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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 530 में से

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पृष्ठ 155

प्रथमोऽंशः ५३
प्रथमोदित । (अथवा सूक्ष्मा, परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरीति पञ्चपदीं वाचमाश्रित्याह
मूलाधारादिति । सप्तपद्यपि वागनेनैव सूचिता । शून्य-संवित्सूक्ष्मादीनि सप्तपदानि ।
तत्रानुत्पन्ना निष्पन्दा 'शून्या' ।। वागुत्पित्सुः 'संवित्' । उत्पत्यवस्था 'सूक्ष्मा' ।
मूलाधारात् प्रथममुदिता परेति विभागः ।।'१
स्वच्छन्दागम एवं वाग्विभाग—
'तस्माच्छून्यं समुत्पन्नं शून्यात्स्पर्शसमुद्भवः ।
तस्मान्नादः समुत्पन्नः पूर्वं वै कथितस्तव ।।'
—इस श्लोक द्वारा 'स्वच्छन्दतन्त्र' में शून्य (व्यापिनी) स्पर्श (शक्ति) आदि
की ओर सङ्केत करके वाणी के ७ भेदों की ओर सङ्केत किया गया है ।
'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।।'
'शब्दब्रह्म' = परावाक् = कुण्डलिनी = प्रणव = ओंकार 'परब्रह्म ।।'
'शब्दब्रह्म' ➔ 'परब्रह्म'
वैखरी वाक्
(कोई प्रकाशन नहीं है।)
मध्यमा वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
पश्यन्ती वाक्
(चेतन । प्रकाशित)
परा वाक्
(शब्दब्रह्म)
शब्दातीत 'परब्रह्म'
शब्द-सोपान ➔
४. सूक्ष्मतम | परा वाक्
३. सूक्ष्मतर | पश्यन्ती वाक्
२. सूक्ष्म | मध्यमा वाक्
१. स्थूल | वैखरी वाक्
१. प्रपञ्चसार टीका