सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

प्रथमोऽंशः २५
करनेवाले आचार्य शङ्कर एवं उनके केवलाद्वैतवादी अनुयायियों को शान्तब्रह्मवादी
कहा है । सांख्यानुयायी भी शान्तब्रह्मवादी कहे गए हैं—‘शान्तब्रह्म- वादिभिः सांख्यैः
पुरुषस्य परमात्मनोऽधिष्ठेयं कर्मानुरूपं सुखदुःखभोक्तृतया व्यपदिश्यते’ १ चूँकि आचार्य
भास्करराय शान्त ब्रह्मवादी नहीं हैं और उनका परमशिव शङ्कराचार्य के निर्गुण ब्रह्म
की भाँति निष्क्रिय एवं निर्गुण नहीं है अतः अपने मत को शाङ्कर मत से पृथक्
रूप में प्रतिपादित करने के लिए ही उन्होंने शिव की सक्रियता का भी उल्लेख
किया है ।
‘ईश्वराद्वयवाद’ में शिव पञ्चकृत्यकारी है—जबकि शान्तब्रह्मवाद का निर्गुण
ब्रह्म निष्क्रिय है ।
| ‘शान्तब्रह्मवाद’ २ | ‘ईश्वराद्वयवाद’ |
| १. ब्रह्म निर्गुण, निराकार एवं निष्क्रिय | १. शिव पञ्चकृत्यकारी है । |
| है । | |
| २. विश्व मिथ्या है । | २. विश्व सत्य है, शिवस्वरूप है । |
| ३. माया शक्ति मिथ्या एवं | ३. शक्ति सत्य है और चिदात्मक है । |
| अनिर्वचनीय है । | |
| ४. आत्मा जीवदशा में भी निष्क्रिय है | ४. शिव अपनी सकल या जीव दशा |
| और औपचारिक कर्तृत्व या सुख | में भी पञ्चकृत्यकारी है । |
| दुःखादिभौक्तृत्व से युक्त है | |
| ५. अज्ञान या माया आकस्मिक नहीं है | ५. माया एवं अज्ञान अध्यास एवं |
| प्रत्युत् आत्मा का स्वातंत्र्यमूलक, | अध्यारोपजन्य भ्रान्ति है तथा |
| स्वेच्छा परिगृहीत रूप है यथा नट | आत्मा का आवरक होने से उसका |
| द्वारा अभिनय के समय स्वेच्छा- | विरोधी है । |
| गृहीत रूप । शिव अपने स्वरूप | |
| को आच्छादित एवं अनाच्छादित | |
| करने में स्वतन्त्र हैं । ‘प्रज्ञान’ शिव | |
| की स्वातंत्र्यशक्ति का विजृंभणमात्र | |
| है । प्रज्ञान आत्मा की शक्ति है । | |
| ६. आत्मा कर्तृत्वपूर्ण नित्य पञ्चकृत्य- | ६. आत्मा में कर्तृत्व नहीं है । |
| कारी है । इसका स्वभाव ही विमर्श | |
| है । उसके लिए ज्ञान एवं क्रिया | |
| एक से हैं । उसकी क्रिया ही ज्ञान | |
| है और उसका ज्ञान ही क्रिया है । | |
| ज्ञान-क्रिया की उन्मुखता ही ‘इच्छा’ | |
| है । | |
१. भोजराज—‘योगसूत्रवृत्ति’
२. ‘परमार्थचर्चाविवरण’ (पृ०६) अभिनवगुप्तपाद—‘तन्त्रालोक’

२६ | वरिवस्यारहस्ये
७. परमशिव इच्छामय है क्योंकि ज्ञान- | ७. ब्रह्म इच्छाविहीन एवं निरीह है।
क्रिया का औन्मुख्य ही इच्छा है। |
पञ्चकृत्य उसका स्वभाव है। |
८. दो का नित्य सामरस्य ही वास्तविक | ८. द्वैत अज्ञान है । अद्वैत द्वैताभाव
अद्वैत है । अद्वैत द्वैताभाव का | का वाचक है ।
वाचक नहीं है । |
९. शिव स्वयं का आवरक एवं स्वयं | ९. विक्षेप एवं आवरण शक्तियाँ ही
का उन्मीलक है । उसने लीला हेतु | जीव में उसकी इच्छा के विरुद्ध
आत्मप्रच्छादन कर रखा है । | अज्ञान एवं भ्रान्ति उत्पन्न करती हैं।
आच्छादन उसकी विवशता नहीं |
उसकी क्रीड़ा या लीला है । |
१०. ब्रह्म भी सत्य है और जगत् भी | १०. ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' ।
सत्य है । जीव और जगत् दोनों |
सत्य हैं । |
११. भेद-अभेद का ही आत्मप्रकाश है | ११. भेद मिथ्या है ।
अतः मिथ्या हो ही नहीं सकता । |
१२. शिव एवं शक्ति दोनो तत्वतः एक | १२. ब्रह्म एवं माया भिन्न-भिन्न हैं ।
ही हैं । दोनों में अभिन्नता है । |
१३. भेद एवं अभेद में, व्युत्थान एवं | १३. जब तक भेद है, द्वैत है, बंधन
निरोध में बन्धन एवं मुक्ति में, सुख | है, माया है, तब तक मुक्ति कहाँ?
एवं दुःख में, ब्रह्म एवं माया में |
द्वैत एवं अद्वैत में, तथा भेद एवं |
अभेद के भीतर सम्यग्दर्शन होने |
पर चिदानन्द की (शिवशक्ति के |
सामरस्य की) प्राप्ति होती है । |
१४. ब्रह्म, जीव एवं जगत् सभी चिन्मय | १४. ब्रह्म एवं जीव चिन्मय है जबकि
हैं । जगत् जब चैतन्य की सृष्टि है | जगत् जड़ है और जड़ वस्तु
तब अचैतन्य आयेगा कहाँ से ? | अचित् है अतः अनात्मक है ।
सर्वचिन्मयवाद ही सत्य है । जड़ता |
भी चैतन्य का एक रूप है, चैतन्य |
से पृथक् नहीं है अतः आत्मा का |
ही अवभास है । |
१५. ‘अद्वैत' द्वय का नित्य सामरस्य है। | १५. ‘अद्वैत' द्वय का अभाव है
१६. यह वसुगुप्त, उत्पल, सोमानन्द, | १६. यह शङ्कराचार्य द्वारा प्रतिपादित
अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज आदि द्वारा | अद्वैत दर्शन है ।
प्रतिपादित द्वयात्मक अद्वयवाद का |
दर्शन है । |

प्रथमोऽंशः २७
१७. जगत् शक्ति का आत्मस्फार है, यह
शिव का विजृंभण है, शिव की
आनन्दक्रीड़ा है, परमशिव स्वनिर्मित
चित्र है, शिव के आनन्दस्वभाव का
विकास है, परमशिव निर्मित एक
लीला-नाट्य है, शक्ति का व्यक्त
रूप है, आत्मा है अतः शिव और
शक्ति से अभिन्न है, भगवान् का
शरीर है, चिद्विलास एवं शिवात्मक
है, प्रकाश एवं प्रकाश की लीला
है, शिव की एक क्रीड़ा है,
सत्यात्मक है, शक्ति द्वारा स्वनिष्ठ
स्फुरत्ता का दर्शन है, चिच्छक्ति का
परिणाम है, शक्ति का आकार है,
शक्ति का आत्मविकास है,
स्वातंत्र्यशक्ति की आत्मक्रीड़ा है,
शिव का हृदय बीज है, प्रकाश के
साथ एकात्मरूप है, शिवशक्तिरूप
है, चैतन्यस्वभाव है—(‘चैतन्यं
विश्वस्य स्वभावः शिवसूत्र
विमर्शिनी’) एक चित्र है—आत्म
प्रच्छादन की क्रीड़ा है । (‘जगच्चित्रं
समालिख्य स्वेच्छातूलिकयात्मनि ।
स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति भगवान्
शिवः’, ‘जगच्चित्रं नमस्तस्मै कला-
श्लाध्याय शूलिने’, ‘आत्मप्रच्छादन-
क्रीड़ां कुर्वतो वा कथंचन’
(शिवदृष्टि)
१८. जगत् आनन्दरूप है । ‘सर्वं जगत्
स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् ।।’
(वि०भै०)
१७. ‘जगत’ मिथ्यात्व का दूसरा पर्याय
है ।
१८. जगत् दुःखरूप है ।
सावश्यं विज्ञेया यत्परिणामादभूदेषा ।
अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमय्यापि च सृष्टिः१ ॥ ५ ॥
१. ‘सृष्टि’ का स्वरूप क्या है? ‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’, ‘एकोऽहं बहुस्याम्’—
एक से बहुत होने की कामना ही सृष्टि है ।

