सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

प्रथमोऽंशः ४९
(२) ‘सृष्टि’ ईक्षणमात्र है—‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय ।’
(३) योगिनीहृदय का मत—‘सृष्टि’ शक्ति द्वारा स्फुरत्ता का दर्शन है ।१
‘शब्दमयी’—शब्द का वाक् तत्त्व से सम्बन्ध है । वाक् क्या है?
वाक् तत्त्व—समस्त सृष्टि वाक्तत्त्वात्मक या शब्दमयी है । जगत् ‘शब्द’ या
वाक्तत्त्व का परिणाम है ‘अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदुच्यते । विवर्ततेऽर्थभावेन
प्रक्रिया जगतो यतः ।।’२
(१) समस्त शक्तियाँ वाक्तत्त्वात्मक या वर्णात्मक है—स्पन्दप्रदीपिकाकार ने
कहा है—‘समस्त शक्तियाँ वर्णात्मक हैं ।’
(२) वाक् तत्त्व ‘पशुपति’ को ‘पशु’ भी बना देता है—कल्लट इस सिद्धान्त
की पुष्टि करते हुए कहते हैं—
‘शब्द राशि समुत्थस्य शक्ति वर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्त विभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ।।'
स्पन्द प्रदीपिकाकार उत्पल ने ठीक ही कहा है कि पुरुष जिन शक्तियों का
स्वामी है उन्हीं का भोग्य बनकर (पुरुष के स्थान पर) ‘पशु’ बन जाता है । कादि
रूप या ब्रह्मादि शक्तिरूप चक्र की कलाओं से (ककारादि अक्षरों के श्रवण और
उच्चारण द्वारा) पुरुष अपने वैभव एवं अपनी महाव्याप्ति खोकर स्वभावच्युत हो
जाता है और फलतः पशु बन जाता है ।
(३) समस्त ज्ञान शब्दानुविद्ध हुआ करते हैं—आचार्य भट्टकल्लट इस
सिद्धान्त की पुष्टि करते हुए ‘स्पन्दकारिका’ में कहते हैं—
‘यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ।।'
(४) शब्द शक्तियाँ पर तत्त्व के स्वरूप की आच्छादिका हैं—आचार्य
भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिका’ में कहा है—‘स्वस्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोद्यता’
अर्थात् पुरुष के स्वस्वरूप को आच्छादित करने के लिए ये शब्दरूप शक्तियाँ
सर्वदा उद्यत रहती हैं अर्थात् क्रियाशक्ति के द्वारा ये पुरुष रूप को सदैव ढकना
चाहती हैं ।
(५) बिना वर्णानुगम (शब्दानुवेध) के किसी ज्ञानसंवेदनरूप प्रत्यय का उदय
ही नहीं होता—‘यतः शब्दानुवेधेनं न बिना प्रत्ययोद्भवः ।।' (स्पन्दकारिका)
‘वाक्यपदीय’ में ठीक ही कहा गया है कि ‘ऐसा कोई प्रत्यय नहीं होता
जिसमें शब्द का अनुगम न हो । सभी ज्ञान शब्द से अनुविद्ध देखे जाते हैं ।’
(६) समस्त विश्व-व्यवहार का आधार भी वाक् तत्त्व ही है—
१. ‘यदा सा परमा शक्तिः.......स्फुरन्तात्मनः पश्येतदा चक्रस्य संभवः'
२. ‘वाक्यपदीय’
४ वरि.