर्त, या परिणाम मानते हुए शब्द तत्व (वाक् तत्त्व) को ही
विश्व का मूल स्वीकार किया है । इस प्रकार वैयाकरणों की दृष्टि में जगत् का मूल
शब्द है, जगत् की स्थिति शब्द में है और अन्ततः जगत् का लय भी शब्द में ही
होगा । 'शब्द' ही निगुर्ण-सगुण, मूर्त-अमूर्त, स्थूल-सूक्ष्म, भौतिक-अभौतिक,
ऐन्द्रिय-इन्द्रियातीत, प्रकृत्यात्मक-प्रकृत्यातीत, आत्मिक-अनात्मिक, द्रष्टा-दृश्य-दर्शन
आदि सभी में अनुस्यूत है और सभी का मूलाधिष्ठान है ।

प्रथमोऽंशः ५१
'भाव' या ध्वनियों के विभिन्न स्तरों में जो प्रथम स्तर है वह 'परा' कहलाता
है और मूलाधार नामक निम्नतम चक्र में उदित होता है । ऊर्ध्ववर्ती स्तर पर
पहुँचने पर यही भाव (वाक्) 'पश्यन्ती' कहलाने लगता है । जब यह और दूर
तक यात्रा करता हुआ हृदय में पहुँचता है और 'बुद्धि' के साथ संयुक्त हो जाता है
तब यह 'मध्यमा' कहलाने लगता है । जब यही भाव और आगे जाकर मुख में
पहुँचता है और विवक्षा से युक्त होकर व्यक्त हो उठता है तब 'वैखरी' कहलाने
लगता है । इनमें से 'सूक्ष्मा' द्वारा 'पश्यन्ती' पश्यन्ती द्वारा 'मध्यमा' एवं मध्यमा
द्वारा 'वैखरी' वाक् का प्रादुर्भाव हुआ करता है—'तत्र सूक्ष्मा पश्यन्त्याः, पश्यन्ती
मध्यमायाः, मध्यमा वैखर्याश्च कारणं द्रष्टव्यम् ॥'१ ये ही शब्द (१) शुद्ध अध्वा में
सूक्ष्म (२) अशुद्ध अध्वा में स्थूलतर एवं (३) मिश्र अध्वा में स्थूल है । इस
प्रकार शब्दों की सूक्ष्मता का क्रम इस प्रकार है—(क) शब्द : शुद्ध अध्वा में सूक्ष्म
(ख) शब्द : मिश्र अध्वा में स्थूल (ग) शब्द : अशुद्ध अध्वा में स्थूलतर ।
तत्त्व की दृष्टि से वाग्विभाजन एवं विवरण—
(क) विद्यातत्त्व—(१) वैखरी = श्रोत्रविषया, स्थूल वर्णपरिग्रहा, वायु- संगिनी,
प्रयोगार्हा । 'विद्यातत्त्व' से सम्बद्ध । कारणभूत सप्तकोटि मन्त्रों, विद्या राज्ञी एवं
उनके भुवनों से सम्बद्ध । प्राणवृत्याभिव्यक्ता, श्रोत्रग्राह्यार्थविशेषबोधनक्षमा ।
(ख) सदाशिव तत्त्व—(२) 'मध्यमा' = बुध्युपारूढ़वर्ण, तत्क्रमविशेषोपेता,
प्राणवृत्त्यगोचरीभूता ॥ 'सदाशिवतत्त्व' ही मध्यमा वाक् का अधिष्ठान है । कामिक
आदि तन्त्र भेद के कारणों, प्रणवादिकों, सामीप्यादिकमुक्तिप्राप्त सिद्धों एवं उनके
भुवनों का कारण ।
(ग) शक्तितत्त्व—(३) 'पश्यन्ती' = मयूराण्डरसवत् अविभक्त वर्णार्थाविशेष-
बोधनाक्षमा । वर्णरूपानुसंधानविरहान्त, समुज्वल, मयूराण्डरसवत् निर्विशेषाथर्धारिका ।
'शक्तितत्त्व' ही पश्यन्ती वाक् का अधिष्ठान है । शिव शक्त्यधिष्ठानत्वेन इसे
शक्तितत्त्वपदवाच्यता प्राप्त हुई है ।
(घ) शिवतत्त्व—(४) 'परावाक्' = ज्ञानेकाश्रया अर्थसामान्यप्रकाशिका वाणी ॥
परावाक् 'शिवतत्त्व' में स्थित है । यही शान्त्यतीत भुवनों की भी अवस्थिति है ।
यह चिदेकशरणा एवं निर्विकल्पस्वरूपिणी है ।२ इसी वाक् को शैवपरिभाषा में
'सूक्ष्मा' के नाम से उल्लिखित किया गया है ।
वाणी का मूल स्रोत—जहाँ वाणी अपने मूल रूप में बीजात्मना अव्यक्तभाव
से (पराशक्ति के रूप में) स्थित है वह स्थान है—'मूलाधार चक्र ।' 'पश्यन्ती'
अवस्था में, यह मूलाधारस्थ अव्यक्त 'परावाक्' विकसित होकर अङ्कुरोन्मुख हो
उठता है । 'मध्यमा' अवस्था में अङ्कुरोन्मुख यह वाणी का बीज, और अधिक
१. शिवाग्रयोगीन्द्र ज्ञान शिवाचार्यः 'शैवपरिभाषा' (परि० चतुर्थ)
२. शैवपरिभाषा

