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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

लक्षणलक्षणम् ] उपोद्घातः ११
'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिरित्युक्तम्। उद्दिष्टविभागश्च न त्रिविधायां
शास्त्रप्रवृत्तावन्तर्भवति। तस्मादुद्दिष्टविभागो युक्तः। न; उद्दिष्टविभागस्योद्देश
एवान्तर्भावात् । कस्मात् ? लक्षणसामान्यात् । समानं लक्षणं नामधेयेन
पदार्थाभिधानमुद्देश इति'१।
अर्थात् शास्त्र की त्रिविध प्रवृत्ति होती है यह कहा गया है परन्तु उस
त्रिविध प्रवृत्ति में उद्दिष्ट के 'विभाग' का अन्तर्भाव नहीं होता है इसलिए उद्दिष्ट
के 'विभाग' को भी चौथा प्रकार मानना उचित है। [ यह प्रश्न है इसका
उत्तर करते हैं ] नहीं, उद्दिष्ट के विभाग का अन्तर्भाव उद्देश में ही हो जाता
है। क्योंकि दोनों का लक्षण समान है। नाममात्र से पदार्थों के कथन को ही
उद्देश कहते हैं और 'विभाग' में विभक्त पदार्थों के नाममात्र का कथन ही
होता है अतः विभाग का अन्तर्भाव उद्देश में ही हो सकता है। अतः उसके
अलग परिगणन की आवश्यकता नहीं है।
लक्षण का लक्षण--
इन तीनों विभागों में से उद्देश और परीक्षा का लक्षण सीधा है। और जो
यहां ग्रन्थकार ने दिया है वही 'वात्स्यायन भाष्य' और 'न्यायकन्दली' आदि
अन्य ग्रन्थों में भी दिया है। परन्तु 'लक्षण' का 'लक्षण' थोड़ा समझने योग्य
है। यहाँ तर्कभाषाकार ने 'लक्षणन्त्वसाधारणधर्मवचनम्' । अर्थात् असाधारण
धर्म को लक्षण कहते हैं। जैसे गौ का लक्षण सास्नादिमत्त्व है। यह लक्षण
की व्याख्या की है। असाधारण धर्म या विशेष धर्म वह कहलाता है जो केवल
लक्ष्य [ जैसे गौ ] में रहे। जो धर्म लक्ष्य से भिन्न अलक्ष्य महिष आदि में भी
पाया जाय वह लक्षण नहीं कहलाता है क्योंकि उसमें 'अतिव्याप्ति' दोष होता
है। 'अलक्ष्यवृत्तित्वमतिव्याप्तिः' जो धर्म अलक्ष्य अर्थात् लक्ष्य से भिन्न में
रहे वह 'अतिव्याप्ति' दोषग्रस्त होने से लक्षण नहीं होता। जैसे शृङ्गित्त्व सींग
होनेको गौ का लक्षण नहीं कहा जा सकता है क्योंकि लक्ष्य गौ से भिन्न अर्थात्
अलक्ष्य महिषादि में भी शृङ्गित्त्व धर्म पाया जाता है। अर्थात् सींग भैंस आदि
के भी होते हैं, इसलिए 'शृङ्गित्त्व' गौ का लक्षण नहीं है।
इसी प्रकार 'लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वमव्याप्तिः' जो धर्म लक्ष्य के एक अंश में
न पाया जाय वह 'अव्याप्ति' दोष ग्रस्त होने से लक्षण नहीं कहा जाता। जैसे
१ न्या० वा० १, १, ३, । न्यायमञ्जरी पृ० १२ ।

१२ तर्कभाषा [ लक्षणप्रयोजनम्
'शाबलेयत्व' अर्थात् चितकबरापन गाय का लक्षण नहीं हो सकता है। क्योंकि
