वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ वरिवस्यारहस्ये
विकसित होकर परस्पर संयुक्त दो पत्तियों के रूप में प्रकट होता है । ‘वैखरी वाक्’
वाणी की वह अवस्था है जिसमें पृथक्-पृथक् रूप में अभिव्यक्त पत्तियों की भाँति
वाणी मुख (एवं उसके उच्चारण स्थानों) द्वारा स्पष्ट रूप से प्रकट होती है ।
‘नित्यतन्त्र’ के अनुसार—
(१) वायु के द्वारा सर्वप्रथम मूलाधार चक्र में वाक् का अव्यक्त आद्यस्वरूप
‘परावाक्’ जागृत होता है ।
(२) तदुपरान्त यह वायु और अधिक ऊपर उठकर स्वाधिष्ठान चक्र में व्यक्त
होती है और वाणी के अभिव्यक्ति की इस अवस्था को ‘पश्यन्तीवाक्’
कहते हैं ।
(३) यह वायु अनाहतचक्र में पहुँच कर एवं बुद्धि के साथ मिलकर वाणी को
अभिव्यक्ति की जो अवस्था प्रदान करता है उसे ‘मध्यमावाक्’ कहते हैं ।
(४) इसके उपरान्त मध्यमावाक् और अधिक प्रस्फुट अभिव्यक्ति के स्तर पर
आरूढ़ होने पर एवं विशुद्ध चक्र में व्यक्त होकर जो अवस्था प्राप्त
करता है उसे वैखरीवाक् कहते हैं । सारांश निम्नानुसार है—
(१) मूलाधार चक्र—परावाक् (क) अव्यक्तवाक् (ख) स्वाधिष्ठान चक्र (२)
पश्यन्तीवाक्—वाक् की अङ्कुरोन्मुखावस्था । (३) अनाहत चक्र—बुद्धि के साथ
संयोग : मध्यमा वाक् : प्रकट किन्तु संयुक्त पत्तों वाली । (४) विशुद्ध चक्र—
कण्ठ से व्यक्त : वैखरी वाक् ॥ पूर्ण प्रस्फुट ॥
‘पश्यन्ती’ = अ, सृष्टि, वामा, इच्छा । ‘मध्यमा’ = इ, रक्षा, ज्येष्ठा,
ज्ञाना । ‘वैखरी’ = ‘म’ ओम् । विनाशा रौद्री । क्रिया ॥
अम्बिका शक्ति + शान्ता शक्ति का सामरस्य—वामा (इच्छा), ज्येष्ठा (ज्ञान),
रौद्री (क्रिया) का विकास (= पूर्ण गिरि, जालंधर एवं उड्डीयान पीठ का विकास)
= ‘पश्यन्ती’ ‘मध्यमा’ एवं वैखरी वाक् । भगवान् शङ्कराचार्यजी ने ‘प्रपञ्चसारतन्त्र’
में वाक् चतुष्टय की उत्पत्ति एवं उनके स्वरूप का निम्नानुसार विवेचन किया है—
‘मूलाधारात प्रथममुदितो यस्तु भावः पराख्यः ।
पश्चात् पश्यन्त्यथ हृदयगो बुद्धियुङ्मध्यमाख्यः ।
वक्त्रे वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुम्ना ।
बद्धस्तस्माद्भवति पवनप्रेरितो वर्णसङ्घः ॥’
आचार्य पद्मपाद-कृत वाणी-विभाग—आचार्य पद्मपाद ने प्रपञ्चसारतन्त्र की
टीका में वाक् तत्त्व के ५ एवं ७ भेद किये हैं जो निम्न हैं—(१) शून्य (२)
संवित् (३) सूक्ष्मा (४) परा (५) पश्यन्ती (६) मध्यमा (७) वैखरी ।
(१) सूक्ष्मा (२) परा (३) पश्यन्ती (४) मध्यमा (५) वैखरी । इनमें ‘शून्य’
वह है जो स्पन्दशून्य वाक् के रूप में स्थित है । ‘संवित्’ का अर्थ है—सिसृक्षु ।
‘सूक्ष्मा’ का अर्थ है—उत्पत्ति की अवस्था । ‘परा’ का अर्थ है—मूलाधार में