५२ वरिवस्यारहस्ये
विकसित होकर परस्पर संयुक्त दो पत्तियों के रूप में प्रकट होता है । ‘वैखरी वाक्’
वाणी की वह अवस्था है जिसमें पृथक्-पृथक् रूप में अभिव्यक्त पत्तियों की भाँति
वाणी मुख (एवं उसके उच्चारण स्थानों) द्वारा स्पष्ट रूप से प्रकट होती है ।
‘नित्यतन्त्र’ के अनुसार—
(१) वायु के द्वारा सर्वप्रथम मूलाधार चक्र में वाक् का अव्यक्त आद्यस्वरूप
‘परावाक्’ जागृत होता है ।
(२) तदुपरान्त यह वायु और अधिक ऊपर उठकर स्वाधिष्ठान चक्र में व्यक्त
होती है और वाणी के अभिव्यक्ति की इस अवस्था को ‘पश्यन्तीवाक्’
कहते हैं ।
(३) यह वायु अनाहतचक्र में पहुँच कर एवं बुद्धि के साथ मिलकर वाणी को
अभिव्यक्ति की जो अवस्था प्रदान करता है उसे ‘मध्यमावाक्’ कहते हैं ।
(४) इसके उपरान्त मध्यमावाक् और अधिक प्रस्फुट अभिव्यक्ति के स्तर पर
आरूढ़ होने पर एवं विशुद्ध चक्र में व्यक्त होकर जो अवस्था प्राप्त
करता है उसे वैखरीवाक् कहते हैं । सारांश निम्नानुसार है—
(१) मूलाधार चक्र—परावाक् (क) अव्यक्तवाक् (ख) स्वाधिष्ठान चक्र (२)
पश्यन्तीवाक्—वाक् की अङ्कुरोन्मुखावस्था । (३) अनाहत चक्र—बुद्धि के साथ
संयोग : मध्यमा वाक् : प्रकट किन्तु संयुक्त पत्तों वाली । (४) विशुद्ध चक्र—
कण्ठ से व्यक्त : वैखरी वाक् ॥ पूर्ण प्रस्फुट ॥
‘पश्यन्ती’ = अ, सृष्टि, वामा, इच्छा । ‘मध्यमा’ = इ, रक्षा, ज्येष्ठा,
ज्ञाना । ‘वैखरी’ = ‘म’ ओम् । विनाशा रौद्री । क्रिया ॥
अम्बिका शक्ति + शान्ता शक्ति का सामरस्य—वामा (इच्छा), ज्येष्ठा (ज्ञान),
रौद्री (क्रिया) का विकास (= पूर्ण गिरि, जालंधर एवं उड्डीयान पीठ का विकास)
= ‘पश्यन्ती’ ‘मध्यमा’ एवं वैखरी वाक् । भगवान् शङ्कराचार्यजी ने ‘प्रपञ्चसारतन्त्र’
में वाक् चतुष्टय की उत्पत्ति एवं उनके स्वरूप का निम्नानुसार विवेचन किया है—
‘मूलाधारात प्रथममुदितो यस्तु भावः पराख्यः ।
पश्चात् पश्यन्त्यथ हृदयगो बुद्धियुङ्मध्यमाख्यः ।
वक्त्रे वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुम्ना ।
बद्धस्तस्माद्भवति पवनप्रेरितो वर्णसङ्घः ॥’
आचार्य पद्मपाद-कृत वाणी-विभाग—आचार्य पद्मपाद ने प्रपञ्चसारतन्त्र की
टीका में वाक् तत्त्व के ५ एवं ७ भेद किये हैं जो निम्न हैं—(१) शून्य (२)
संवित् (३) सूक्ष्मा (४) परा (५) पश्यन्ती (६) मध्यमा (७) वैखरी ।
(१) सूक्ष्मा (२) परा (३) पश्यन्ती (४) मध्यमा (५) वैखरी । इनमें ‘शून्य’
वह है जो स्पन्दशून्य वाक् के रूप में स्थित है । ‘संवित्’ का अर्थ है—सिसृक्षु ।
‘सूक्ष्मा’ का अर्थ है—उत्पत्ति की अवस्था । ‘परा’ का अर्थ है—मूलाधार में

प्रथमोऽंशः ५३
प्रथमोदित । (अथवा सूक्ष्मा, परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरीति पञ्चपदीं वाचमाश्रित्याह
मूलाधारादिति । सप्तपद्यपि वागनेनैव सूचिता । शून्य-संवित्सूक्ष्मादीनि सप्तपदानि ।
तत्रानुत्पन्ना निष्पन्दा 'शून्या' ।। वागुत्पित्सुः 'संवित्' । उत्पत्यवस्था 'सूक्ष्मा' ।
मूलाधारात् प्रथममुदिता परेति विभागः ।।'१
स्वच्छन्दागम एवं वाग्विभाग—
'तस्माच्छून्यं समुत्पन्नं शून्यात्स्पर्शसमुद्भवः ।
तस्मान्नादः समुत्पन्नः पूर्वं वै कथितस्तव ।।'
—इस श्लोक द्वारा 'स्वच्छन्दतन्त्र' में शून्य (व्यापिनी) स्पर्श (शक्ति) आदि
की ओर सङ्केत करके वाणी के ७ भेदों की ओर सङ्केत किया गया है ।
'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।।'
'शब्दब्रह्म' = परावाक् = कुण्डलिनी = प्रणव = ओंकार 'परब्रह्म ।।'
'शब्दब्रह्म' ➔ 'परब्रह्म'
वैखरी वाक्
(कोई प्रकाशन नहीं है।)
मध्यमा वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
पश्यन्ती वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
परा वाक्
(शब्दब्रह्म)
शब्दातीत 'परब्रह्म'
शब्द-सोपान ➔
४. सूक्ष्मतम | परा वाक्
३. सूक्ष्मतर | पश्यन्ती वाक्
२. सूक्ष्म | मध्यमा वाक्
१. स्थूल | वैखरी वाक्
१. प्रपञ्चसार टीका