२८ वरिवस्यारहस्ये
('परिणामवाद' एवं चतुर्विधा सृष्टि)
उस 'विमर्शरूपिणी' शक्ति को सम्यक रूप से (एवं) अवश्य जानना चाहिए
जिसके परिणामस्वरूप (यह) अर्थमयी, शब्दमयी, चक्रमयी एवं देहमयी सृष्टि (हुई)
है ॥ ५ ॥

  • प्रकाश *
    अवश्यम्, सर्वविज्ञानसाधनत्वान्मोक्षादिपुरुषार्थप्रदत्वाच्च । अर्थमयी शिवादि-
    क्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्त्वरूपा । शब्दमयी परादिवैखर्यन्ता । चक्रमयी बिन्द्वादिभूगृहान्ता ।
    देहमयी सूक्ष्मादिस्थूलान्ता ॥ ५ ॥
  • सरोजिनी *
    आचार्य भास्कर कहते हैं कि—विमर्शरूपिणी शक्ति को इसलिए अवश्यमेव
    जानना चाहिए क्योंकि वह समस्त विज्ञानों का साधन है एवं धर्म, अर्थ, काम एवं
    मोक्ष प्रदान करती है—'अवश्यम्, सर्वविज्ञान साधनत्वान्मोक्षादिपुरुषार्थप्रदत्वाच्च ।।'
    अर्थमयी—शिवादि क्षित्यन्तषट्त्रिंशत तत्त्वरूपा । अर्थात् समस्ततत्त्वमय ।
    'परशुराम कल्पसूत्र' में कहा गया है कि तत्त्व छत्तीस हैं—'षट्त्रिंशत्तत्वानिविश्व' ।
    ये तत्त्व तीन भागों में विभक्त है—(१) 'आत्मतत्त्व' (२) 'विद्यातत्त्व' (३) एवं
    'शिवतत्त्व' । ये ३६ तत्त्व निम्न हैं—(१) शिव (२) शक्ति (३) सदाशिव (४)
    ईश्वर (५) शुद्धविद्या (६) माया (७) अविद्या (८) कला (९) राग (१०) काल
    (११) नियति (१२) पुरुष/जीव (१३) प्रकृति (१४) मन (१५) बुद्धि (१६)
    अहङ्कार (१७-२१) श्रोत्रादि पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ (२२-२६) वागादि पञ्चकर्मेन्द्रियाँ (२७-
    ३१)—रूपादि पञ्चमहाविषय (३२-३६)—आकाशादिक पञ्चभूत । भगवती समस्त
    विश्व को जन्म देने में स्वतन्त्र हैं ।
    'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतुः ॥'१ क्षेमराज कहते हैं—'विश्वस्य'
    सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य 'सिद्धौ' निष्पत्तौ, प्रकाशने स्थित्यात्मनि, पर प्रमातृ-
    विश्रान्त्यात्मनि च संहारे, पराशक्तिरूपा 'चितिः' एव भगवती 'स्वतन्त्रा' अनुत्तर
    विमर्शमयी शिवभट्टारकाभिन्ना 'हेतु' कारणम् !'
    'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित् ॥'२
    शब्दमयी—शब्द की चार वृत्तियाँ हैं—(१) 'परा' (२) 'पश्यन्ती' (३)
    'मध्यमा' (४) 'वैखरी' ।। भगवती इन रूपों में भी परिणत होती हैं क्योंकि वे
    शब्दरूपा हैं—वे परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीरूपा हैं—'परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती
    पर देवता । मध्यमा वैखरीरूपा भक्त मानस हंसिका ॥'३ वेदों में वाक्चतुष्टय का
    उल्लेख है 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । तानिविदुर्ब्राह्मणो ये मनीषिणः । गुहा
    त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥'
    १-२. क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ३. श्रीललितासहस्रनाम

प्रथमोऽंशः २९
'चक्रमयी'—बिन्दु से लेकर भूगृहान्त समस्त चक्र । चक्र नवयोन्यात्मक है—
'नवयोन्यात्मकं चक्रं चिदानन्दघनं महत् । चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्न
मन्त्रकम् ।।'१ देवी चक्ररूपा है—'एवंविश्वप्रकारा च चक्ररूपा महेश्वरी ।।'२
त्रैलोक्यमोहन, सर्वशापरिपूरण, सर्वसङ्क्षोभण, सौभाग्यदायक, सर्वार्थसाधक,
सर्वरक्षाकर, सर्वरोगहर एवं सर्वसिद्धिप्रद चक्र ।।
'देहमयी'—(१) स्थूल देह (२) सूक्ष्म देह (३) कारणदेह आदि देह ॥३
'यत्परिणामात्'—जिसके परिणमन से—
परिणामवाद—एक रूप का तिरोभाव और रूपान्तर का आविर्भाव ही
'परिणाम' है । यथा 'दही' दूध का परिणाम या विक्रिया है—'परिणामे तु
रूपान्तरं तिरोभवति, रूपान्तरं च प्रादुर्भवति । 'परिणाम' उपादान के समान सत्ता
वाला होता है ।४
'परिणामवाद' का प्राचीन रूप—भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' में 'परिणाम' एवं
'विवर्त' दोनों को समानार्थक माना है । वे कहते हैं—'यह 'विश्व' शब्द का ही
परिणाम है ऐसा आम्नाय वेत्ताओं का कथन है, सर्वप्रथम यह जगत् छन्दों से ही
विवृत अथवा परिणत हुआ ।'
'शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः ।
छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ।।' (वा०प०, प्र०का०)
शान्तरक्षित ने 'तत्त्वसंग्रह' के आगम काण्ड में कहा गया है कि—
'विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः । इस प्रथम कारिका के 'विवर्त' शब्द का
'परिणाम' शब्द के द्वारा ही अनुवाद किया है—'नाशोत्पादसमालीढं ब्रह्म शब्दमयं च
यत् । यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते ॥'
भवभूति को भी, 'परिणाम' एवं 'विवर्त' में कोई भेदक रेखा है—यह ज्ञात
नहीं था इसीलिए उन्होंने दोनों शब्दों को समान अर्थ में व्यवहृत किया है—
'एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्
भिन्न पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान् ।
आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान्विकारा
नंभो यथा सलिलमेव हितत्समस्तम् ।।'
'विवर्त' अधिष्ठान से विषम सत्ता रखता है ।
शङ्कराचार्य विवर्तवादी थे कि परिणामवादी?—ब्रह्मसूत्र के भाष्यकार वेदान्ती
शङ्कराचार्य को सभी 'विवर्तवादी' मानते हैं और वे 'विवर्तवादी' के रूप में प्रसिद्ध
भी हैं किन्तु 'सौन्दर्यलहरी' के तांत्रिक स्तोत्र में वे परिणामवाद का समर्थन करते
हैं—
१-२. योगिनीहृदय ३. 'प्रकाश' (भास्करराय)
४. 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विवृति विमर्शिनी' (पृ० ८, अ० १, वि० १)

