वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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६० वरिवस्यारहस्ये
| ६. आज्ञाचक्र | भ्रुवद्वय के मध्य | उड्डीयान पीठ | ०२ | हं, क्षं | मन | — | — | ओं | शाम्भु | हाकिनी शक्ति/इतरलिङ्ग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ७. सहस्रार (शून्यचक्र) | महानाद के ऊपर, शंखिनी नाड़ी के ऊपर विसर्ग नामक शक्ति के नीचे पूर्णचन्द्र के समान शुभ्र सहस्रदल युक्त निम्नाभिमुख । सहस्रदल की कर्णिका में परमामृत समूह से स्निग्ध चन्द्र मण्डल है । उसके भीतर त्रिकोण है । उसके भीतर बिन्दु रूप शून्य है । यहीं स्थित हैं शून्याकार एवं सर्वात्मा परमशिव । | — | १००० | समस्त स्वर एवं समस्त व्यञ्जन | तत्त्वातीत/गुणातीत | श्वेतवर्ण | — | — | परमशिव परमहंस | — |