५४ वरिवस्यारहस्ये
(१) 'चक्रमयी'—सृष्टि चक्रमयी है । श्रीचक्र में ही समस्त प्रपञ्च अन्तर्गर्भित
है । श्रीचक्र का विकास ही जगत् है । श्रीचक्र नवयोन्यात्मक, चिदानन्दघन है और
नवात्मक है—
'नवयोन्या चक्रं चिदानन्दघनं महत् ।
चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्नमन्त्रकम् ।।'

श्रीचक्र के अंतर्गत चक्रअधिष्ठात्री देवी
सर्वानन्दमय चक्रमहात्रिपुरसुन्दरीबिन्दुकेन्द्रस्थ रक्तबिन्दु
सर्वसिद्धिप्रद चक्रत्रिपुराम्बापीतवर्ण का त्रिकोण
सर्वरोगहर चक्रत्रिपुरसिद्धाकाले रङ्ग के १० त्रिकोण
सर्वरक्षाकर चक्रत्रिपुरमालिनीअन्तर्दशार चक्रहरे रङ्ग के ८ त्रिकोण
सर्वार्थसाधक चक्रत्रिपुराश्रीबहिर्दशार चक्रलाल रङ्ग के १० त्रिकोण
सर्वसौभाग्यदायक चक्रत्रिपुरवासिनीनीले रङ्ग के १४ त्रिकोण
सर्वसङ्क्षोभणकारक चक्रत्रिपुरसुन्दरीगुलाबी रङ्ग का अष्टदल कमल
सर्वाशापरिपूरक चक्रत्रिपुरेशीपीतवर्ण का षोडशदल कमल
त्रैलोक्यमोहनत्रिपुराहरे रङ्ग का बाह्यस्थल
श्रीचक्र की नौ योनियाँ है—(१) मध्यत्रिकोण (२) अष्टार (३) अन्तर्दशार
(४) बहिर्दशार (५) चतुर्दशार (६) अष्टदलपद्म (७) षोडश दल पद्म (८) तीन
वृत्त (९) भूपुर ।
श्रीचक्र में ९ त्रिकोण होते हैं । इन्हें योनियाँ भी कहते हैं । इनमें (क) ५
शक्ति त्रिकोण एवं (ख) ४ शिव त्रिकोण । 'शक्तित्रिकोण' अधोमुखी एवं शिव
त्रिकोण ऊर्ध्वमुखी होते हैं । यही कौलमत है ।
(१) 'शक्तिचक्र'—त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार चतुर्दशार (२)
'शिवचक्र'—अष्टदलपद्म, षोडशदलपद्म तीन वृत्त, भूपुर । इन चक्रों का पिण्डस्थ
चक्रों के साथ निम्न सम्बन्ध हैं—

प्रथमोऽंशः ५५
(१) अकुलेसुषुम्नामूलरुणसहस्रदलकमले त्रिपुराधिष्ठितं त्रैलोक्यमोहनचक्रम्।
(२) वह्नावाधारे चतुर्दशकमले त्रिपुरेश्यधिष्ठितं सर्वाशापरिपूरणं चक्रम्। (३)
स्वाधिष्ठानस्थितषड्दलकमले त्रिपुरसुन्दर्य्यधिष्ठितं सर्वसङ्क्षोभण चक्रं । (४) नाभौ दश-
दल कमले त्रिपुरवासिन्यधिष्ठितं सर्वसौभाग्यदायक चक्रम् । (५) अनाहते द्वादश-
दलकमले त्रिपुरा श्रीसमधिष्ठितं सर्वार्थसाधकं चक्रं । (६) विशुद्धौ षोडशदलकमले
त्रिपुरमालिन्यधिष्ठितं सर्वरक्षाकरं चक्रं । (७) लम्बिकाग्रे तालुमूले अष्टदलकमले
त्रिपुरासिद्धयधिष्ठितं सर्वरोगहरं चक्रम् । (८) भ्रुवोरन्तरे द्विदलकमले त्रिपुराम्बिका-
धिष्ठितं सर्वसिद्धिप्रदं चक्रम् । (९) इन्दौ ललाटे बिन्दौ महात्रिपुरसुन्दर्यधिष्ठितं
सर्वानन्दमयं चक्रं भावयेत् ।।'१
(१) 'चक्रमयी'—सृष्टि चक्रमयी है । श्रीचक्र में ही समस्त प्रपञ्च अन्तर्गर्भित
है । श्रीचक्र का विकास ही जगत् है । श्रीचक्रान्तर्गत योनियों को भी 'चक्र' कहते
हैं वे निम्नलिखित हैं—
'नवमं त्र्यस्रमध्यं स्यात् तेषां नामान्यतः शृणु ।
त्रैलोक्यमोहनं चक्रं सर्वाशा परिपूरकम् ॥ ८२ ॥
सर्वसङ्क्षोभणं गौरि सर्वसौभाग्यदायकम् ।
सर्वार्थसाधकं चक्रं सर्वरक्षाकरं परम् ॥ ८३ ॥
सर्वरोगहरं देवि ! सर्वसिद्धिमयं तथा ।
सर्वानन्दमयं चापि नवमं शृणु सुन्दरि ॥ ८४ ॥
अत्र पूज्या महादेवी महात्रिपुरसुन्दरी ।
परिपूर्णं महाचक्रमजरामरकारकम् ॥ ८५ ॥'
'श्रीचक्र' नवयोन्यात्मक है, चिदानन्दघन है और नवात्मक है—
'नवयोन्यात्मक चक्रं चिदानन्दघनं महत् ।
चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्नमन्त्रकम् ।।'३
'श्रीचक्र' में जो अन्य ९ चक्र स्थित हैं वे निम्नांकित हैं—(१) त्रैलोक्यमोहन
(२) सर्वाशापरिपूरक (३) सर्वसङ्क्षोभण (४) सर्वसौभाग्यदायक (५) सर्वार्थसाधक
(६) सर्वरक्षाकर (७) सर्वरोगहर (८) सर्वसिद्धिमय (८) सर्वानन्दमय
(२) 'चक्रमयी'—पिण्ड में भी चक्र हैं जो निम्न हैं—(१) मूलाधार (२)
स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धाख्य (६) आज्ञा (७) बिन्दु
(८) अर्द्धचन्द्र (९) रोधिनी (१०) नाद (११) नादान्त (१२) व्यापिनी (१३)
समना (१४) उन्मनी ।
'गोरक्षशतक' में पिण्डस्थ चक्रों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है
'चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षड्दलम् । नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्या दलं