३० वरिवस्यारहस्ये
'मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि,
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव त्वामात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा,
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन विभृषे ॥ ३५ ॥'
आचार्य शङ्कर 'सौन्दर्यलहरी' के इस श्लोक द्वारा स्वाभीष्ट 'परिणामवाद' की
पुष्टि करते हैं ।१
आचार्य भास्करराय का परिणामवाद—योगिराज भास्करराय सृष्टि के सन्दर्भ
में 'परिणामवाद' के प्रतिपादक हैं । किन्तु यह 'परिणाम' सामान्य परिणाम से भिन्न
है । जिस प्रकार मिट्टी एवं उसके परिणाम रूप घट में कोई भेद नहीं हैं उसी
प्रकार ब्रह्म एवं जगत् में कोई भिन्न नहीं है । ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य है।
भेद मात्र ही मिथ्या है—वस्तुतस्तु जगतो ब्रह्मपरिणामकत्वं स्वीकुर्वतां तांत्रिकाणां मते
जगतः सत्यत्वमेव मृद्घटयोरिव ब्रह्मजगतोरत्यन्तभेदेन ब्रह्मणः सत्यत्वेन जगतोऽपि
सत्यत्वावश्यम्भावात् भेदमात्रस्य मिथ्यात्व स्वीकारेण अद्वैतश्रुती नामखिलानां
निर्वाहः ।'२
आचार्य भास्करराय ने 'वाचारंभणंविकारः'—(छा०उ०) 'आत्मकृतेः परिणामात्'
(ब्रह्मसूत्र) को उद्धृत करके 'वरिवस्यारहस्यम्' में परिणामवाद की पुष्टि ही नहीं की
प्रत्युत यह भी कहा कि वेदों की एवं ब्रह्मसूत्रकार की भी यही दृष्टि थी ।
'श्रीकण्ठभाष्य' में भी परिणामवाद का समर्थन किया गया है—
'कारणविकाररूपोहि परिणाम पूर्वरूपपरित्यागेन रूपात्तरापत्तिः परिणामः ॥'
वल्लभाचार्य ने 'परिणामवादएवाभिप्रेतः'३ कहकर, निम्बार्काचार्य ने 'सर्वज्ञं
सर्वशक्ति ब्रह्म स्वशक्तिविक्षेपेण जगदाकारं स्वात्मानं परिणामय्य अव्या कृतेन स्वरूपेण
शक्तिमता कृतिमत्ता परिणतमेव भवति ।'४ भास्कराचार्य ने 'परमात्मा स्वयमात्मानं
कार्यत्वेन परिणामयामासेत्यर्थः ।'५ कहकर एवं श्रीपति पण्डित ने 'चेतना चेतनात्मक
प्रपञ्चाकारेण परिणामात् । ननुदधि-क्षीर न्यायवत् स्वस्वरूप परित्यागपूर्वक रूपान्तर
प्राप्तिरेव परिणामः ।'६ कहकर 'परिणामवाद' का प्रतिपादन किया है ।
किन्तु यह 'परिणामवाद' रामानुजाचार्य (श्रीभाष्य में) के परिणामवाद से भिन्न
है ।
१. लक्ष्मीधर—'लक्ष्मीधरा' व्याख्या—"परिणमयितुं परिणाम वन्तं कर्तुं"
'डिण्डिमभाष्य'—"तदाकार परिणामनम् । त्वमेवाष्टमर्तिरूपेण परिणतासि'
'अष्टमूर्तिरूपेण परिणतायाम्', 'आभ्यां परिणामाभ्यामेव जगच्चक्रं उन्मूलयति' ।
'गोपालसुन्दरी टीका'—'परिणमयितुं परिणामं प्रापयितुं ।
२. 'सौभाग्यभास्करः' (पृ० १५१) ३. अणुभाष्य
४. 'वेदान्त पारिजात' (१।४।६) ५. भास्कराचार्य
६. श्रीपतिपण्डित 'श्रीकरभाष्य'

प्रथमोऽंशः ३१
उपर्युक्त परिणामवाद ‘अविकृत परिणामवाद’ है। ‘अपूर्व परिणामवाद’ है। जो
ब्रह्म अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है वह विश्वरूप में परिणत होने पर भी विकृत नहीं
होता।
‘वामकेश्वर तन्त्र’ में ‘तस्यां परिणतायां तु न कश्चित्पर इष्यते’१ ‘तस्य दृश्यं
तत्परिणम एवं, तस्यां परिणतायां’२ वाक्यों द्वारा ‘परिणामवाद’ ही तो उसका अभीष्ट
प्रतीत होता है। यद्यपि इन वाक्यों में आए ‘परिणतायां’ का अर्थ जयरथ ने
‘विद्यमानायां’ किया है किन्तु तन्त्राचार्य भास्करराय ने इसका वास्तविक अर्थ
‘परिणत होने पर’ ही किया है। ‘चतुश्शती’ में भी इसी दृष्टि को प्रतिपादित किया
गया है—
‘त्रिपुरा परमाशक्तिराद्यजाता महेश्वरी।
स्थूलसूक्ष्मस्वभावेन त्रैलोक्योत्पत्तिमातृका॥
कवलीकृत निःशेष तत्त्वग्रामस्वरूपिणी।
यस्यां परिणतायान्तु न किञ्चित्परमिष्यते॥’
‘परिणामवाद’ में त्रुटि यह है कि ‘परिणाम’ में रूपान्तर का आविर्भाव एवं
पदार्थ के पूर्व रूप का तिरोभाव हो जाता है। ‘परमशिव’ प्रकाश है। प्रकाश के
रूपान्तर का अभाव संभव नहीं है क्योंकि तब तो (तिरोधान की स्थिति में)
अंधकार छा जाएगा। ऐसी स्थिति में ‘अप्रकाश’ प्रकाश में कैसे आएगा? इस
प्रकार ‘विवर्त’ एवं ‘परिणाम’ दोनों ही स्थितियों में जगत् के प्रकाश में आने की
व्याख्या संभव नहीं है—‘परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति। रूपान्तर च प्रादुर्भवति।
प्रकाशस्य तु रूपान्तर भावात् तत्तिरोधाने स्यादान्ध्यम्। अप्रकाशश्च प्रादुर्भवन् नैव
प्रकाशेत् इति उभयथापि सुप्तं जगत् स्यात्॥’३
इसी प्रकार ‘प्रतिबिम्बवाद’ भी सदोष है क्योंकि—‘प्रतिबिम्ब’ में संवेदन की
स्वच्छता मात्र होती है—प्रतिबिम्ब में स्वातन्त्र्य नहीं है—
प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभाव परमशिव स्वातन्त्र्य द्वारा रुद्र से स्थावर पर्यन्त,
प्रमातृरूप में, नील सुखादि प्रमेय रूप में, अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्त की
भाँति एवं स्वरूप को अनावृत किए हुए भी संवित् रूप में, अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति
की महिमा से प्रकाशित होता है।४
भास्करराय की दृष्टि में शङ्कराचार्य—भास्करराय मखिन की दृष्टि में
शङ्कराचार्य परिणामवादी थे। वे कहते हैं कि ‘मनस्त्वं व्योमस्त्वम्’ इति श्लोके
‘त्वयिपरिणतायाम्’ इति स्वाभिमतः ‘परिणामवाद’ एव स्फुटीकृतः॥५ ‘विवर्तवाद’
वेदान्ति संमतं परिणामवादी तांत्रिको दूषयति’ ‘परिणामवाद एवाभिप्रेतः’६ ‘श्रुतेरपि
१-२. वामकेश्वर तन्त्र,
३-४. ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृति विमर्शिनी’ (अ. १; २०, वि. १, पृ. ८९)
५. वरिवस्यारहस्य—‘प्रकाश’ टीका (१।३) ६. तत्रैव

३२ वरिवस्यारहस्ये
परिणामवाद एव संमतः सिध्यति 'आत्मकृतेः परिणामात्'
अर्थमयी—जगत् 'विमर्श शक्ति' का परिणाम है । 'विमर्श शक्ति' शब्द अर्थ,
चक्र एवं देह के रूप में परिणत होकर जगत् बन जाती है । विमर्श 'विश्वरूपिणी'
है—
'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ॥'१
"सैव परा शक्तिर्विमर्शरूपिणी स्वेच्छया विश्वरूपिणी विश्वं सृजति ॥"२
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है कि शक्ति अपने अन्तःस्थित विश्व को ही
प्रकट करती है—'अन्तःस्थितवतामेव घटते बहिरात्मना ।'
अभिनवगुप्त भी कहते हैं—'यस्यामन्तर्विश्वमेतद्विभाति बाह्याभासं भासमानं
विसृष्टौ' विश्व परासत्ता से पृथक् कोई अन्य स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—'इदं... विश्वं वा
परस्यां पारमेश्वर्यां भैरवसंविदि अविभागेन बोधात्मकेन रूपेणास्ते ॥' 'चितिः स्वतन्त्रा
विश्वसिद्धि हेतुः ॥' (प्र०ह०) कहकर क्षेमराज ने भी जगत् को चितिशक्ति से
अभिन्न स्वीकार किया है क्योंकि वह स्वेच्छापूर्वक स्वभित्ति पर विश्व का उन्मीलन
करती है—
'स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति । (प्र०ह०२)
(१) 'जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् ।'३
(२) ननुं जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित् ॥४
(३) चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्त जगदात्मना स्फुरति ।५
(४) परमानन्दमयप्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादिधण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव
स्फुरति । न तु वस्तुतः अन्यत किंचित् ग्राह्यं ग्राहकं वा । श्रीपरमशिव-
भट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति ।६
(५) श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं ।
(६) विश्वशरीर शिवैकरूप एव । 'विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव ॥ 'न साऽवस्था
न यः शिवः ॥'७
(७) शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतां पश्यन्ति ॥८

