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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 530 में से

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पृष्ठ 165

प्रथमोऽंशः ६३
स्थूल शरीर और
उसके
पञ्चकोश
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आनन्दमय कोश
माध्यमिक मत— 'धर्मकाया', रूपकाया, निर्माणकाया, संभोगकाया ।
'धर्मकाया' ही वास्तविक काया है और समस्त काया-समूह की जननी है ।
महायान—(१) रूपकाया (निर्माणकाया) (स्थूल एवं सूक्ष्म) (२) धर्मकाया ।
'निर्माणकाया' 'संभोगकाया' 'धर्मकाया' एवं 'सहजकाया'—मुख्यतः ये ही काया की
चार कोटियाँ हैं ।
'धर्मकाया'—द्वितीय काया है और प्रकाशमय है । सुषुप्ति के क्षय से
नित्यानित्य भेदों से रहित, मैत्री से पूर्ण, चित्त की निर्विकल्पावस्था को ही धर्मकाया
या चित्तवज्र कहते हैं । यह तर्कातीतावस्था है । प्रज्ञोपाय-ऐक्य के कारण इसे
'धर्मात्मा योग' भी कहा गया है । यह सुषुप्ति से उच्चतर स्थिति है । असङ्ग ने
'धर्मकाया' को पारमार्थिक एवं अज्ञेय माना है । भगवान् बुद्ध 'संभोगकाया' धारण
करके भक्तों को आन्तरिक उपदेश देते हैं । इसी काया से बुद्ध ने महायान का
उपदेश दिया ।
'संभोग काया' तृतीय काया है । इसी काया में स्थित होकर बुद्ध ने
गृद्धकूट पर्वत पर 'मन्त्रयान' का उपदेश दिया था । इसे ही 'वाग्वज्र' भी कहा
गया है । यही मन्त्रयोग एवं तन्त्रोपदेश की (बुद्ध द्वारा गृहीत) काया है । यहाँ
प्रज्ञोपाय की एकता है समस्त संस्कारों, तर्कों, इच्छाओं, तृष्णाओं के शान्त या
नष्ट हो जाने पर ही यह काया प्राप्त होती है । बीज मन्त्रों का जन्म भी इसी
काया में होता है ।