१. योगिनीहृदय की टीका—'दीपिका'—अमृतानन्द
२-३. योगिनीहृदय

५६ वरिवस्यारहस्ये
हृदि । कण्ठे स्यात् षोड्शदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे
महापथे ॥'
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में ९ चक्रों का उल्लेख किया गया है जो निम्न हैं—
(१) (आधार में) ब्रह्मचक्र (२) स्वाधिष्ठान (३) नाभिचक्र (४) हृदयाधार (अष्टदल)
(५) कण्ठ चक्र (६) तालु चक्र (७) भ्रूचक्र (८) ब्रह्मरन्ध्र : निर्वाणचक्र (९)
आकाश चक्र । आज्ञाचक्र के ऊपर अन्य चक्र निम्न हैं—(१) बिन्दु, (२)
अर्धचन्द्र, (३) रोधिनी, (४) नाद, (५) नादान्त, (६) शक्ति, (७) व्यापिनी, (८)
समना, (९) उन्मना ।
बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादनादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥ (वरिवस्यारहस्यम्)
(३) 'चक्रमयी'—'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी
स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ।' (यो०हृ०) परमाशक्ति का परिणमन ही
चक्र है । ये चक्र निम्नांकित हैं—(क) श्रीचक्र । (ख) (१) मूलाधार (२)
स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धाख्य (६) आज्ञा (७) बिन्दु
(८) अर्द्धचन्द्र (९) रोधिनी (१०) नाद (११) नादान्त (१२) शक्ति (१३)
व्यापिनी (१४) समना (१५) उन्मनी ।
'गोरक्षशतक' में इन चक्रों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—
'चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षड्शदलम् ।
नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्या दलं हृदि ॥
कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ।
सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे ॥'
'सिद्धसिद्धान्त पद्धति' में ९ चक्रों का उल्लेख किया है जो निम्न हैं—(१)
आधार में ब्रह्मचक्रं (२) स्वाधिष्ठान (३) नाभिचक्र (४) हृदयाधार (५) कण्ठचक्र
(६) तालुचक्र (७) भ्रूचक्र (८) ब्रह्मरन्ध्रः निर्वाणचक्र (९) आकाशचक्र ।
आगमानुसार 'आज्ञाचक्र' के ऊपर अन्य चक्र निम्न हैं—'बिन्दु', 'अर्द्धचन्द्र',
'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त', 'शक्ति', 'व्यापिनी', 'समना', 'उन्मना' ।
'बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादं नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥'२
'सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद' में निम्न नौ चक्रों का उल्लेख किया गया है—
(१) 'आधार चक्र'—मूलाधार में त्रिरावृत्तभङ्गया वह्निमण्डलाकार ब्रह्मचक्र है ।
यहीं मूलकन्द में पावकाकार शक्ति का ध्यान करना चाहिए । यहीं मूलाधार में
सर्वकामप्रद कामरूपपीठ स्थित है । यही है आधार चक्र का स्वरूप ।
१. गोरक्षनाथ—'योगशतक' २. 'वरिवस्यारहस्यम्'