१. योगिनीहृदय २. दीपिका
३-७. प्र० ह०
८. एक 'मायाण्ड' में असंख्य प्रकृत्यण्ड हैं । एक एक प्रकृत्यण्ड में असंख्य
'ब्रह्माण्ड' हैं । 'मायाण्ड'—पुरुष से षट्कंचुक पर्यन्त तत्त्वों द्वारा निर्मित है ।
'शाक्ताण्ड' माया से ऊपर है । यह ज्योतिर्मय एवं शुद्ध सत्वात्मक हैं ।
इसका उपादान शुद्धविद्या, ईश्वर एवं सदाशिव हैं ।

प्रथमोऽंशः ३३
—वाक्यों द्वारा आचार्य क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में यह प्रतिपादित किया
है कि सारे अर्थ, समस्त अर्थमयी सृष्टि, समस्त विश्व एवं समस्त तत्त्व (३६
तत्त्व) भगवती चिति या विमर्श शक्ति के ही अपने परिणाम या रूपान्तर हैं ।
पृथिवी से शक्तितत्त्वपर्यन्त यह समस्त सृष्टि पाँच अण्डों में विभक्त है जो
निम्नांकित हैं—(१) पिण्ड (२) ब्रह्माण्ड (३) प्रकृत्यण्ड (४) मायाण्ड (५)
शाक्ताण्ड
ये पाँचों अण्ड 'विश्व' हैं । शिव तत्त्व 'विश्वातीत' एवं शून्य है ।
(i) 'शाक्ताण्ड' में शान्तिकला है । इसके अधिष्ठाता सदाशिव हैं ।
(ii) 'मायाण्ड' में विद्या कला है । इसके अधिष्ठाता रुद्र हैं ।
(iii) 'प्रकृत्यण्ड' में प्रतिष्ठा कला है । इसके अधिष्ठाता विष्णु हैं ।
(iv) 'ब्रह्माण्ड' में निवृत्ति कला है । इसके अधिष्ठाता ब्रह्मा हैं ।
[चित्र-विवरण:]
शान्त्यतीत कला } विश्वातीत
विश्व ↓
शाक्ताण्ड (अधिष्ठाता : सदाशिव) — शान्ति कला
मायाण्ड (अधिष्ठाता : रुद्र) — विद्या कला
प्रकृत्यण्ड (अधिष्ठाता : विष्णु) — प्रतिष्ठा कला
ब्रह्माण्ड (अधिष्ठाता : ब्रह्मा) — निवृत्ति कला
[मण्डल चक्र के अन्तर्गत:]
बाह्य वृत्त: विश्वातीत — शिव तत्त्व
द्वितीय वृत्त: सदाशिव, ईश्वर, सद्विद्या, शुद्धविद्या
तृतीय वृत्त: विद्या कला
चतुर्थ वृत्त: प्रतिष्ठा कला
केन्द्र: १४ भुवन, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा
अधोभाग: रुद्र मायाण्ड, विष्णु प्रकृत्यण्ड
ब्रह्माण्ड में
१. ७ ऊर्ध्वलोक (भूलोक से सत्यलोक)
२. ७ अधोलोक (तल, वितल, सुतल,
तलातल, पाताल आदि ७ लोक)
३ वरि.

३४ वरिवस्यारहस्ये
(v) शिव तत्त्व में शान्त्यतीत कला है ।
(vi) परमशिव निष्फल परमपद है । यह विश्वात्मक एवं विश्वातीक दोनों है ।
अर्थमयी—शिवादिक्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्त्वरूपा ॥ सृष्टि मुख्यतः द्विरूपा है । (१)
शब्दमयी (२) अर्थमयी । यह अर्थमयी सृष्टि त्रिस्तरीया है—
(१) अभेद भूमि—परमशिव = 'अहमस्मि'
(२) भेदाभेदभूमि—शिव, शक्ति से शुद्धविद्याः = 'अहमिदम्' ।
(३) 'भेदभूमि' = माया से पृथ्वी = 'इदमहम्' । इस त्रिस्तरीय सृष्टि को—
(१) ऐं = 'आत्म तत्त्व' (२) ह्रीं = 'विद्या तत्त्व' (३) क्लीं = 'शिव तत्त्व' के
रूप में भी निरूपित किया गया है ।
(क) शिव तत्त्व = (१) शिवतत्त्व, (२) शक्तितत्त्व ।
(ख) विद्या तत्त्व = (३) सदाशिव, (४) ईश्वर, (५) शुद्ध विद्या
(ग) आत्म तत्त्व = (६) माया, (७) कला, (८) विद्या, (९) राग, (१०)
काल, (११) नियति, (१२) पुरुष, (१३) प्रकृति, (१४) बुद्धि, (१५) अहङ्कार,
(१६) मन, (१७-२१) श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण (पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ)
(२२-२६) वाक्, पाणि, पाद, पाय, उपस्थ (पञ्च कर्मेन्द्रियाँ); (२२-३१) शब्द,
स्पर्श, रूप, रस, गन्ध (पञ्च विषय), (३२-३६) आकाश, वायु, वह्नि, सलिल,
भूमि (पञ्चभूत) ॥
परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षा के उदय होते ही उसके दो रूप हो जाते हैं—
(१) शिवरूप .(२) शक्तिरूप । 'शिव' = प्रकाशरूप । 'शक्ति' = विमर्शरूप ।
विमर्श = पूर्ण अकृत्रिम अहं की स्फूर्ति । यह स्फूर्ति—
(१) सृष्टिकाल में विश्वाकार रूप में
(२) स्थिति काल में—विश्वप्रकाश रूप में
(३) संहारकाल में—विश्वसंहरण के रूप में प्रस्तुत होती है । इसी विमर्श
शक्ति के ही नामान्तर हैं—स्फुरत्ता, स्पन्द, महासत्ता, परावाक् आदि ।
प्रमा के दो रूप हैं—(क) अहमंश = ग्राहक शिव (ख) इदमंश = ग्राह्य
शक्ति । शिवतत्त्व में—अहं विमर्श, सदाशिवतत्त्व में अहमिदं विमर्श एवं ईश्वरतत्त्व
में इदमिदं विमर्श होता है । सद्विद्या में—अहं एवं इदं दोनों की समभावेन प्रधानता
रहती है । मायाशक्ति'→अहं एवं इदं में पार्थक्य→अहमंश हो जाता है—'पुरुष' ।
इदमंश हो जाता है—'प्रकृति' ।
'परशुरामकल्पसूत्र' में कहा गया है—'षट्त्रिंशत्तत्वानिविश्व' यह समस्त जगत्
षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मक है । इसका स्वरूप निम्नानुसार है—

