वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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पुरुषार्थ चतुष्टय में प्रथम पुरुषार्थ 'धर्म' है । जिन्होंने धर्म का साक्षात्कार किया
उन्होंने अनुभव किया कि चराचर समस्त जगत् का मूलाधारभूत तत्त्व सूक्ष्म वाक् है
और जो धर्मतत्त्व का साक्षात्कार नहीं कर पाये वे जगदाधिष्ठान रूप में स्थित इस
सूक्ष्म वाक् तत्त्व का संधान नहीं कर सकते—
'यां सूक्ष्मां नित्यामतीन्द्रियां वाचम् ऋषयः साक्षात्कृतधर्माणो मन्त्रदृशः पश्यन्ति,
ताम् असाक्षात्कृतधर्मेभ्यः परेभ्यः आदि ।।'१
यह सूक्ष्म वाक् 'परावाक्' का पर्याय है । सूक्ष्म वाक् के विषय में दो दृष्टियाँ
हैं । शब्दब्रह्मवादी आचार्यों की दृष्टि के अनुसार सूक्ष्म वाक् पुरुष की समवायिनी
शक्ति तथा अमृत कला है । सिद्धान्त शैव मत के अनुसार सूक्ष्म वाक् 'बिन्दु' का
कार्य है । शैव दृष्टि के अनुसार सूक्ष्म वाक् पुरुष भी समवायिनी शक्ति नहीं है
प्रत्युत् यह आत्मा में अविभक्त रूप में स्थित रहती है । यह सूक्ष्म वाक् (परावाक्)
नित्य भी नहीं है । प्रत्युत् यह कार्यरूप एवं अनित्य है । इसी का नामान्तर
शब्दब्रह्म, रवि, या सूर्य है । इसका भेदन करने से विवेक ज्ञान का उदय होता है
और शब्दब्रह्म का भेदन करने से मुक्ति होती है । शब्दब्रह्मवादी सूक्ष्म वाक् से
'पश्यन्ती' को अभिन्न स्वीकार करते हैं जबकि शाक्त आचार्य इसे आत्मा या
परमशिव की पराशक्ति मानते हैं । जब आत्मस्वरूप में आत्मस्वरूप की दिदृक्षा
होती है तब प्रकाशांश एवं विमर्शांश (शान्ता एवं अम्बिका शक्तियाँ) दोनों में
सामरस्यागम होता है । इसी सामरस्य का अभिधान है 'परावाक्' या परमातृका' ।
इसी में जगत् के मूल तत्त्व (३६ .तत्त्व) विश्वबीज के रूप में अव्यक्तावस्था में
विद्यमान रहते हैं और सृष्टिबेला में अभिव्यक्त हुआ करते हैं । 'परावाक्' अद्वैतात्मक
अखण्ड ज्ञान, समस्त भावों की पूर्णता, पर बोध, एवं 'परम परामर्श' है ।
जगद्रचना के प्रारम्भ में परावाक् में स्थित वेदशास्त्रादिक निम्नभूमिका में अवतीर्ण
होते हैं और सर्वप्रथम हृदय के अन्दर परम बोध के रूप में अस्फुट अहंसंज्ञान के
उस स्वरूप का आविर्भाव होता है जिसके विमर्श से वाच्य-वाचकभाव विद्यमान नहीं
रहता ।
तन्त्र का मूलस्वरूप भी परावाक् रूप है क्योंकि 'परावाक्' परमात्मा की
'पराशक्ति' है । यह आत्मबोध की परावस्था है । 'परमाकला' द्वारा आत्मस्फुरण के
साक्षात्कार की परिणति ही 'परावाक्' है ।'
आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदा सा परमा कला ।
अम्बिकारूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता ।।'२
अमृतानन्द 'दीपिका' में कहते हैं कि 'वह सर्ववर्णाशिभूत विमर्शरूपा ('परमा')
विमर्शशक्ति ('कला') अपने अर्थात् परशिव के ('आत्मनः') पश्यन्ती आदि के क्रम
से वैखरीपर्यन्त, विमर्शन ('स्फुरण') का जब दर्शन करना चाहती है तब
परमाशान्तात्मिका होकर प्रकाशांशस्वरूपा अम्बिका के साथ सामरस्य प्राप्त करके
१. पुराकल्प २. योगिनीहृदय