प्रथमोऽंशः ५७
(२) 'स्वाधिष्ठान चक्र'—द्वितीय चक्र षडदलात्मक स्वाधिष्ठान है । उसके
मध्य में (मांसाकार) पश्चिमाभिमुखी ज्योतिर्लिङ्ग है जो कि प्रवाल सदृश है , यहीं
उड्डीयानपीठ है जो कि जगदाकर्षण सिद्धि प्रदान करने वाला है ।
(३) 'मणिपूरक चक्र'—तृतीय चक्र 'नाभिचक्र' है जो कि पञ्चावर्त सर्प
कुटिलाकार है । उसमें बालार्ककोटिप्रभा कुण्डलिनी का ध्यान करना चाहिए ।
मणिपूरक सर्वसिद्धिप्रद एवं सर्व सामर्थ्यवान चक्र है ।
(४) 'हृदय चक्र'—यह अधोमुखी अष्टदलात्मक चक्र है । इसके आकाश के
मध्य ज्योतिर्लिङ्ग का ध्यान करना चाहिए इसी अष्टदलात्मक हृदयचक्र में 'हंसकला'
स्थित है जो कि सर्वप्रिया एवं सर्वलोकवश्यकरी है ।
(५) 'कण्ठ चक्र'—चतुरङ्गुल कण्ठचक्र के वामभाग में इडा नाम्नी चन्द्रनाडी
एवं दक्षिण दिशा में पिङ्गला नाम्नी सूर्यनाड़ी एवं उसके मध्य में श्वेतवर्णा सुषुम्ना
का ध्यान करना चाहिए । ऐसे ध्याता को अनाहतसिद्धि प्राप्त होती है ।
(६) 'तालु चक्र'—तालुमूल चक्र में लक्ष्य का ध्यान करने से सूर्य एवं
चन्द्रमा को एकता स्थापित होती है । वहाँ अमृत प्रवाहित होता है । वहाँ
ऊर्ध्वमूलचक्ररन्ध्र में जो अन्तर्जिह्वा स्थित है और 'घण्टिकालिङ्ग' कहलाता है वहीं
राजदन्तावलम्बिनी विवर 'दशमद्वार' है । वहाँ वृत्ति शून्य होकर ध्यान करने से चित्त
का लय हो जाता है ।
(७) 'भ्रू चक्र'—सातवाँ चक्र जो अङ्गुष्ठमात्र है और 'भ्रू चक्र' कहलाता है ।
वहाँ ज्ञाननेत्र का दीप शिखाकार रूप में ध्यान करना चाहिए । वहीं कपालकन्द है ।
यह आज्ञाचक्र वाक्सिद्धि प्रदान करता है ।
(८) 'ब्रह्मरन्ध्र निर्वाणचक्र'—यह अष्टम चक्र है । यहाँ सूचिका गृह से भी
अधिक सूक्ष्म ('सूचिकागृहेतर') धूम्रशिखा का ध्यान करना चाहिए । वहीं
जालन्धरपीठ है जो मोक्षप्रद है और परब्रह्मचक्र है ।
(९) 'आकाश चक्र'—नवम चक्र आकाश चक्र है । यह षोडशदलोपेत एवं
ऊर्ध्वमुख है । उसके मध्य में स्थित है—त्रिकूटाकार ज्योति । ('त्रिकूट' = भ्रूमध्य)
'ऊर्ध्वमुन्नयते इत्योंकारः' के अनुसार ऊर्ध्वशक्तिता (तुरीयोंकाररूपता) ब्रह्माभिन्न
'परशून्य' का ध्यान करना चाहिए । वहीं सर्वेच्छासिद्धिसाधक 'पूर्णगिरिपीठ' विद्यमान
है ।
'स्वच्छन्दतन्त्र' में 'आधारपङ्कज' 'स्वाधिष्ठान' 'अनाहत' विशुद्ध के अतिरिक्त
लम्बिका के अग्रभाग में भी एक 'अष्टदलकमल' का वर्णन किया
गया है—
'कण्ठोर्ध्वं परमेशानि लम्बिकाचतुरङ्गुले ।
तस्यामष्ट दलं पद्मं रसिकादिभिरावृतम् ॥'

५८ वरिवस्यारहस्ये
यह सूक्ष्मजिह्वा स्थानीय है ।१ 'स्वच्छन्दतन्त्र' के ही अनुसार मूलाधार में ही
षड्दलात्मक 'कुलपद्म' भी है जो कि चतुर्दलात्मक मूलाधार चक्र से भिन्न है ।
उसके नीचे स्थित है—'अष्टदलसहस्र अकुल' । यह कुलपद्म से भिन्न है । 'अकुल'
कहने से 'कुलपद्म' एवं 'अकुल' दोनों का ग्रहण किया जाता है अतः दोनों के
व्यावर्तन हेतु अकुल को 'विषु' भी कहा जाता है ।२
षट्चक्रों का पूर्ण विवरण अगले पृष्ठ पर तालिका में इस प्रकार है—
सृष्टि और चक्र—'सहस्रार' बिन्दु होता है । इसी कारण वह 'बैन्दव गृह'
है । उस बिन्दु से ही कारण सहित यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है । उस 'बिन्दु'
से ही 'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' के दस दलों की उत्पत्ति होती है । सहस्रार से
उत्पन्न होकर यही बिन्दु दस रूपों में रूपान्तरित हो जाता है—
'सहस्रारं बिन्दुर्भवति च ततो बैन्दवगृहं ।
तदेतस्माज्जातं जगदिदमशेषं स करणम् ।।
ततो मूलाधाराद्वितयमभवत्तद्दशदलं ।
सहस्राराज्जातं तदिति दशधाबिन्दुरभवत् ।।'३
इसी दशधा विभक्त 'बिन्दु' से मणिपूर के १०, अनाहत के १२, विशुद्धाख्य
के १६ एवं आज्ञा के २ दल निर्मित होते हैं । कौलमार्गी यह मानते हैं कि
'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' ही कारणस्थान हैं अतः वे इन्हीं में ही भगवती की
उपासना भी करते हैं ।४
'सृष्टिस्तु कुण्डली ख्याता' स्वीकार करके ऋषियों ने सृष्टि का उपादान एवं
उपादान कारण कुण्डली शक्ति को माना है । 'बिन्दु' ही सृष्टि का मूल केन्द्र है ।
शक्ति अपने निर्गुण स्वरूप में बिन्दुरूपा है । कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार में परमशिव
से मिलकर बिन्दुरूपा हो जाती है । उन्मनी अवस्था में यह बिन्दुस्वरूपा है ।
कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार में 'बिन्दु' रूप में निवास करती है । इसी कारण सहस्रार
को 'बैन्दव गृह' कहते हैं । शक्ति का यह रूप ही 'परम बिन्दु' या 'कारणबिन्दु'
है । समस्त प्रपञ्च का कारण होने के कारण ही इसे 'कारण बिन्दु' कहते हैं । यह
अवस्था चने की भाँति है । इसमें दो दालें एकरूप होकर रहती हैं । ये दो दालें
शिव एवं शक्ति एवं चना 'कारण बिन्दु' सदृश है ।
बीज से वृक्षोत्पत्ति की प्रक्रिया—(१) बीज फूलना, (२) दो दालों का
पृथक्-पृथक् होना फिर (३) अङ्कुर फूटना, (४) वृक्ष ।
निष्क्रिय ब्रह्म की सिसृक्षा—अहं का स्फुरण (बीज के फूलने के सदृश
अवस्था) = 'कारणबिन्दु'—अहं एवं इदं का उदय (शिव शक्ति का उदय)—
नाद-बिन्दु की उत्पत्ति । शिव-शक्ति = श्वेत + रक्त बिन्दु या कार्य बिन्दु + बीज ।