प्रथमोऽंशः ३५
┌──────────┐
│ परा संवित् │
└──────────┘
[ शिवतत्त्व ]
शिवतत्त्व | शक्तितत्त्व
( उन्मनी शक्ति ) | ( समनी शक्ति )
[ विद्यातत्त्व ] [ शुद्ध तत्त्व ]
अहं — (अहं इदं) — इदं
मन्त्र महेश्वर | सादाख्य तत्त्व ( नादशक्ति )
अहं — (अहं इदं) — इदं (ईश्वर तत्त्व)
मन्त्रेश्वर | ( बिन्दुशक्ति )
सद्विद्या से नीचे एवं
माया
से ऊपर विज्ञानाकल : (अहं इदं) सद्विद्यातत्त्व
मन्त्र और ८ विद्येश्वर
[ आत्मतत्त्व ] [ शुद्धाशुद्ध तत्त्व ]
माया में प्रलयाकल
पुरुष | प्रकृति
ब्रह्मा से सब (अहं) (इदं)
बद्ध जीवों =
सकल
[ अशुद्धतत्त्व ]
बुद्धि से
पृथ्वी तत्त्व
पर्यन्त
इ द म ह म्
अ ह मि द म्
अहमस्मि ← ┌───────────┐
(पूर्णाहन्ता) │ मूल तात्विक │
│ सृष्टिस्तर │
└───────────┘

३६ वरिवस्यारहस्ये
अर्थमयी सृष्टि अर्थमयी है । ३६ तत्त्व ही मूल अर्थ हैं और समस्त जगत्
इन्हीं अर्थों का विकसित एवं विराट् रूप है ।
३६ तत्त्व निम्नांकित है—

वर्गकलातत्त्वभुवन संख्याभुवनों के नाम
(अ) शुद्ध तत्त्व१. शान्त्यतीता कला(क) शुद्धतत्त्व<br>१. शिव१०अनाश्रित, अनाथ, अनन्त, व्योम-रूपिणी, व्यापिनी, ऊर्ध्वगामिनी, मोचिका, रोचिका, दीपिका, इन्धिका । (इनमें ५ शाक्त भुवन हैं । ५ नादोर्ध्व भुवन हैं ।)
२. शक्ति०५शान्त्यतीता, शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा, निवृत्ति । ये बैन्दवपुर कहलाते हैं ।
१५
२. शान्ति कलाशुद्ध तत्त्व<br>३. सदाशिव तत्त्व०१सदाशिव भुवन ।
४. ईश्वरतत्त्व०८शिखण्डी, श्रीकण्ठ, त्रिमूर्ति, एक नेत्र, एक रुद्र, शिवोत्तम, सूक्ष्म, अनन्त ॥
५. शुद्ध विद्यातत्त्व०९मनोन्मनी, सर्वभूतदमनी, बल-प्रमथिनी, बलविकरणी, कल-विकरणी, काली, रौद्री, ज्येष्ठा, वामा ॥
१८
(आ) शुद्धाशुद्ध तत्त्व३. विद्या कला(ख) शुद्धाशुद्ध तत्त्व<br>६. माया०८अङ्गुष्ठ मात्र, ईशान, एकेक्षण, एक पिङ्गल, उद्भव, भव, वामदेव, महाधुति ।
७. काल०२शिखेश, एकवीर ।
८. कला०२पञ्चान्तक, शूर ।
९. विद्या०२पिङ्ग, ज्योति ।
१०. नियति०२संवर्त, क्रोध ।
११. राग०५एकशिव, अनन्त, अज, उमापति, प्रचण्ड ।

प्रथमोऽंशः ३७
१२. पुरुष ०६ एकवीर, ईशान, भव, ईश, उग्र, भीम, वामा ।
२७
(इ) अशुद्ध तत्त्व ४. प्रतिष्ठा कला (ग) अशुद्ध तत्त्व १३. प्रकृति ०८ श्रीकण्ठ, औम, कौमार, वैष्णव, ब्रह्म, भैरव, कृत, अकृत ।
१४. बुद्धि ०८ ब्राह्म, प्रजेश, सौम्य, ऐन्द्र, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच ।
१५. अहङ्कार ०१ स्थलेश्वर एक भुवन है ।
१६. मन ०१ स्थूलेश्वर एक भुवन है ।
१७. श्रोत्र
१८. त्वक
१९. चक्षु
२०. जिह्वा
२१. नासा
२२. वाक ०१ शङ्कुकर्ण एक भुवन है ।
२३. पर्णि
२४. पाद
२५. पायु
२६. उपस्थ
२७. शब्द ०५ कालञ्जर, मण्डलेश्वर, माकोट, द्राविड, छगलान्ड—५ भुवन ।
२८. स्पर्श
२९. रूप
३०. रस
३१. गंध
३२. आकाश ०८ स्थाणु, स्वर्णाक्ष, भद्रकर्ण, गोकर्ण, महालय, अविमुक्त, रुद्रकोटि, वस्त्रपाद ।
३३. वायु ०८ भीमेश्वर, महेन्द्र, अट्टहास, विमलेश, नल, नाकल, कुरुक्षेत्र, गया ।
३४. तेजस् ०८ भैरव, केदार, महाकाल, मध्यमेश, अम्रातक, जल्पेश, श्रीशैल, हरिश्चन्द्र ।
३५. जल ०८ लकुलीश, पारभूति, डिण्डी, मुण्डी, विधि, पुष्कर, नैमिष, प्रभास, अमरेश ।
५६

३८ वरिवस्यारहस्ये
शब्दमयी—परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी रूपा । भास्करराय के मतानुसार—(१)
शब्दब्रह्मरूप बीज की उच्छूनतावस्था ही 'परावाक' है । (२) शब्दब्रह्मरूप इस बीज
की स्फुटितावस्था 'पश्यन्तीवाक्' है । (३) इस बीज की मुकुलित, अव्यक्त किन्तु
दलद्वयावस्था 'मध्यमा वाक्' है । (४) और इस बीज की सम्यक् विकसितावस्था
'वैखरीवाक्' है । “तत्र शब्दब्रह्मरूपस्य बीजस्योच्छूनतावस्था 'परा' स्फुटितावस्था
'पश्यन्ती', मुकुलिताव्यक्तं दलद्वयं 'मध्यमा' । सम्यग् विकासेन प्रसृतं मिथः
संसृष्टमूल दलद्वयं 'वैखरी' ।।”१
आचार्य शङ्कर कहते हैं कि विचिकीर्षु घनीभूता चित् शक्ति 'बिन्दु' बन जाती
है—'विचिकीर्षुर्घनीभूता सा चिदभ्येति बिन्दुताम् ।।२
बिन्दु—कारणबिन्दु→कार्यबिन्दु→नाद→बीज । (यही त्रिक क्रमशः 'पर'
'सूक्ष्म' एवं 'स्थूल' कहा जाता है । 'कारणबिन्दु' 'कर्मबिन्दु' 'नाद' एवं 'बीज' के
अधिदेवता अव्यक्त, ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट, शान्ता, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री,
अम्बिका, इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया है । निम्न पीठ ही अधिभूत है—'कामरूप'
'पूर्णगिरि', 'जालन्धर' एवं उड्डयाण पीठ । 'कारणबिन्दु'—त्रिकोत्पत्ति द्वारा
भेदात्मकता का उदय→अव्यक्त शब्दब्रह्मात्मक 'ख'→'बिन्दोस्तस्माद भिद्यमानाद्-
व्यक्तात्मा रवोऽभवत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः शब्दब्रह्मेति गीयते ।।'३ 'रव' =
'कारण-बिन्दु' । 'कारणबिन्दु' से तादात्म्यापन्न 'ख' मूलाधार में व्यक्त—'देहेऽपि
मूलाधारेऽस्मिन् समुदेति समीरणः । विवक्षोरिच्छयोत्थेन प्रयत्नेन सुसंस्कृतः । स
व्यञ्जयति तत्रैव शब्दब्रह्माणि सर्वगम् ।।'४ कारणबिन्दुरूप यह अभिव्यक्त शब्दब्रह्म
निस्पन्द रहता है और यही है 'परावाक्'—'कारण बिन्द्रात्मकमभिव्यक्तं शब्दब्रह्म
स्वप्रतिष्ठतया निस्पन्दं चदेव च परावागित्युच्यते ।।'५ 'बिन्दु' = पश्यन्ती । 'नाद' =
मध्यमा । 'बीज' = बैखरी । कारणात्मक बिन्दु—अव्यक्तात्मक 'ख' (शब्दब्रह्म) ।
कारणबिन्द्रात्मक यह शब्दब्रह्म निस्पन्द 'परावाक्' है ।
परतत्त्व → प्रकृति (परा प्रकृति) → घनीभूत ब्रह्म
घनीभाव के लिए जो व्यापार होता है वही है 'विचिकीर्षा' (इच्छा-ज्ञान क्रिया
रूप विचिकीर्षा) । प्रकृति की घनावस्था उच्छूनावस्था है जिसमें प्रकृति कर्मों की
अपूर्वावस्था को छोड़कर परिपक्व दशा में अविभक्त रूप से स्थित हो । पक्व कर्मों
से सम्बद्धरूपता ही घनीभाव है । कर्माभिन्नरूपं ही 'बिन्दु' है । कारण बिन्दु
(प्रकृति) का विभाजन→(१) पर (२) सूक्ष्म (३) स्थूल (बिन्दु । कार्यबिन्दु) नाद
एवं बीज—
कालेन भिद्यमानस्तु स बिन्दुर्भवति त्रिधा ।
स्थूल सूक्ष्म परत्वेन तस्य त्रैविध्यमिष्यते ।
स बिन्दु नाद बीजत्वभेदेन च निगद्यते ।।६
१. सौभाग्यभास्कर (पृ० ३३) २-४. प्रपञ्चसार तन्त्र (प्रथम पटल)
५. सौभाग्यभास्कर ६. प्रपञ्चसार तन्त्र