लक्ष्य-गौ-के एक बहुत बड़े भाग में अर्थात् बहुत सी गौओं में यह 'शाबलेयत्व'
या चितकबरापन नहीं पाया जाता है। अतएव यह 'शाबलेयत्व' धर्म 'अव्याप्ति'
दोषग्रस्त होने से गौ का लक्षण नहीं हो सकता है।
तीसरा दोष असम्भव है। 'लक्ष्यमात्रावृत्तित्वमसम्भवः' अर्थात् जो धर्म
लक्ष्यमात्र में न पाया जाय वह असम्भव दोष कहलाता है। जैसे 'एकशफत्व'
असम्भवदोषग्रस्त होने से गौ का लक्षण नहीं हो सकता है। गौ द्विशफ प्राणी
है अर्थात् उसके खुर बीच से चिरे हुए होने से दो शफ (खुर) होते हैं। ऊंट
का पूरा खुर एक होता है जिससे उसे रेत में चलने में सहायता मिलती है।
इसलिए ऊंट एकशफ एक खुर वाला प्राणी है। परन्तु गौ एकशफ नहीं अपितु
द्विशफ प्राणी है। अतएव यदि कोई एकशफत्व को गौ का लक्षण बनाना चाहे
तो यह लक्षण एक भी गौ में नहीं मिलेगा। लक्ष्यमात्र-सारी गौओं-में अविद्य-
मान होगा। अतएव वह गौ का लक्षण नहीं हो सकता। इस प्रकार १
'अतिव्याप्ति' [ अलक्ष्यवृत्तित्वमतिव्याप्तिः ] २ अव्याप्ति [ लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वम-
व्याप्तिः ] और ३ असम्भव [ लक्ष्यमात्रावृत्तित्वमसम्भवः ] इन तीनों दोषों से
रहित धर्म ही लक्षण होता है। ऐसे धर्म को ही असाधारण धर्म या 'लक्ष्यता-
वच्छेदकसमनियत' धर्म भी कहते हैं। इसलिए 'अतिव्याप्त्यादिदोषत्रयरहितो
धर्मो लक्षणम्' या 'लक्ष्यतावच्छेदकसमनियतो धर्मो लक्षणम् ।' अथवा 'असा-
धारणधर्मवचनम् लक्षणम्' यह तीनों ही 'लक्षण' के 'लक्षण' हो सकते हैं।
लक्षण का प्रयोजन--
लक्षण के दो प्रयोजन माने गए हैं एक व्यावृत्ति अर्थात् सजातीय या
विजातीय अन्य पदार्थों से भेद करना और दूसरा व्यवहार को प्रवृत्त करना ।
'व्यावृत्तिर्व्यवहारो वा लक्षणस्य प्रयोजनम्' । गौ का लक्षण करने का अभिप्राय
उसके समानजातीय महिषादि चतुष्पद और उसके असमानजातीय चतुष्पद
भिन्न प्राणी, तथा अचेतन पदार्थों से उसको भिन्न करना ही होता है। इसीको
'समानासमानजातीयव्यवच्छेदो हि लक्षणार्थः' कह कर लक्षणका प्रयोजन बताया
है। यही धर्म या लक्षण गौ व्यवहार का प्रवर्तक होता है। इसलिये व्यवहार
भी लक्षण का प्रयोजन है। इस प्रकार लक्षण के द्विविध प्रयोजन माने गए हैं।
प्रमाणलक्षण--
प्रथम सूत्र में न्याय शास्त्र के प्रतिपाद्य प्रमाणादि षोडश पदार्थों का

प्रमाणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १३
१-प्रमाणानि
प्रमाणम्
तत्रापि प्रथममुद्दिष्टस्य प्रमाणस्य तावल्लक्षणमुच्यते। प्रमाकरणं
प्रमाणम्। अत्र च प्रमाणं लक्ष्यं, प्रमाकरणं लक्षणम्।
ननु प्रमायाः करणं चेत् प्रमाणं तर्हि तस्य फलं वक्तव्यम्, करणस्य
फलवत्त्वनियमात्। सत्यम्। प्रमैव फलं, साध्यमित्यर्थः। यथा
छिदाकरणस्य परशोश्छिदैव फलम्।