१-२. सेतुबन्ध ३. सुभगोदय स्तुति (गौड़पादाचार्य)
४. सुभगोदय स्तुति (श्लोक ४८)

प्रथमोऽंशः ५९

चक्रस्थानपीठदल संख्यावर्णतत्त्व/गुणतत्त्व का रङ्गमण्डल का आकारबीज/वाहनदेवता/वाहनशक्ति/लिङ्ग
१. मूलाधार चक्रपायु-मुष्क के मध्य (रीढ़ के अधोभाग में)कामाख्या पीठ०४व, श, ष, स,पृथ्वी, आकर्षण/गंधपीतवर्णवर्गाकारलं/ ऐरावतब्रह्मा हंसडाकिनी/ स्वयंभू
२. स्वाधिष्ठान चक्रमेरुदण्ड में मेढ़ के ऊपर—०६ब, भ, म, य, र, ल,जल/सङ्कोचन/ रसश्वेतवर्णअर्द्धचन्द्रवं/ मकरविष्णु गरुड़राकिनी
३. मणिपूरचक्रमेरुदण्ड में नाभि के पास—१०ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फतेज/प्रसरण/ रूपरक्तवर्णत्रिभुजरं/ मेषरुद्र वृषभलाकिनी
४. अनाहतचक्रहृदय के पासपूर्णगिरि पीठ१२क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठवायु/गति/ स्पर्शधूम्रवर्णषट्कोणयं/ कृष्णमृगईशकाकिनी/ बाण
५. विशुद्धाख्य चक्रकण्ठ के पासजालंधर पीठ१६अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अःआकाश/ अवकाश/ शब्दश्वेतवर्णवृत्तहं/ श्वेत हस्तीसदाशिवशाकिनी

६० वरिवस्यारहस्ये

६. आज्ञाचक्रभ्रुवद्वय के मध्यउड्डीयान पीठ०२हं, क्षंमन——ओंशाम्भुहाकिनी शक्ति/इतरलिङ्ग
७. सहस्रार (शून्यचक्र)महानाद के ऊपर, शंखिनी नाड़ी के ऊपर विसर्ग नामक शक्ति के नीचे पूर्णचन्द्र के समान शुभ्र सहस्रदल युक्त निम्नाभिमुख । सहस्रदल की कर्णिका में परमामृत समूह से स्निग्ध चन्द्र मण्डल है । उसके भीतर त्रिकोण है । उसके भीतर बिन्दु रूप शून्य है । यहीं स्थित हैं शून्याकार एवं सर्वात्मा परमशिव ।—१०००समस्त स्वर एवं समस्त व्यञ्जनतत्त्वातीत/गुणातीतश्वेतवर्ण——परमशिव परमहंस—