प्रथमोऽंशः ३९
'कार्य बिन्दु' ही 'पश्यन्ती' है, नाद ही 'मध्यमा' है एवं बीज ही वैखरी' है ।
तान्त्रिकों की 'प्रकृति' सांख्य की प्रकृति से भिन्न है क्योंकि यह चिद्रूप है । यह
निश्चल, परावाक्रूप, प्रणवात्मक कुण्डलिनी शक्ति है—'प्रकृतिः निश्चला परावाग्रूपिणी
पर प्रणवात्मिका कुण्डलिनी शक्तिः' ।।१
'परावाक्'—जो निःस्पन्द चित् शक्ति है वही पर शब्द या परावाक् है । एक
ही परावाक् गतिशील होने पर सामान्य स्पन्द के रूप में 'पश्यन्ती', विशेष स्पन्द
के रूप में 'मध्यमा' एवं स्पष्टतः उच्चरित होने के रूप में 'वैखरी' कहा जाता है ।
एक ही चित् (चैतन्यशक्ति) या परावाक् गतिशील होने पर 'शब्द' एवं 'अर्थ' के
रूप में रूपान्तरित हो उठता है । परावाक् आत्मस्फुरण की अवस्था है । वामकेश्वर
तन्त्र के मतानुसार 'प्रकाश' के निम्न चार अंश हैं—१. अम्बिका २. वामा ३.
ज्येष्ठा एवं ४. रौद्री । 'विमर्श' के निम्न चार अंश हैं—१. शान्ता २. इच्छा ३.
ज्ञान और ४. क्रिया । प्रकाशांश 'अम्बिका' एवं विमर्शांश 'शान्ता' की समरसावस्था
में शान्ताभावसमापन्न पराशक्ति ही 'परावाक्' कहलाती है—
'आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला ।
अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ।।' (योगिनीहृदय)
आत्मस्फुरण की अवस्था में समग्र विश्व बीजात्मना (अस्फुट रूप में)
आत्मसत्ता में विद्यमान रहता है । तदनन्तर 'शान्ता' से इच्छा का उदय होने पर
वह अव्यक्त विश्वशक्ति के गर्भ से निःसृत होता है । उस समय इच्छा शक्ति वामा
शक्ति से तादात्म्य अधिगत करती है और 'पश्यन्ती' की आख्या प्राप्त करती है ।
तदनन्तर ज्ञानशक्ति का उन्मेष होता है । ज्ञानशक्ति 'ज्येष्ठा' से अभिन्न है और
'मध्यमा' कहलाती है । ज्ञानानन्तर क्रियाशक्ति 'रौद्री' के साथ एकीभूत होकर
'वैखरी' कहलाती है । विश्व वैखरी का ही विस्तार है । शान्ता एवं अम्बिका का
सामरस्य ही परावाक् है । यह वाक् चतुष्टय परस्पर मिलकर मूल त्रिकोण
(महायोनि) के रूप में रूपान्तरित हो जाता है । 'परावाक्' इस त्रिकोण का केन्द्र है
जो नित्यस्पन्दमय है । 'पश्यन्ती' इसकी वामरेखा, वैखरी इसकी दक्षिण रेखा एवं
मध्यमा अग्ररेखा है । मध्य में स्थित महाबिन्दु शिव-शक्ति का स्थान है ।
वैयाकरणों के मत में पश्यन्ती ही वाणी का परा रूप है । अक्षर, 'शब्दब्रह्म',
परब्रह्म या परावाक् इसके विभिन्न नाम हैं । वैयाकरणों की दृष्टि में शब्दब्रह्म एवं
परब्रह्म अभिन्न है । आगमों में 'शब्दब्रह्म' ही परावाक् के नाम से प्रसिद्ध है ।
अद्वैतवादी परावाक् को परमेश्वर की स्वाभाविक या माहेश्वरी शक्ति मानते हैं ।
'परावाक्' स्वाभाविक है—'परावाक् स्वरसोदिता' परावाक् के दो कार्य हैं—(१)
स्वरूपाच्छादन (२) विकल्पप्रकटीकरण (विक्षेपोद्भावन)
परावाक् ही शुद्ध ज्ञान में विकल्पानुगत होकर निर्विकल्पक शुद्ध ज्ञान को
सविकल्पक अशुद्ध ज्ञान के रूप में परिणत कर देती है । ज्ञानी लोग ज्ञान के इस
१. प्रपञ्चसार तन्त्र विवरण (पटल ३०)

४० वरिवस्यारहस्ये

विकल्पांश की अपसारणा करके विशुद्ध निर्विकल्पक ज्ञान में अवस्थित हुआ करते
हैं । यह निर्विकल्पक शुद्ध ज्ञान परावाक् से भी अतीत है अतः परावाक् का
अतिक्रमण करने के पूर्व निर्विकल्प अवस्था प्राप्त करना संभव नहीं है । अद्वैतवादी
‘परावाक्’ को परमात्मा की माहेश्वरी शक्ति (स्वाभाविक शक्ति) मानते हैं । इसलिए
कहा गया है—‘परावाक् स्वरसोदिता’ । यह आगुन्तक शक्ति नहीं प्रत्युत् परमात्मा
का विमर्श भाव है । परमात्मा से परावाक् कभी पृथक् नहीं होती । जब परमेश्वर
विश्व-लीला करना चाहते हैं तब अपनी अनुत्तरा ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ द्वारा अपने को
परिच्छिन्न करके ‘आणव मल’ ग्रहण करते हैं और परिणामस्वरूप ग्राह्यग्राहक भाव
प्रकट हो उठता है । जो पूर्णस्थिति है वह परप्रमातृरूप है और वहाँ ग्राह्यग्राहक
भाव का अभाव है अतः वहाँ प्रमाता-प्रमेय-प्रमाण का भेद नहीं है किन्तु परमेश्वर
अपनी ‘स्वातंत्र्य’ नाम्नी शक्ति द्वारा अद्वैतस्थिति में द्वैतभाव आविर्भूत करके
ग्राह्यग्राहक ग्रहण भाव की त्रिपुरी को प्रकट करते हैं । चित्तरूपी ग्राहक के समक्ष
विकल्प रूप अर्थ ही विषय के रूप में प्रस्तुत होते हैं । इस आविर्भाव क्रम का
कारण भी परमेश्वर की पराशक्ति परावाक् ही है ।
रसात्मक स्वरस में आविर्भूत शक्ति का नामान्तर ही परावाक् है—‘परावाक्
स्वरसोदिता’ ।। प्रपञ्च का स्वरस वैखरी है क्योंकि प्रपञ्च में वैखरी का ही स्वरस
प्रवाहित हो रहा है । वैखरी में मध्यमा का, मध्यमा में पश्यन्ती का एवं पश्यन्ती
में परावाक् का स्वरस तरंगित हो रहा है किन्तु परावाक् में किसी का भी नहीं
प्रत्युत् अपना ही रस (स्वरस) तरंगित हो रहा है इसीलिए तो शास्त्रकारों ने कहा
है कि—‘परावाक् स्वरसोदिता’ । यदि यह कहा जाय कि परावाक् में परमेश्वर का
स्वरस प्रवाहित हो रहा है तो अनुचित होगा क्योंकि यद्यपि परावाक् परमेश्वर की
अपनी शक्ति है किन्तु ‘शक्ति’ शक्तिमान से भिन्न नहीं है । इस प्रकार भी तो कहा
जा सकता है कि परमेश्वर परावाक्रूपी रसात्मक ‘स्व’ के कारण ही शक्तिमान एवं
परम ईश्वर है ।
प्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है कि—‘प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही सरस परावाक्
है। परमात्मा का यह स्वातंत्र्य ही उनका मुख्य ऐश्वर्य है । वह सर्वदेश काल में
स्फुरण करती हुई महासत्ता सबका अधिष्ठान है और परमेश्वर का हृदय है।’
उसका रूप है अंतः सङ्कल्प । उसमें शब्द एवं अर्थ दोनों एक साथ स्फुरित होते
हैं अतः दोनों में अभेद है । जिस प्रकार निजात्मा संवित् से सम्पूर्ण जगत्
अनुविद्ध है तद्वत संवित् से सम्पूर्ण वाणी अनुविद्ध है । योगिनाथ ने ठीक ही
कहा है कि परतत्व में किसी भी वस्तु की सिद्धि के लिए वाणी को स्वीकार करना
पड़ता है । वह शक्ति शब्द का रूप धारण करके अर्थ को प्रकट करती है ।
संवित्रसूत वाणी के बिना किसी भी अर्थ का अवधारण नहीं हो सकता ।
सर्वप्रकारक संवित्स्वरूप की प्रभा के समान प्रकाशन शक्ति अंतस्सङ्कल्पतारूपा वाणी
बनकर फिर वर्ण, पद, वाक्य को जीवन-दान करती है और पदार्थ के रूप में
बाहर दिखती है ।

