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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 530 में से

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पृष्ठ 147

प्रथमोऽंशः ४५
(२) 'पश्यन्ती' —परमात्मा 'बहुस्यां प्रजायेय' का जो ईक्षण करता है उसी की
परिणति पश्यन्ती है १—'तादृशमीक्षणमेव प्रवृत्तिनिमित्तीकृत्य तस्यां पश्यन्तीति पदं
प्रवर्तते ।'
(३) 'उत्तीर्णा' — यहीं 'पश्यन्ती' ही उत्तीर्णा भी कही जाती है ।२ 'सैव च
पश्यन्त्याख्यामातृका करणसरणित उत्तीर्णत्वा दुत्तीर्णोत्युच्यते ।।' उसके अवयव
वामादिक ८ शक्तियाँ है—तदवयवाश्च वामादयोऽष्टौ शक्तयोऽन्यत्र प्रपञ्चिताः ।।
(४) 'नौ नाद' — यही पश्यन्ती व्यष्टि-समष्टि रूप से ९ प्रकार की है—
'अतःसैव व्यष्टि-समष्टि वेषेण नवविधा ततो नव नादा अविकृत शून्यादयो जाताः ।।३
(५) उसकी समष्टि—नाद, ध्वनि आदि कही जाती है—(तत्समष्टिश्च नाद
ध्वन्यादि पद वाच्या) ।।
'मध्यमा वाक्'—परा की भाँति अतिसूक्ष्म एवं वैखरी की भाँति अति स्थूल—
इन दोनों कोटियों से परे मध्य स्तर पर व्यक्त वाक् 'मध्यमा' है । ('नातिसूक्ष्मा
परावन्नातिस्थूला वैखरीवद अतो मध्यमाख्या ।।) इसीलिए उसे 'मध्यमा' कहते भी
हैं । मध्यमा की स्थिति 'मध्यमाख्या मातृका मध्यमावयवरूपमविकृत शून्य स्पर्श नाद
ध्वनि बिन्दु शक्ति बीजाक्षराख्यं नादनवकं मूलाधारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च
स्थितम् ।।'४
नव नाद एवं वर्णमाला—(नव नाद—वर्णमाला की उत्पत्ति इन्हीं ९ नादों से
होती है—'नवभिर्नादैरक च ट त प य श ला ख्य वर्ग नवकवती वैखर्याख्या
मातृका जाता ।'५)—९ नादों से वैखरी वाक् उत्पन्न होता है । 'वैखरी' नामकरण
क्यों ?६—
'स्पष्टतरत्वात् खं कर्णविवरवर्ति नभोरूप श्रोत्रेन्द्रियं राति गच्छति, तज्जन्य ज्ञान
विषयो भवति इति ।
'ख' आकाश का नाम है । आकाश का सम्बन्ध श्रोत्रेन्द्रिय से है अतः
आकाश की इन्द्रिय स्रोत में जो (राति) जाता है, प्रवेश करता है (राति = गच्छति)
वह 'वैखरी' है ।६
प्रणवात्मक निश्चल कुण्डलिनी ही 'परावाक्' है । पश्यन्ती आदि परावाक् की
ही विकृतियाँ हैं । 'प्रणव' उच्चारण से पूर्व संविदात्मक 'पर प्रणव' में स्थित रहता
है फिर यह ज्वाला-प्रवाह रूप शब्दभेदों को पार करता हुआ—यह ज्योतिलिङ्गाकार
चिदग्निरूप प्रणव भ्रमर के समान गुञ्जन करता हुआ मूलाधार से सुषुम्णा मार्ग में
प्रवेश करता है । और द्वादशान्त में स्थित हो जाता है ।
'परावाक्' अव्यक्त विश्वबीज है—भारतीय ऋषियों ने मानव जीवन के जो
चार लक्ष्य निर्धारित किये हैं उन्हें ही शब्दान्तर में 'पुरुषार्थ चतुष्टय' कहा गया है ।
१-६. वरिवस्यारहस्यम्