सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

प्रथमोऽंशः ५१
'भाव' या ध्वनियों के विभिन्न स्तरों में जो प्रथम स्तर है वह 'परा' कहलाता
है और मूलाधार नामक निम्नतम चक्र में उदित होता है । ऊर्ध्ववर्ती स्तर पर
पहुँचने पर यही भाव (वाक्) 'पश्यन्ती' कहलाने लगता है । जब यह और दूर
तक यात्रा करता हुआ हृदय में पहुँचता है और 'बुद्धि' के साथ संयुक्त हो जाता है
तब यह 'मध्यमा' कहलाने लगता है । जब यही भाव और आगे जाकर मुख में
पहुँचता है और विवक्षा से युक्त होकर व्यक्त हो उठता है तब 'वैखरी' कहलाने
लगता है । इनमें से 'सूक्ष्मा' द्वारा 'पश्यन्ती' पश्यन्ती द्वारा 'मध्यमा' एवं मध्यमा
द्वारा 'वैखरी' वाक् का प्रादुर्भाव हुआ करता है—'तत्र सूक्ष्मा पश्यन्त्याः, पश्यन्ती
मध्यमायाः, मध्यमा वैखर्याश्च कारणं द्रष्टव्यम् ॥'१ ये ही शब्द (१) शुद्ध अध्वा में
सूक्ष्म (२) अशुद्ध अध्वा में स्थूलतर एवं (३) मिश्र अध्वा में स्थूल है । इस
प्रकार शब्दों की सूक्ष्मता का क्रम इस प्रकार है—(क) शब्द : शुद्ध अध्वा में सूक्ष्म
(ख) शब्द : मिश्र अध्वा में स्थूल (ग) शब्द : अशुद्ध अध्वा में स्थूलतर ।
तत्त्व की दृष्टि से वाग्विभाजन एवं विवरण—
(क) विद्यातत्त्व—(१) वैखरी = श्रोत्रविषया, स्थूल वर्णपरिग्रहा, वायु- संगिनी,
प्रयोगार्हा । 'विद्यातत्त्व' से सम्बद्ध । कारणभूत सप्तकोटि मन्त्रों, विद्या राज्ञी एवं
उनके भुवनों से सम्बद्ध । प्राणवृत्याभिव्यक्ता, श्रोत्रग्राह्यार्थविशेषबोधनक्षमा ।
(ख) सदाशिव तत्त्व—(२) 'मध्यमा' = बुध्युपारूढ़वर्ण, तत्क्रमविशेषोपेता,
प्राणवृत्त्यगोचरीभूता ॥ 'सदाशिवतत्त्व' ही मध्यमा वाक् का अधिष्ठान है । कामिक
आदि तन्त्र भेद के कारणों, प्रणवादिकों, सामीप्यादिकमुक्तिप्राप्त सिद्धों एवं उनके
भुवनों का कारण ।
(ग) शक्तितत्त्व—(३) 'पश्यन्ती' = मयूराण्डरसवत् अविभक्त वर्णार्थाविशेष-
बोधनाक्षमा । वर्णरूपानुसंधानविरहान्त, समुज्वल, मयूराण्डरसवत् निर्विशेषाथर्धारिका ।
'शक्तितत्त्व' ही पश्यन्ती वाक् का अधिष्ठान है । शिव शक्त्यधिष्ठानत्वेन इसे
शक्तितत्त्वपदवाच्यता प्राप्त हुई है ।
(घ) शिवतत्त्व—(४) 'परावाक्' = ज्ञानेकाश्रया अर्थसामान्यप्रकाशिका वाणी ॥
परावाक् 'शिवतत्त्व' में स्थित है । यही शान्त्यतीत भुवनों की भी अवस्थिति है ।
यह चिदेकशरणा एवं निर्विकल्पस्वरूपिणी है ।२ इसी वाक् को शैवपरिभाषा में
'सूक्ष्मा' के नाम से उल्लिखित किया गया है ।
वाणी का मूल स्रोत—जहाँ वाणी अपने मूल रूप में बीजात्मना अव्यक्तभाव
से (पराशक्ति के रूप में) स्थित है वह स्थान है—'मूलाधार चक्र ।' 'पश्यन्ती'
अवस्था में, यह मूलाधारस्थ अव्यक्त 'परावाक्' विकसित होकर अङ्कुरोन्मुख हो
उठता है । 'मध्यमा' अवस्था में अङ्कुरोन्मुख यह वाणी का बीज, और अधिक
१. शिवाग्रयोगीन्द्र ज्ञान शिवाचार्यः 'शैवपरिभाषा' (परि० चतुर्थ)
२. शैवपरिभाषा