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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 530 में से

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पृष्ठ 160

५८ वरिवस्यारहस्ये
यह सूक्ष्मजिह्वा स्थानीय है ।१ 'स्वच्छन्दतन्त्र' के ही अनुसार मूलाधार में ही
षड्दलात्मक 'कुलपद्म' भी है जो कि चतुर्दलात्मक मूलाधार चक्र से भिन्न है ।
उसके नीचे स्थित है—'अष्टदलसहस्र अकुल' । यह कुलपद्म से भिन्न है । 'अकुल'
कहने से 'कुलपद्म' एवं 'अकुल' दोनों का ग्रहण किया जाता है अतः दोनों के
व्यावर्तन हेतु अकुल को 'विषु' भी कहा जाता है ।२
षट्चक्रों का पूर्ण विवरण अगले पृष्ठ पर तालिका में इस प्रकार है—
सृष्टि और चक्र—'सहस्रार' बिन्दु होता है । इसी कारण वह 'बैन्दव गृह'
है । उस बिन्दु से ही कारण सहित यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है । उस 'बिन्दु'
से ही 'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' के दस दलों की उत्पत्ति होती है । सहस्रार से
उत्पन्न होकर यही बिन्दु दस रूपों में रूपान्तरित हो जाता है—
'सहस्रारं बिन्दुर्भवति च ततो बैन्दवगृहं ।
तदेतस्माज्जातं जगदिदमशेषं स करणम् ।।
ततो मूलाधाराद्वितयमभवत्तद्दशदलं ।
सहस्राराज्जातं तदिति दशधाबिन्दुरभवत् ।।'३
इसी दशधा विभक्त 'बिन्दु' से मणिपूर के १०, अनाहत के १२, विशुद्धाख्य
के १६ एवं आज्ञा के २ दल निर्मित होते हैं । कौलमार्गी यह मानते हैं कि
'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' ही कारणस्थान हैं अतः वे इन्हीं में ही भगवती की
उपासना भी करते हैं ।४
'सृष्टिस्तु कुण्डली ख्याता' स्वीकार करके ऋषियों ने सृष्टि का उपादान एवं
उपादान कारण कुण्डली शक्ति को माना है । 'बिन्दु' ही सृष्टि का मूल केन्द्र है ।
शक्ति अपने निर्गुण स्वरूप में बिन्दुरूपा है । कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार में परमशिव
से मिलकर बिन्दुरूपा हो जाती है । उन्मनी अवस्था में यह बिन्दुस्वरूपा है ।
कुण्डलिनी शक्ति सहस्रार में 'बिन्दु' रूप में निवास करती है । इसी कारण सहस्रार
को 'बैन्दव गृह' कहते हैं । शक्ति का यह रूप ही 'परम बिन्दु' या 'कारणबिन्दु'
है । समस्त प्रपञ्च का कारण होने के कारण ही इसे 'कारण बिन्दु' कहते हैं । यह
अवस्था चने की भाँति है । इसमें दो दालें एकरूप होकर रहती हैं । ये दो दालें
शिव एवं शक्ति एवं चना 'कारण बिन्दु' सदृश है ।
बीज से वृक्षोत्पत्ति की प्रक्रिया—(१) बीज फूलना, (२) दो दालों का
पृथक्-पृथक् होना फिर (३) अङ्कुर फूटना, (४) वृक्ष ।
निष्क्रिय ब्रह्म की सिसृक्षा—अहं का स्फुरण (बीज के फूलने के सदृश
अवस्था) = 'कारणबिन्दु'—अहं एवं इदं का उदय (शिव शक्ति का उदय)—
नाद-बिन्दु की उत्पत्ति । शिव-शक्ति = श्वेत + रक्त बिन्दु या कार्य बिन्दु + बीज ।

१-२. सेतुबन्ध ३. सुभगोदय स्तुति (गौड़पादाचार्य)
४. सुभगोदय स्तुति (श्लोक ४८)