वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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जाता है और इसीलिए कहा गया है कि—'यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे' मानव शरीर
'ब्रह्मपुर' कहा गया है—ब्रह्म का नगर कहा गया है । ईश्वर स्वयमेव प्रपञ्च में
'जीव' बनकर प्रवेश करता है । 'तत्त्वमसि' इसी सत्य का साक्षी है । मानव शरीर
पञ्चकोशात्मक है । पञ्चकोश निम्नांकित हैं—(१) 'अन्नमय', (२) 'प्राणामय', (३)
'मनोमय', (४) 'विज्ञानमय', (५) 'आनन्दमय' ।
थियोसॉफी के अनुसार—(१) 'अन्नमय एवं प्राणमय कोश' = 'भौतिक
शरीर' । (अन्नमय = 'प्राणमय' = Dense/ethenic (२) 'मनोमय कोश' =
Astral and lower 'mental body' (काम शरीर) (३) 'विज्ञानमय कोश' =
उच्चस्तरीय मानसिक शरीर या 'कारणशरीर' (४) 'आनन्दमयकोश' = 'आत्मिक
शरीर' । (Ātmic body)
(१) पुराणों एवं षड्दर्शनों में ३ प्रकार के शरीर कहे गए हैं—(१)
'स्थूलशरीर' (षाट्कौशिक शरीर) (२) 'सूक्ष्म शरीर' (३) 'कारण शरीर' । (Gross
or Phenomenal body, Astral body, casual body)
(१) 'स्थूलशरीर' = पञ्चकोशात्मक, धातुमय, अन्न-रस, रक्त, मांस, मेद,
शुक्र से निर्मित जड़ एवं पांचभौतिक मांसल शरीर ।
(२) 'सूक्ष्मशरीर' = स्थूलशरीर से सूक्ष्मतर शरीर । ५ ज्ञानेन्द्रियों, ५
कर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, ५ प्राण से समन्वितशरीर ।
(३) 'कारणशरीर' = अज्ञान की उपाधि जो सुषुप्ति में भी वर्तमान रहती है
वह 'कारणशरीर' कहलाती है । मुक्ति के पूर्व इससे मुक्ति संभव नहीं । मोक्ष में ५
कोश भी नहीं रहते । सांख्य मत के अनुसार सूक्ष्म शरीर या लिङ्ग शरीर का जो
स्वरूप है वह अन्य शास्त्रों से भिन्न है ।
'सांख्यकारिका' में ईश्वरकृष्ण ने सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) का इस प्रकार
प्रस्तुतीकरण किया है—'पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति
निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ।'१
यह सूक्ष्म शरीर १८ तत्त्वों से निर्मित होता है जो निम्न हैं—(१) मन (२)
बुद्धि (३) अहङ्कार (४) ५ ज्ञानेन्द्रियाँ (५) ५ कर्मेन्द्रियाँ (६) ५ तन्मात्रायें ।
इसका स्वरूप इस प्रकार है—'चित्रं यथाऽऽश्रयमृते, स्थाण्वादिभ्यो बिना
यथाच्छाया । तद्वद्विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥ (४१)२ पुरुषार्थहेतुकमिदं
निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन । प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद् व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥'(४२)३
अन्नमय कोश स्थूल शरीर है । प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोश सूक्ष्म
शरीर के तत्त्व हैं । वेदान्त मत में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं ५
प्राण मिलकर सूक्ष्मशरीर की रचना करते हैं ।
१-३. सांख्यकारिका