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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः ४७
(‘अम्बिका रूपमापन्ना’) जिस स्वरूप में प्रकट होती हैं उसे ‘परावाक्’ कहते हैं—
‘सा परमा सर्ववर्णांशभूतविमर्शरूपा, कला विमर्शशक्ति, आत्मनः परशिवस्य, स्फुरणं
पश्यन्त्यादि क्रमेण वैखरीपर्यन्तं विमर्शनम्, पश्येद्, द्रष्टुमिच्छेत् तदा परमा
शान्तात्मिका भूत्वा अम्बिका रूपमापन्ना प्रकाशांशमात्राया अम्बिकायाः सामरस्यमापन्ना
‘परावाक्’ समुदीरिता ।।' यही परावाक् ‘परामातृका’ भी कही जाती है ।१
वाक् तत्व के - चारों रूपों का परमात्मा की संविदात्मक आत्म शक्तियों के
साथ सम्बन्ध है, यथा—
इच्छाशक्ति—पश्यन्ती वाक् = इच्छाशक्ति + वामाशक्ति—पश्यन्ती
ज्ञानशक्ति—मध्यमा वाक् = ज्ञानशक्ति + ज्येष्ठाशक्ति—मध्यमा
क्रियाशक्ति—वैखरी वाक् = क्रियाशक्ति + रौद्रीशक्ति—वैखरी२
शक्तिचक्र के चार प्रकार हैं—(१) खेचरी (२) गोचरी (३) दिक्चरी (४)
भूचरी । इन्हें ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी भी कहते हैं । इन्हीं में
आनन्द, इच्छा, ज्ञान, एवं क्रिया भी निवास करती है । ये समस्त शक्तियाँ
आत्मसंवित से अभिन्न हैं ।३ इन समस्त शक्तियों के मूलकारण स्पन्दरूप भगवान्
ही है ।४
'शारदातिलक' में शब्दब्रह्ममयी कुण्डलिनी से 'शक्ति' के आविर्भाव का
उल्लेख हैं । यह क्रम इस प्रकार है—कुण्डलिनी—शक्ति—ध्वनि—नाद—निरोधिका
—अर्द्धेन्दु । बिन्दु—परा—पश्यन्ती—मध्यमा—वैखरी ।।
सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ।
शक्ति ततो ध्वनिस्तस्मान्नादस्तस्मान्निरोधिका ।।
ततोऽर्द्धेन्दुस्ततो बिन्दुस्तस्मादासीत् परा ततः ।
पश्यन्ती मध्यमा वाचि वैखरी शब्द जन्मभूः ।।
इच्छाज्ञान क्रियात्मासौ तेजोरूपा गुणात्मिका ।
क्रमेणानेन सृजति कुण्डली वर्णमालिकाम् ।।५
'मातृका' के चार रूप हैं—
मातृका
↓
┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐
परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी
'अनेन मातृकायाः परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी इति चत्वारिरूपाणि ।।'६
१. 'परामातृकोच्यते' (दीपिका) २. योगिनीहृदय, सेतुबन्ध, दीपिका
३-४. स्पन्दप्रदीपिका ५. शारदातिलक (त०प्र० पटल)
६. लक्ष्मीधरा