उद्देश अर्थात् नाममात्र से परिगणन कर दिया गया है। अब शेष ग्रन्थ में
उनके लक्षण और परीक्षा करनी हैं। उद्देश सूत्र में सबसे पहिले प्रमाण को
रखा है अतएव उसी क्रम से सबसे पहिले प्रमाण का लक्षण करते हैं। यद्यपि
न्यायसूत्रकार ने प्रमाण सामान्य का लक्षणसूचक कोई सूत्र नहीं लिखा है
परन्तु उनके भाष्यकार वात्स्यायन ने—'प्रमाण शब्द का निर्वचन ही उसका
लक्षण है अतएव सूत्रकार को उसका अलग लक्षण करने आवश्यकता नहीं
है'। इस प्रकार का भाव व्यक्त करते हुए लिखा है—
'उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानीति समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद्बोद्धव्यम् ।
प्रमीयते अनेन इति करणार्थाभिधानो हि प्रमाणशब्दः'१ ।
इसका अभिप्राय यह है कि प्र उपसर्ग पूर्वक मा धातु से करण में ल्युट्
प्रत्यय करने से प्रमाण शब्द सिद्ध होता है अतएव प्रमा का करण अर्थात् साधन
प्रमाण कहलाता है। यह प्रमाण का सामान्य लक्षण प्रमाण पद के निर्वचन से
ही निकल आता है। अतएव उपलब्धि अर्थात् ज्ञान अथवा प्रमा के साधन
अर्थात् करण को प्रमाण कहते हैं। यह प्रमाण का सामान्य लक्षण हुआ। इसी
भाष्य के आधार पर तर्कभाषाकार प्रमाण लक्षण का सामान्य लक्षण करते हैं—
उन [ षोडश पदार्थों ] में भी प्रथम उद्दिष्ट [ सबसे पहिले कहे हुए ] प्रमाण
का लक्षण सबसे पहिले कहते हैं। प्रमा का करण प्रमाण है। इस [ लक्षण ]
में प्रमाण यह [ पद ] लक्ष्य [ पद, अर्थात् जिसका लक्षण करना है वह ] है
और प्रमा का करण यह लक्षण [ अंश ] है।
[ प्रश्न ] अच्छा यदि प्रमा का करण [ अर्थात् साधन ] प्रमाण है तो उस
[ साधन रूप प्रमाण ] का फल बतलाना चाहिये [ क्योंकि ] करण [ अर्थात्
साधन ] का फल होना आवश्यक है।
१ न्याय भाष्य १, १, ३।

१४ तर्कभाषा [ प्रमालक्षणम्
प्रमा
का पुनः प्रमा, यस्याः करणं प्रमाणम् ।
उच्यते । यथार्थानुभवः प्रमा । यथार्थ इत्ययथार्थानां संशय-विपर्यय-
तर्कज्ञानानां निरासः । अनुभव इति स्मृतेर्निरासः ।
ज्ञातविषयं ज्ञानं स्मृतिः । अनुभवो नाम स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानम् ।
[ उत्तर ] ठीक है [ अर्थात् करण का फल अवश्य होता है । इसलिये ]
प्रमा ही [ प्रमाणरूप करण या साधन का ] फल अर्थात् साध्य है । [ जिसका
साधन होता है वही उसका फल होता है .प्रमा का करण या साधन प्रमाण है
तो उसका फल प्रमा ही होगी ] जैसे छेदन [ काटने ] के करण फरसे का फल
छेदन ही होता है । [ इसी प्रकार यहां प्रमा के करण अर्थात् प्रमाण का फल
प्रमा ही समझना चाहिए ]
इस प्रकार प्रमाण का सामान्य लक्षण हुआ । परन्तु इस लक्षण में प्रमा
और करण दो शब्द आए जब तक उनकी व्याख्या न हो तब तक यह लक्षण