प्रथमोऽंशः ६१
सहस्रार से उत्पन्न यह 'बिन्दु' ही दशधा विभक्त होकर 'मूलाधार' एवं
स्वाधिष्ठान कमलों का दस दल बन जाता है । कौलमार्गियों के मतानुसार मूलाधार
एवं स्वाधिष्ठान ही 'कारणस्थान' है । सम्पूर्ण जगत् का 'कारण बिन्दु' जो
'सहस्रार' में स्थित है वही दशधा विभक्त होकर सभी चक्रों के दलों के रूप में
प्रकट होता है—
'दशधा भिद्यते बिन्दुः एक एव परात्मकः । चतुर्धाऽऽधार कमलेषोढा- ऽधिष्ठान
पङ्कजे, 'अधिष्ठानाधार द्वितयमिदमेव दशदलं । सहस्राराज्जात मणिपूर
मतोऽभूद्दशदलम् ।।' 'तदेवैको बिन्दुर्भवति जगदुत्पत्ति कृदयम् ।।'१
(क) सहस्रार से उत्पन्न (१) 'मूलाधार' एवं (२) 'स्वाधिष्ठान' के १० दल
'मणिपूर चक्र' के १० दल बन जाते हैं । (मणिपूर में मू०स्वा० दोनों हैं ।)
(ख) हृदय एवं मूलाधार के १२ + ४ दल मिलकर विशुद्धार चक्र के १६
दल बन जाते है । (विशुद्धाख्य में—अनाहत + मूलाधार दोनों हैं ।)
(ग) मणिपूर के १० दल एवं मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र (२) = १० +
२ मिलकर अनाहत चक्र के १२ दल बन जाते हैं ।
(घ) मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान आज्ञा चक्र में दो दलों के रूप में रूपान्तरित
हो जाता है । ये ही दो दल सहस्रार में एक बिन्दु के रूप में शेष रह जाते हैं ।
सारांश—मणिपूर से आज्ञा चक्र तक के समस्त चक्र मूलाधार एवं
स्वाधिष्ठानरूप हैं ।२ इसीलिए कहा गया है कि समस्त चक्रों का त्याग करके
सहस्रार में एक बिन्दु रूप में भगवती के परा संवित् रूप का ध्यान करना
चाहिए ।
'देहमयी'—'अण्ड' या 'पिण्ड' ही देह है । हिरण्यगर्भ भी स्वर्णाण्ड ही था ।
पराशक्ति सृष्टयोन्मुख होने पर 'अण्ड', 'ब्रह्माण्ड', 'प्रकृत्यण्ड', 'मायाण्ड' एवं
'शक्ताण्ड' के रूप में परिणत हो जाती है । उसमें ही समस्त षट्त्रिंशादात्म जगत्
निहित है—उस शक्ति के दो रूप हैं—(१) पुरुषरूप—'परमशिव' (२) नारीरूप—
'विमर्श' । उसी में षट्त्रिंशादात्म जगत् स्थित है—'भारूपं परिपूर्ण स्वात्मनि विश्रान्ति
तो महानन्दम् । इच्छा संवित्करणैर्निर्भरितम् अन्तः शक्तिपरिपूर्णं । सर्वविकल्पविहीनं
शुद्धं शान्तं लयोदयविहीनम् । यत्पर तत्त्वं तस्मिन् विभाति षट्त्रिंशादात्म जगत् ।'
देहों की दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो विश्व में (१) पिण्डज (२)
जरायुज (३) स्वेदज (४) उद्भिज देह हैं । पार्थिव, आंभस, तैजस, वायव्य शरीर
भी हैं और उनके मिश्रित शरीर भी हैं । मानव शरीर ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब माना
१. सुभगोदय स्तुति
२. मूलाधार में यह बिन्दु मन, बुद्धि, चित्त एवं अहङ्कार तथा स्वाधिष्ठान में—
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य (६) बन जाता है । एक परमतत्त्व
दशधा होकर जगत् की सृष्टि करता है ।

६२ वरिवस्यारहस्ये
जाता है और इसीलिए कहा गया है कि—'यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे' मानव शरीर
'ब्रह्मपुर' कहा गया है—ब्रह्म का नगर कहा गया है । ईश्वर स्वयमेव प्रपञ्च में
'जीव' बनकर प्रवेश करता है । 'तत्त्वमसि' इसी सत्य का साक्षी है । मानव शरीर
पञ्चकोशात्मक है । पञ्चकोश निम्नांकित हैं—(१) 'अन्नमय', (२) 'प्राणामय', (३)
'मनोमय', (४) 'विज्ञानमय', (५) 'आनन्दमय' ।
थियोसॉफी के अनुसार—(१) 'अन्नमय एवं प्राणमय कोश' = 'भौतिक
शरीर' । (अन्नमय = 'प्राणमय' = Dense/ethenic (२) 'मनोमय कोश' =
Astral and lower 'mental body' (काम शरीर) (३) 'विज्ञानमय कोश' =
उच्चस्तरीय मानसिक शरीर या 'कारणशरीर' (४) 'आनन्दमयकोश' = 'आत्मिक
शरीर' । (Ātmic body)
(१) पुराणों एवं षड्दर्शनों में ३ प्रकार के शरीर कहे गए हैं—(१)
'स्थूलशरीर' (षाट्कौशिक शरीर) (२) 'सूक्ष्म शरीर' (३) 'कारण शरीर' । (Gross
or Phenomenal body, Astral body, casual body)
(१) 'स्थूलशरीर' = पञ्चकोशात्मक, धातुमय, अन्न-रस, रक्त, मांस, मेद,
शुक्र से निर्मित जड़ एवं पांचभौतिक मांसल शरीर ।
(२) 'सूक्ष्मशरीर' = स्थूलशरीर से सूक्ष्मतर शरीर । ५ ज्ञानेन्द्रियों, ५
कर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, ५ प्राण से समन्वितशरीर ।
(३) 'कारणशरीर' = अज्ञान की उपाधि जो सुषुप्ति में भी वर्तमान रहती है
वह 'कारणशरीर' कहलाती है । मुक्ति के पूर्व इससे मुक्ति संभव नहीं । मोक्ष में ५
कोश भी नहीं रहते । सांख्य मत के अनुसार सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर का जो
स्वरूप है वह अन्य शास्त्रों से भिन्न है ।
'सांख्यकारिका' में ईश्वरकृष्ण ने सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) का इस प्रकार
प्रस्तुतीकरण किया है—'पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति
निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ।'१
यह सूक्ष्म शरीर १८ तत्त्वों से निर्मित होता है जो निम्न हैं—(१) मन (२)
बुद्धि (३) अहङ्कार (४) ५ ज्ञानेन्द्रियाँ (५) ५ कर्मेन्द्रियाँ (६) ५ तन्मात्रायें ।
इसका स्वरूप इस प्रकार है—'चित्रं यथाऽऽश्रयमृते, स्थाण्वादिभ्यो बिना
यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ (४१)२ पुरुषार्थहेतुकमिदं
निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥'(४२)३
अन्नमय कोश स्थूल शरीर है । प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोश सूक्ष्म
शरीर के तत्त्व हैं । वेदान्त मत में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं ५
प्राण मिलकर सूक्ष्मशरीर की रचना करते हैं ।
१-३. सांख्यकारिका