प्रथमोऽंशः ४१
'अम्बिका' में 'शान्ता' का साम्य होने पर 'मूलबिन्दु' का उदय होता है ।
इसीका नाम है 'परावाक्' । परमात्मा या सदाशिव इसी 'मूलबिन्दु' की अवस्था
विशेष का नाम है । पौष्कर में परावाक् को 'सूक्ष्मा' अभिधान देकर इसका इस
प्रकार निरुपण किया गया है—'सूक्ष्माचिदेकशरणा निवृत्ताशेषशक्तिका ।'१
शैवपरिभाषाकार योगीन्द्रज्ञान शिवाचार्य इसका स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—
'तत्र ज्ञानैकाश्रया अर्थसामान्य प्रकाशिका वाणी सूक्ष्मा ।।'२ विभिन्न वाणियों की
कारण-कार्य-परम्परा निम्नानुसार है—
'वैखर्याः कारणं मध्या, पश्यन्ती मध्यमां प्रति ।
पश्यन्त्याः कारणं सूक्ष्मा निर्विकल्प स्वरूपिणी ।।'२
तत्त्व की दृष्टि से 'सूक्ष्मा' का सम्बन्ध शिवतत्त्व से है—'तत्र शिवतत्त्वे
सूक्ष्माभिधानावाग्वृत्तिः ।।' इसी वाक्तत्त्व में शान्त्यतीत भुवनों का अवस्थान भी है ।
'विकल्पबोधायाणूनां तत्त्वानां स्थितये कलाः ।
पञ्च तत्त्वानि लोकांश्च मन्त्रा दीन सृजिक्षिवः ।
शान्त्यतीता पुराधारं शिवतत्त्वं पुराभवत् ।।'
'परावाक्' या 'सूक्ष्मा शब्दवृत्ति' शिवात्मक है—'अस्य शिवाधिष्ठितत्वेन
शिवतत्त्वव्यपदेशः ।।'३ 'तत्र शिवतत्त्वे सूक्ष्माभिधाना वाग्वृत्तिः । अत्रैव
शान्त्यतीतभुवनाना वस्थितिः ।'४
'परावाक्'—सभी शास्त्रों को अपने में निहित रखता है । इसमें बीजात्मना
(Germinally) सभी शास्त्र निहित रहते हैं । यही परावाक् धीरे-धीरे भौतिक स्तरों
में उतरता हुआ अक्षरों के रूप में (Syllables, vocables) वर्णमाला का सृजन
करता है । इस स्तर पर चैतन्य के दो स्तर परस्पर अभिन्न है तथा शब्द एवं अर्थ
एक दूसरे से अपृथक हैं । परा की उत्तरावस्था में (परवर्ती स्थितियों में) शब्द एवं
उसके अर्थ परस्पर भिन्न हो जाते हैं और वैखरी की अवस्था में तो विभिन्न
उच्चारणावयवों के माध्यम से पृथक् शब्द पृथक् अर्थों के साथ उच्चरित होने लगते
हैं । 'परावाक्' समस्त शास्त्रों का उद्गम या स्रोत है । ये शास्त्र सर्वोच्च सत्ता
(Supreme being) के पाँचों मुखों से, जो उसकी पाँच शक्तियों (चित, आनन्द,
इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया) के प्रतीक हैं, निःसृत होते हैं । पञ्चविध शैव शासनाम्नाय
शिव के पञ्चमुखों से प्रकट होता है और तन्त्र के ९२ सम्प्रदायों का प्रवर्तन करता
है जो कि निम्न ३ भागों में वर्गीकृत हैं—(१) शिव तन्त्र = द्वैतपरक : १० (२)
रुद्रतन्त्र = द्वैताद्वैतवादी : १८ (३) भैरव तन्त्र = अद्वैतवादी : ६४ ।।
'परावाक्' विश्व-सृष्टि का मूलाधार है—वामकेश्वर तन्त्र में
(नित्याषोडशिकार्णव) में कहा गया है कि 'परमाशक्ति' (त्रिपुरा या परावाक्) जब
१. शैवपरिभाषा २. पौ०बिन्दु०प०
३-४. शैवपरिभाषा

४२ वरिवस्यारहस्ये
स्वनिष्ठ स्फुरत्ता का साक्षात्कार करती है तभी विश्व का उदय होता है—'यथा सा
परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥'
परमाशक्ति के ईक्षण-व्यापार में इच्छा के साथ ही साथ ज्ञान एवं क्रिया भी
सूक्ष्मात्मना विद्यमान रहते हैं । भास्करराय मखिन् ने 'सेतुबंध' में कहा है कि
'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' इस वाक्य में 'बहुस्यां' के ईक्षण के आकारित होने के
पूर्व (उठी हुई प्राथमिकी वृत्ति) इच्छा एवं ज्ञान दोनों शक्तियों से युक्त थी । इतना
ही नहीं 'स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया च' आदि श्रुति-वाक्यों से यह भी प्रमाणित है
कि उक्त प्राथमिक इच्छा-ज्ञान शक्ति के साथ क्रियाशक्ति भी समवेत थी ।
पद्मपादाचार्य प्रपञ्चसार तन्त्र की टीका में परावाक् की व्याख्या करते हुए
कहते हैं कि—मूलाधार से उत्पन्न चैतन्याभास और माया शक्त्यात्मक भाव परावाक्
है—'तस्मात् प्रथममुदितः चैतन्याभासः भावश्च यः जगद्भावयतीति माया शक्तिर्भावः स
पराख्यः ॥' 'चैतन्याभासविशिष्टतया प्रकाशिका माया निष्पन्दा परावागित्यर्थः ॥'
'मूलाधार' में मूल का अर्थ है जगत् की मूलभूतात्मिका परिणामिनी माया शक्ति एवं
उसका अधिष्ठानभूत चिदात्मा । शरीरगत मूलाधार भी चिदात्मा की अभिव्यक्ति का
स्थान है । इसी स्थान से उत्पन्न मायाशक्त्यात्मक चैतन्याभास एवं निष्पन्दा वाक्
को 'परा' आख्या दी गई है । शङ्कराचार्य ने मूलाधार से प्रथमोदित वाक् को 'परा'
कहा है—'मूलाधारात् प्रथममुदितो यश्च भावः पराख्यः ॥'१ शङ्कराचार्य की व्याख्या
के अनुसार 'परावाक्' मूलाधारोत्पन्न प्राथमिक 'भाव' है ।
परावाक् की 'परा' संज्ञा इसलिए है क्योंकि यह 'पूर्ण' है—'पूर्णत्वात् परा ॥'२
परावाक् वाणी की पराकाष्ठा है—यही शब्दब्रह्म है । इसे 'वाक्' इसलिए कहा गया
है क्योंकि यह प्रत्यवमर्श द्वारा कथन करती है—'वक्ति' विश्वं अपलपति प्रत्यवमर्शेन
इति च वाक् ॥'
'परावाक्', चिदात्मक, स्वात्मविश्रान्त 'अहं' के रूप में नित्योदित परमात्मा की
स्वातंत्र्यशक्ति के रूप में अवस्थित है तथा सदा निरपेक्ष रूप से रहती है ।
संसार का साररूप एवं मालिनी शक्ति 'परावाक्' है । यही समस्त मन्त्रों की
जननी है । यही तुरीय पद 'अव्यक्त' भी कहा गया है । 'परावाक्' में
इच्छा-ज्ञान-क्रिया समष्टि रूप से अवस्थित रहती है । इसे 'कारणबिन्दु' भी कहा
गया है क्योंकि यह जगदाङ्कुर के लिए कन्दस्वरूपा है । शब्दब्रह्मरूपात्मिका का यह
परावाक् आत्मप्रतिष्ठ होने के कारण निःस्पन्द है ।
अपने मूल स्वरूप में परावाक् चित्शक्ति का ही अपर पर्याय है । 'अथवा
चिच्छक्तिरेव पराख्या चैतन्याभास विशिष्टतया प्रकाशिका माया निष्पन्दा परा-
वगित्यर्थः ॥'३ चैतन्याभासविशिष्ट होने के फलस्वरूप प्रकाशिका माया ही स्पन्दहीन
'परावाक्' है ।
१. प्रपञ्चसार तन्त्र २. ई०प्र० विमर्शिनी
३. पदार्थदर्श

