वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'परा' क्या है?—'परा' नाम सान्तरोहरूपा ।' 'अन्तरे अन्तःकरणे ऊहेन
तर्केण सहितं रूपं यस्याः सा सान्तरोहरूपा ।' 'कामकला विलास' में भी इसीलिए
कहा गया है—'या सान्तरोहरूपा परा महेशी परा नाम ।।'
'पश्यन्ती' क्या है?—'स्पष्टा पश्यन्त्याख्या त्रिमातृका चक्रतां याता ।।'
'त्रिमातृका त्रिखण्डयुक्ता मातृका पञ्चदशाक्षरी, तदात्मिका । सा च चक्रतां चक्रत्वं.
याता । त्रिखण्डात्मक चक्रैक्यं त्रिखण्डात्मकमातृकाया इति रहस्यम् । 'स्पष्टा'
युक्तावस्थायां अतिसूक्ष्मतया प्रतीता ।।२
'मध्यमा' क्या है?—'मध्यमा नाम परापश्यन्त्योः उच्चानुच्चावस्थात्मिका ।'
इसके दो रूप हैं—(१) वामादि व्यष्टिरूपा (२) वामादि समष्टिरूपा । वामादि
शक्तियाँ निम्न हैं—(१) वामा (२) ज्येष्ठा (३) रौद्री (४) अम्बिका । ये चारों
शक्तियाँ श्रीचक्र के अन्तर्गत अधोमुख हैं और चतुर्योन्यात्मक हैं । (१) इच्छा (२)
ज्ञान (३) क्रिया (४) शान्ता (५) परा—ये ५ शक्तियाँ श्रीचक्र के अन्तर्गत
ऊर्ध्वमुख एवं शक्तियोन्यात्मक हैं । इसीलिए कहा गया है—'एका परात्तदन्या
वामादिव्यष्टि मातृसृष्ट्यात्मा । तेन नवात्मा माता जाता सा मध्यमाऽभिधानाभ्याम् ।
द्विविधा हि मध्यमा सा सूक्ष्मा स्थूलाकृतिः स्थिरा सूक्ष्मा । नवनादमयी स्थूला
नववर्गात्मा तु भूतलिपियाख्या ।'२
'परा' क्या है?—'एक परेति सत्त्वरजस्तमोगुणसाम्यरूपा ।' 'पश्यन्ती' क्या
है?—'पश्यन्ती अन्यतरगुण वैषम्यरूपा ।' 'मध्यमा' क्या है?—'मध्यमा वामादि-
व्यष्टिरूपा स्थूलात्मिका ।'३
'मध्यमा'—सूक्ष्मा स्थूला : नव नादमयी, नववर्गात्मा, भूतलिपव्याख्या । (नव
नाद = अ, क, च, ट, त, प, य, श, क्ष ।)
(१) 'आद्या सूक्ष्मरूपा मध्यमा'—स्थूलरूपा (नव वर्गात्मिका) मध्यमा ।४
'पश्यन्ती' के ३ रूप हैं—(१) 'पश्यन्ती' (२) 'महापश्यन्ती' (३) 'परम
महापश्यन्ती ।'५ आचार्य सोमानन्द—'पश्यन्ती' को 'ज्ञानशक्ति' कहते हैं ।
सृष्टि—'अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमय्यापि च सृष्टिः ।।' आचार्य
भास्करराय जिसे 'सृष्टि' कहते हैं उसका स्वरूप क्या है? (१) स्पन्दकारिकाकार का
मत—जगत् की सृष्टि नहीं होती प्रत्युत् प्रकटीकरण होता है क्योंकि प्रलय में जगत्
का ध्वंस होने पर भी मूलतः उसका ध्वंस नहीं होता क्योंकि उस स्थिति में जगत्
शक्ति में उपसंहृत होकर स्थित हो जाता है किन्तु सांसारिक प्राणी उसे प्रलय
महाध्वंस या विनाश कहने लग जाते हैं । 'जगत' का 'उदय' और अस्त होता है ।
इसे ही स्पन्दकारिका में—'उन्मेष' एवं 'निमेष' कहा गया है—'यस्योन्मेष निमेषाभ्यां
जगत्ः प्रलयो दयौ । तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ।।६
१-४. लक्ष्मीधरा ५. ई०प्र०वि० (अभिनवगुप्त)
६. स्पन्दकारिका