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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 530 में से

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पृष्ठ 163

प्रथमोऽंशः ६१
सहस्रार से उत्पन्न यह 'बिन्दु' ही दशधा विभक्त होकर 'मूलाधार' एवं
स्वाधिष्ठान कमलों का दस दल बन जाता है । कौलमार्गियों के मतानुसार मूलाधार
एवं स्वाधिष्ठान ही 'कारणस्थान' है । सम्पूर्ण जगत् का 'कारण बिन्दु' जो
'सहस्रार' में स्थित है वही दशधा विभक्त होकर सभी चक्रों के दलों के रूप में
प्रकट होता है—
'दशधा भिद्यते बिन्दुः एक एव परात्मकः । चतुर्धाऽऽधार कमलेषोढा- ऽधिष्ठान
पङ्कजे, 'अधिष्ठानाधार द्वितयमिदमेव दशदलं । सहस्राराज्जात मणिपूर
मतोऽभूद्दशदलम् ।।' 'तदेवैको बिन्दुर्भवति जगदुत्पत्ति कृदयम् ।।'१
(क) सहस्रार से उत्पन्न (१) 'मूलाधार' एवं (२) 'स्वाधिष्ठान' के १० दल
'मणिपूर चक्र' के १० दल बन जाते हैं । (मणिपूर में मू०स्वा० दोनों हैं ।)
(ख) हृदय एवं मूलाधार के १२ + ४ दल मिलकर विशुद्धार चक्र के १६
दल बन जाते है । (विशुद्धाख्य में—अनाहत + मूलाधार दोनों हैं ।)
(ग) मणिपूर के १० दल एवं मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र (२) = १० +
२ मिलकर अनाहत चक्र के १२ दल बन जाते हैं ।
(घ) मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान आज्ञा चक्र में दो दलों के रूप में रूपान्तरित
हो जाता है । ये ही दो दल सहस्रार में एक बिन्दु के रूप में शेष रह जाते हैं ।
सारांश—मणिपूर से आज्ञा चक्र तक के समस्त चक्र मूलाधार एवं
स्वाधिष्ठानरूप हैं ।२ इसीलिए कहा गया है कि समस्त चक्रों का त्याग करके
सहस्रार में एक बिन्दु रूप में भगवती के परा संवित् रूप का ध्यान करना
चाहिए ।
'देहमयी'—'अण्ड' या 'पिण्ड' ही देह है । हिरण्यगर्भ भी स्वर्णाण्ड ही था ।
पराशक्ति सृष्टयोन्मुख होने पर 'अण्ड', 'ब्रह्माण्ड', 'प्रकृत्यण्ड', 'मायाण्ड' एवं
'शक्ताण्ड' के रूप में परिणत हो जाती है । उसमें ही समस्त षट्त्रिंशादात्म जगत्
निहित है—उस शक्ति के दो रूप हैं—(१) पुरुषरूप—'परमशिव' (२) नारीरूप—
'विमर्श' । उसी में षट्त्रिंशादात्म जगत् स्थित है—'भारूपं परिपूर्ण स्वात्मनि विश्रान्ति
तो महानन्दम् । इच्छा संवित्करणैर्निर्भरितम् अन्तः शक्तिपरिपूर्णं । सर्वविकल्पविहीनं
शुद्धं शान्तं लयोदयविहीनम् । यत्पर तत्त्वं तस्मिन् विभाति षट्त्रिंशादात्म जगत् ।'
देहों की दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो विश्व में (१) पिण्डज (२)
जरायुज (३) स्वेदज (४) उद्भिज देह हैं । पार्थिव, आंभस, तैजस, वायव्य शरीर
भी हैं और उनके मिश्रित शरीर भी हैं । मानव शरीर ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब माना
१. सुभगोदय स्तुति
२. मूलाधार में यह बिन्दु मन, बुद्धि, चित्त एवं अहङ्कार तथा स्वाधिष्ठान में—
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य (६) बन जाता है । एक परमतत्त्व
दशधा होकर जगत् की सृष्टि करता है ।