प्रथमोऽंशः ६३
स्थूल शरीर और
उसके
पञ्चकोश
आत्मा ← [पञ्चकोश-चक्र] → अन्नमय कोश
प्राणमय कोश
मनोमय कोश
विज्ञानमय कोश
आनन्दमय कोश
माध्यमिक मत— 'धर्मकाया', रूपकाया, निर्माणकाया, संभोगकाया ।
'धर्मकाया' ही वास्तविक काया है और समस्त काया-समूह की जननी है ।
महायान—(१) रूपकाया (निर्माणकाया) (स्थूल एवं सूक्ष्म) (२) धर्मकाया ।
'निर्माणकाया' 'संभोगकाया' 'धर्मकाया' एवं 'सहजकाया'—मुख्यतः ये ही काया की
चार कोटियाँ हैं ।
'धर्मकाया'—द्वितीय काया है और प्रकाशमय है । सुषुप्ति के क्षय से
नित्यानित्य भेदों से रहित, मैत्री से पूर्ण, चित्त की निर्विकल्पावस्था को ही धर्मकाया
या चित्तवज्र कहते हैं । यह तर्कातीतावस्था है । प्रज्ञोपाय-ऐक्य के कारण इसे
'धर्मात्मा योग' भी कहा गया है । यह सुषुप्ति से उच्चतर स्थिति है । असङ्ग ने
'धर्मकाया' को पारमार्थिक एवं अज्ञेय माना है । भगवान् बुद्ध 'संभोगकाया' धारण
करके भक्तों को आन्तरिक उपदेश देते हैं । इसी काया से बुद्ध ने महायान का
उपदेश दिया ।
'संभोग काया' तृतीय काया है । इसी काया में स्थित होकर बुद्ध ने
गृद्धकूट पर्वत पर 'मन्त्रयान' का उपदेश दिया था । इसे ही 'वाग्वज्र' भी कहा
गया है । यही मन्त्रयोग एवं तन्त्रोपदेश की (बुद्ध द्वारा गृहीत) काया है । यहाँ
प्रज्ञोपाय की एकता है समस्त संस्कारों, तर्कों, इच्छाओं, तृष्णाओं के शान्त या
नष्ट हो जाने पर ही यह काया प्राप्त होती है । बीज मन्त्रों का जन्म भी इसी
काया में होता है ।

६४ वरिवस्यारहस्ये
'निर्माण काया'—वह भौतिक काया 'निर्माण काया' है जिसे धारण करके
शाक्य मुनि श्रावकयान, प्रत्येक यान एवं बोधिसत्वों को उपदेश देते हैं । भगवान्
बुद्ध—(१) निर्माण काया द्वारा बाह्य नैतिक उपदेश देते हैं । (२) संभोग काया
द्वारा गृद्धकूट पर महायान का उपदेश दिया । (३) संभोग काया द्वारा धान्यकूट पर
तन्त्रमार्ग का उपदेश दिया । धर्मकाया अज्ञेय है ।
'चतुर्थ काया'—'निर्माण काया' । जागृतावस्था का क्षय→निर्माण काया ।
'निर्माण काया' प्रारम्भिक होते हुए भी नारोपा के मतानुसार अंतिम अवस्था है और
यही 'सहज काया' है, यही शून्यता है, यही ज्ञानवज्र एवं शुद्ध योग है ।
सहजावस्था या सहज काया ही चतुर्थ काया है । 'सहज काया' ही निर्माण काया
है—सहज साधना→कायावज्र । असङ्ग के मतानुसार शिल्प, जन्म ज्ञान एवं निर्वाण
की शिक्षा देने हेतु भगवान् 'निर्माण काया' धारण करते हैं । यह काया कर्मों द्वारा
उत्पन्न नहीं होती । धर्मसंस्थापनार्थ यह धारण की जाती है । तान्त्रिक बौद्ध धर्म के
अनुसार काया-विवरण निम्नानुसार है—
काया
रूपकाया संभोगकाया 'धर्मकाया'
या (माध्यमिक) योगाचार
निर्माणकाया (स्वाभाविक काया)
(भौतिकशरीर) परसंभोगकाया स्वसंभोगकाया
(उपदेश के समय) (स्वर्गस्थित रूप) (अज्ञेय तत्त्व)
स्थूल सूक्ष्म
सांवृत्तिक सत्य पारमार्थिक सत्य
'वज्रयोग' के अनुसार काया विषयक विवरण—
(१) निर्माणकाया—कायावज्र—विशुद्धयोग—शून्यता विमोक्ष ।
(२) संभोगकाया—वागवज्र—धर्म योग—अनिमिता विमोक्ष ।
(३) धर्मकाया—चित् वज्र—मन्त्रयोग—अपरिहित ।
(४) सहजकाया—ज्ञानवज्र—संस्थान योग—अनभिसंस्कार ।
अभिसम्बोधि सिद्धान्त—अभिसम्बोधि = पूर्ण प्रकाश ।
(१) एकक्षणाभिसम्बोधि—सहजकाया (२) पञ्चकारसम्बोधि—धर्मकाया । (३)
विंशत्याकार सम्बोधि—संभोगकाया (४) मायाजालाभिसंबोधि—निर्माणकाया ।
'कायावज्र' = भौतिक शरीरादि की उन्नति । 'वाग्वज्र' = वाणी की पूर्णता ।
'चित्तवज्र' = मानसिक विकास । 'ज्ञानवज्र' = प्रज्ञा का विकास । वज्रयान
(मन्त्रयान) में तीन कायाओं के अतिरिक्त एक चतुर्थ काया—विज्ञान वादियों की