वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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५४ वरिवस्यारहस्ये
(१) 'चक्रमयी'—सृष्टि चक्रमयी है । श्रीचक्र में ही समस्त प्रपञ्च अन्तर्गर्भित
है । श्रीचक्र का विकास ही जगत् है । श्रीचक्र नवयोन्यात्मक, चिदानन्दघन है और
नवात्मक है—
'नवयोन्या चक्रं चिदानन्दघनं महत् ।
चक्रं नवात्मकमिदं नवधा भिन्नमन्त्रकम् ।।'
| श्रीचक्र के अंतर्गत चक्र | अधिष्ठात्री देवी | ||
|---|---|---|---|
| सर्वानन्दमय चक्र | महात्रिपुरसुन्दरी | बिन्दु | केन्द्रस्थ रक्तबिन्दु |
| सर्वसिद्धिप्रद चक्र | त्रिपुराम्बा | पीतवर्ण का त्रिकोण | |
| सर्वरोगहर चक्र | त्रिपुरसिद्धा | काले रङ्ग के १० त्रिकोण | |
| सर्वरक्षाकर चक्र | त्रिपुरमालिनी | अन्तर्दशार चक्र | हरे रङ्ग के ८ त्रिकोण |
| सर्वार्थसाधक चक्र | त्रिपुराश्री | बहिर्दशार चक्र | लाल रङ्ग के १० त्रिकोण |
| सर्वसौभाग्यदायक चक्र | त्रिपुरवासिनी | नीले रङ्ग के १४ त्रिकोण | |
| सर्वसङ्क्षोभणकारक चक्र | त्रिपुरसुन्दरी | गुलाबी रङ्ग का अष्टदल कमल | |
| सर्वाशापरिपूरक चक्र | त्रिपुरेशी | पीतवर्ण का षोडशदल कमल | |
| त्रैलोक्यमोहन | त्रिपुरा | हरे रङ्ग का बाह्यस्थल | |
| श्रीचक्र की नौ योनियाँ है—(१) मध्यत्रिकोण (२) अष्टार (३) अन्तर्दशार | |||
| (४) बहिर्दशार (५) चतुर्दशार (६) अष्टदलपद्म (७) षोडश दल पद्म (८) तीन | |||
| वृत्त (९) भूपुर । | |||
| श्रीचक्र में ९ त्रिकोण होते हैं । इन्हें योनियाँ भी कहते हैं । इनमें (क) ५ | |||
| शक्ति त्रिकोण एवं (ख) ४ शिव त्रिकोण । 'शक्तित्रिकोण' अधोमुखी एवं शिव | |||
| त्रिकोण ऊर्ध्वमुखी होते हैं । यही कौलमत है । | |||
| (१) 'शक्तिचक्र'—त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार चतुर्दशार (२) | |||
| 'शिवचक्र'—अष्टदलपद्म, षोडशदलपद्म तीन वृत्त, भूपुर । इन चक्रों का पिण्डस्थ | |||
| चक्रों के साथ निम्न सम्बन्ध हैं— |