वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ वरिवस्यारहस्ये
हृदि । कण्ठे स्यात् षोड्शदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे
महापथे ॥'
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में ९ चक्रों का उल्लेख किया गया है जो निम्न हैं—
(१) (आधार में) ब्रह्मचक्र (२) स्वाधिष्ठान (३) नाभिचक्र (४) हृदयाधार (अष्टदल)
(५) कण्ठ चक्र (६) तालु चक्र (७) भ्रूचक्र (८) ब्रह्मरन्ध्र : निर्वाणचक्र (९)
आकाश चक्र । आज्ञाचक्र के ऊपर अन्य चक्र निम्न हैं—(१) बिन्दु, (२)
अर्धचन्द्र, (३) रोधिनी, (४) नाद, (५) नादान्त, (६) शक्ति, (७) व्यापिनी, (८)
समना, (९) उन्मना ।
बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादनादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥ (वरिवस्यारहस्यम्)
(३) 'चक्रमयी'—'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी
स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ।' (यो०हृ०) परमाशक्ति का परिणमन ही
चक्र है । ये चक्र निम्नांकित हैं—(क) श्रीचक्र । (ख) (१) मूलाधार (२)
स्वाधिष्ठान (३) मणिपूरक (४) अनाहत (५) विशुद्धाख्य (६) आज्ञा (७) बिन्दु
(८) अर्द्धचन्द्र (९) रोधिनी (१०) नाद (११) नादान्त (१२) शक्ति (१३)
व्यापिनी (१४) समना (१५) उन्मनी ।
'गोरक्षशतक' में इन चक्रों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है—
'चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षड्शदलम् ।
नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्या दलं हृदि ॥
कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ।
सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे ॥'
'सिद्धसिद्धान्त पद्धति' में ९ चक्रों का उल्लेख किया है जो निम्न हैं—(१)
आधार में ब्रह्मचक्रं (२) स्वाधिष्ठान (३) नाभिचक्र (४) हृदयाधार (५) कण्ठचक्र
(६) तालुचक्र (७) भ्रूचक्र (८) ब्रह्मरन्ध्रः निर्वाणचक्र (९) आकाशचक्र ।
आगमानुसार 'आज्ञाचक्र' के ऊपर अन्य चक्र निम्न हैं—'बिन्दु', 'अर्द्धचन्द्र',
'रोधिनी', 'नाद', 'नादान्त', 'शक्ति', 'व्यापिनी', 'समना', 'उन्मना' ।
'बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नादं नादान्त शक्तयः ।
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादशसंहतिः ॥'२
'सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद' में निम्न नौ चक्रों का उल्लेख किया गया है—
(१) 'आधार चक्र'—मूलाधार में त्रिरावृत्तभङ्गया वह्निमण्डलाकार ब्रह्मचक्र है ।
यहीं मूलकन्द में पावकाकार शक्ति का ध्यान करना चाहिए । यहीं मूलाधार में
सर्वकामप्रद कामरूपपीठ स्थित है । यही है आधार चक्र का स्वरूप ।
१. गोरक्षनाथ—'योगशतक' २. 'वरिवस्यारहस्यम्'