वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ५७
(२) 'स्वाधिष्ठान चक्र'—द्वितीय चक्र षडदलात्मक स्वाधिष्ठान है । उसके
मध्य में (मांसाकार) पश्चिमाभिमुखी ज्योतिर्लिङ्ग है जो कि प्रवाल सदृश है , यहीं
उड्डीयानपीठ है जो कि जगदाकर्षण सिद्धि प्रदान करने वाला है ।
(३) 'मणिपूरक चक्र'—तृतीय चक्र 'नाभिचक्र' है जो कि पञ्चावर्त सर्प
कुटिलाकार है । उसमें बालार्ककोटिप्रभा कुण्डलिनी का ध्यान करना चाहिए ।
मणिपूरक सर्वसिद्धिप्रद एवं सर्व सामर्थ्यवान चक्र है ।
(४) 'हृदय चक्र'—यह अधोमुखी अष्टदलात्मक चक्र है । इसके आकाश के
मध्य ज्योतिर्लिङ्ग का ध्यान करना चाहिए इसी अष्टदलात्मक हृदयचक्र में 'हंसकला'
स्थित है जो कि सर्वप्रिया एवं सर्वलोकवश्यकरी है ।
(५) 'कण्ठ चक्र'—चतुरङ्गुल कण्ठचक्र के वामभाग में इडा नाम्नी चन्द्रनाडी
एवं दक्षिण दिशा में पिङ्गला नाम्नी सूर्यनाड़ी एवं उसके मध्य में श्वेतवर्णा सुषुम्ना
का ध्यान करना चाहिए । ऐसे ध्याता को अनाहतसिद्धि प्राप्त होती है ।
(६) 'तालु चक्र'—तालुमूल चक्र में लक्ष्य का ध्यान करने से सूर्य एवं
चन्द्रमा को एकता स्थापित होती है । वहाँ अमृत प्रवाहित होता है । वहाँ
ऊर्ध्वमूलचक्ररन्ध्र में जो अन्तर्जिह्वा स्थित है और 'घण्टिकालिङ्ग' कहलाता है वहीं
राजदन्तावलम्बिनी विवर 'दशमद्वार' है । वहाँ वृत्ति शून्य होकर ध्यान करने से चित्त
का लय हो जाता है ।
(७) 'भ्रू चक्र'—सातवाँ चक्र जो अङ्गुष्ठमात्र है और 'भ्रू चक्र' कहलाता है ।
वहाँ ज्ञाननेत्र का दीप शिखाकार रूप में ध्यान करना चाहिए । वहीं कपालकन्द है ।
यह आज्ञाचक्र वाक्सिद्धि प्रदान करता है ।
(८) 'ब्रह्मरन्ध्र निर्वाणचक्र'—यह अष्टम चक्र है । यहाँ सूचिका गृह से भी
अधिक सूक्ष्म ('सूचिकागृहेतर') धूम्रशिखा का ध्यान करना चाहिए । वहीं
जालन्धरपीठ है जो मोक्षप्रद है और परब्रह्मचक्र है ।
(९) 'आकाश चक्र'—नवम चक्र आकाश चक्र है । यह षोडशदलोपेत एवं
ऊर्ध्वमुख है । उसके मध्य में स्थित है—त्रिकूटाकार ज्योति । ('त्रिकूट' = भ्रूमध्य)
'ऊर्ध्वमुन्नयते इत्योंकारः' के अनुसार ऊर्ध्वशक्तिता (तुरीयोंकाररूपता) ब्रह्माभिन्न
'परशून्य' का ध्यान करना चाहिए । वहीं सर्वेच्छासिद्धिसाधक 'पूर्णगिरिपीठ' विद्यमान
है ।
'स्वच्छन्दतन्त्र' में 'आधारपङ्कज' 'स्वाधिष्ठान' 'अनाहत' विशुद्ध के अतिरिक्त
लम्बिका के अग्रभाग में भी एक 'अष्टदलकमल' का वर्णन किया
गया है—
'कण्ठोर्ध्वं परमेशानि लम्बिकाचतुरङ्गुले ।
तस्यामष्ट दलं पद्मं रसिकादिभिरावृतम् ॥'