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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 530 में से

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पृष्ठ 152

५० वरिवस्यारहस्ये
स्पन्दप्रदीपिकाकार उत्पलदेव ने कहा है कि समस्त विश्व-व्यवहार का कारण वाक्
तत्त्व ही है ।
(७) चित् तत्त्व की उन्मुखता में बाधक तत्त्व के रूप में भी वाक् तत्त्व ही
है । स्पन्दप्रदीपिका में कहा गया है कि वाक् शक्ति ही प्रत्यवमर्शिनी शक्ति भी है
और साथ ही वही चित् शक्ति की उन्मुखता में बाधक भी है ।
वाक् तत्त्व—अपनी मूल प्रकृति में चितिशक्ति मात्र है । शास्त्रों में इसके चार
प्रकार बताये गये हैं—
'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानिविदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ॥'
'बिन्दु' की शब्दात्मिका वृत्ति चतुष्टयात्मिका है जो निम्न है—(१) वैखरी (२)
मध्यमा (३) पश्यन्ती (४) परा । बिन्दुरूपी रत्नाकर में उठती हुई तरङ्गें बाह्यात्मना
'नाद' एवं 'ज्योति' के रूप में उदित होती है । 'नाद' वाक् के रूप में एवं ज्योति
अर्थ के रूप में प्रकट होती है । वाक् एवं अर्थ परस्पर 'वागर्थाविव संपृक्तौ' परस्पर
संश्लिष्ट रहते हैं । इनमें प्रत्येक अवस्थात्रयात्मक होता है—(१) परम (२) सूक्ष्म
एवं (३) स्थूल । इसे ही अवरोह क्रम कहते हैं । इस प्रकार बिन्दु से वाक् की
यात्रा में निम्न पड़ाव आते हैं—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा एवं (४)
वैखरी ॥
वाक् तत्त्व का मूल स्वरूप—वाक् तत्त्व अपने मूल में चिति शक्ति है और
इस प्रकार वाक् तत्त्व चितिशक्ति का ही रूपान्तरण है । 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा
गया है कि संविद् ही प्राणों के द्वारा वाग् रूप धारण करती है । वही वैखरी,
मध्यमा, पश्यन्ती एवं परा है । संविद् के आरोहण से ही परा, पश्यन्ती आदि
वाणियों का उदय होता है । संविद् सर्वमय है और वाक् का मूल संविद् है ।
वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने वाक् तत्व को 'शब्द' के रूप में ग्रहण करके शब्द
को ब्रह्मस्वरूप स्वीकार किया है—
'अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥'
उन्होंने जगत् को शब्द का विवर्त मानकर समस्त स्थूल-सूक्ष्म जगत्, जागतिक
प्रपञ्च एवं उसके मूलभूत उपादानों को शब्द की परिणति स्वीकार किया है और
इस प्रकार वास्तविक सत्ता शब्द या वाक् तत्त्व को स्वीकार करते हुए जगत् को
उसकी प्रतिच्छाया, विवर्त, या परिणाम मानते हुए शब्द तत्व (वाक् तत्त्व) को ही
विश्व का मूल स्वीकार किया है । इस प्रकार वैयाकरणों की दृष्टि में जगत् का मूल
शब्द है, जगत् की स्थिति शब्द में है और अन्ततः जगत् का लय भी शब्द में ही
होगा । 'शब्द' ही निगुर्ण-सगुण, मूर्त-अमूर्त, स्थूल-सूक्ष्म, भौतिक-अभौतिक,
ऐन्द्रिय-इन्द्रियातीत, प्रकृत्यात्मक-प्रकृत्यातीत, आत्मिक-अनात्मिक, द्रष्टा-दृश्य-दर्शन
आदि सभी में अनुस्यूत है और सभी का मूलाधिष्ठान है ।