प्रथमोऽंशः ४३
शाक्ताद्वैत, ईश्वराद्वयवाद मे तो 'माया' 'प्रकृति' आदि 'परावाक्' से
निम्नस्तरीय तत्त्व माने गये हैं । 'महामाया' को द्वैतवादी तन्त्र में शिव की
परिग्रहरूपा बिन्दु शक्ति या 'परावाक्' स्वीकार किया गया है ।
लक्ष्मीधर की दृष्टि में 'परा' सतोगुणरजोगुण एवं तमोगुण की साम्यावस्था का
अभिधान है । 'एका परेति सत्वरजस्तमोगुण साम्यरूपा ।।'१
'परावाक्'—'प्रकृति' एवं 'प्रतिभा'—आचार्य लक्ष्मीधर ने सौन्दर्यलहरी की
अपनी टीका में परावाक् से प्रकृति का सम्बन्ध बताते हुए उसे प्रकृतिरूपात्मक
स्वीकार किया है । प्रकृति में निहित गुणत्रय 'ज्ञान', 'इच्छा', एवं 'क्रिया' के ही
प्रतीक हैं । ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकार का कथन है कि 'पशुपति' की अवस्था में जो
'ज्ञान' 'क्रिया' एवं 'माया' शक्ति है वही 'पशु' दशा में 'सत्व' 'रज' एवं 'तम'
है—'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या । मायातृतीये ते एव पशोः सत्वं
रजस्तमः ॥२ इच्छा आदि शक्तियाँ ही सङ्कुचित होकर सत्व-रज-तम (गुणमय) का
रूप धारण करती हैं ।
सांख्य, वैशेषिक, न्याय, मीमांसा आदि में निरूपित प्रकृति का स्वरूप अशुद्ध
प्रकृति का स्वरूप है जबकि तन्त्रोक्त प्रकृति शुद्धा प्रकृति है और इसमें इच्छा, ज्ञान
एवं क्रिया शक्ति तत्त्व के रूप में विद्यमान है—'इच्छादित्रिसमष्टिः शक्तिः शान्तास्य
सङ्कुचद्रूपा । सङ्कलितेच्छाद्यात्मक सत्त्वादिकसाम्य रूपिणी सती । बुद्ध्यादिसामरस्य-
स्वरूप चित्तात्मिका मता प्रकृतिः ॥'३ 'मूल प्रकृति' परावाक् है । इसी से
विश्ववैचित्र्य का आविर्भाव होता है । आचार्य व्यास ने 'गुणानांपरमं रूपं न
दृष्टिपथमृच्छति । यत्

४४ वरिवस्यारहस्ये
परा ।।'१ यही स्वरसोदित परावाक् समस्त वर्णसमुदाय, नादसमुदाय, प्रमेय समुदाय
समग्र जगत् एवं मन्त्रसमुदाय का मूल स्रोत है ।
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है—'चित्प्रकाश से अभिन्न, नित्य उदित,
महामन्त्ररूप, पूर्ण अहं विमर्शात्मक जो यह 'परावाक् शक्ति' है, जिसके गर्भ में
'अ' से 'क्ष' पर्यन्त (वर्णात्मक) समग्र शक्तिचक्र विद्यमान रहता है, वही पश्यन्ती
और मध्यमा के क्रम से ग्राहकभूमिका को आभासित करती है ।' प्रत्यवमर्शात्मक,
अमायीय वर्णजनित, अन्तर शब्दन्स्वभाव चिति को नित्योदित 'परावाक्' कहते हैं ।
यही 'परावाक्' परमात्मा की शक्ति एवं मुख्य ऐश्वर्य है । पूर्ण होने के कारण इसे
'परा' तथा प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाप करने से इसे 'वाक्' कहते हैं ।
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ।।२
'पूर्णत्वात् परा वक्ति विश्वं अभिलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक् ।।'३
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' के प्रणेता क्षेमराज का कथन है कि चित्प्रकाश से अव्यतिरिक्त,
नित्योदित, महामन्त्ररूप, पूर्णांहंविमर्शमयी वाक् ही 'परावाक् शक्ति' (चित्प्रकाशात्
अव्यतिरिक्ता नित्योदितमहामन्त्ररूपा पूर्णांहंविमर्शमयी या इयं परावाक् शक्तिः ॥) विभु
की माया शक्ति द्वारा भिन्न-भिन्न बाह्य और आभ्यन्तर वस्तुसमूह का विश्रान्तिस्थान,
वही प्रत्यवमर्शात्मक परावाक् रूप चिति, ज्ञान, सङ्कल्प, अध्यवसाय, स्मृति और
संशय के नाम से कही गई है—
'माया शक्ता विभोः सैव भिन्न संवेद्यगोचरा ।
कथिता ज्ञानसङ्कल्पाध्यवसायादिनामभिः ।।'
इस धरातल पर वाच्य एवं वाचक शब्दों का अस्तित्व नहीं रहता । इस भूमि
में वाच्य अर्थ की भी सत्ता नहीं रहती । यहाँ अतीत, अनागत एवं वर्तमान का
भेद नहीं रहता । यहाँ पर भेद अपनी आत्मा से अभिन्न या आत्मरूप होकर
भासमान होता है ।
महाज्ञान सर्वप्रथम 'अहंज्ञान' का रूप धारण करके परमशिव के अन्तर में
स्फुरित होता है । इस अवस्था में वाच्य-वाचक भाव एवं शब्द-अर्थ का पृथकत्व
विद्यमान नहीं रहता । वाच्य 'इदं' रूप में भासमान नहीं होता ।
'नाद' एवं परापश्यन्ती आदि वाक्चतुष्टय—आचार्य भास्करराय ने 'मातृका'
'पश्यन्ती' 'मध्यमा' की व्याख्या इस प्रकार की है—
(१) 'मातृका'—'माति तरति कायतीति च व्युत्पत्या मातृकेत्युच्यते । तस्यां
च निर्विकारायामप्यनादि सिद्धप्राण्यदृष्टवशात् स्वान्तःसंहतं विश्वसिसृक्षोत्पद्यते ।।' ततः
स्रष्टव्यपदार्थनालोचयति 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय ।।' इति ।।४
१. भर्तृहरि—'स्वोपज्ञ' (ब्रह्मकाण्ड) । २. ई०प्र०का०
३. ई०प्र० विमर्शिनी ४. वरिवस्यारहस्यम्