स्पष्ट नहीं होता । अतएव आगे प्रमा का लक्षण करते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर प्रमा क्या है जिसका करण प्रमाण [ कहा जाता ] है ।
[ उत्तर ] कहते हैं । यथार्थ अनुभव [ का नाम ] प्रमा है । यथार्थ पद से
अयथार्थ [ ज्ञान रूप ] संशय, विपर्यय, और तर्क ज्ञान का निराकरण किया
[ जिससे संशय-विपर्यय और तर्क ज्ञान में प्रमा का लक्षण न चला जाय ] ।
अनुभव इस [ पद ] से स्मृति का निराकरण किया [ अर्थात् अनुभव पद इस
लिए रखा कि स्मृति में प्रमा का लक्षण अतिव्याप्त न हो जाय ] ।
[ ज्ञान के दो भेद हैं एक अनुभव और दूसरा स्मृति । उनमें से ] ज्ञात
विषयक ज्ञान को स्मृति कहते हैं और स्मृति से भिन्न ज्ञान को अनुभव कहते हैं ।
पदकृत्य—
'प्रमाकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण किया था । उसके
स्पष्टीकरण के लिए 'प्रमा' का लक्षण करना आवश्यक है अतएव 'यथार्थानुभवः
प्रमा' यह 'प्रमा' का लक्षण किया है । इस लक्षण में भी 'प्रमा' यह पद लक्ष्य
अंश है और 'यथार्थानुभवः' इतना लक्षण अंश है । लक्षण अंश में यथार्थ
और अनुभव इन दो पदों का समावेश है । लक्षण में ये दोनों पद विशेष
अभिप्राय से रखे गए हैं । ऊपर अतिव्याप्ति आदि लक्षण के दोषों का वर्णन
किया है । इन पदों के रखने का प्रयोजन अतिव्याप्ति दोष का निराकरण करना

अप्रमालक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १५
ही है। किस पद के रखने का क्या प्रयोजन है इसके जानने का सीधा मार्ग
यह है कि उस पद को लक्षण से हटा दिया जाय और तब उसका क्या प्रभाव
होता है इसको देखा जाय तब उस पद के रखने की उपयोगिता प्रतीत हो
जायेगी। जैसे यहाँ यदि यथार्थ पद को हटा दिया जाय तो 'अनुभवः प्रमा'
केवल इतना लक्षण रह जाता है। इस लक्षण के होने पर शुक्ति को रजत रूप
में ग्रहण करने वाला 'भ्रम' या 'विपर्यय' ज्ञान भी अनुभव रूप होने से 'प्रमा'
कहलाने लगेगा। अथवा अँधेरे में किसी ऊँचे से पेड़ के ठूंठ को खड़ा देख
कर 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह 'संशयात्मक' ज्ञान भी अनुभव रूप होने से 'प्रमा'
कहलाने लगेगा। इसी प्रकार तर्क ज्ञान में भी प्रमा का लक्षण चला जायगा।
परन्तु संशय, विपर्यय और तर्क ज्ञान यथार्थ ज्ञान नहीं है। उनको 'प्रमा'
नहीं कहा जाता है। यदि 'अनुभवः प्रमा' इस लक्षण के साथ 'यथार्थ' पद
जोड़ दिया जाय तो 'अयथार्थ' ज्ञान रूप 'संशय' 'विपर्यय' और 'तर्क' ज्ञान
में प्रमा के लक्षण की अतिव्याप्ति के निराकरण के लिए 'यथार्थ' पद का सन्नि-
वेश 'प्रमा' के लक्षणों में किया गया है।
इसी प्रकार स्मृति को भी प्रमा नहीं मानते हैं। अतएव स्मृति में प्रमा
के लक्षण की अतिव्याप्ति के निवारण के लिए अनुभव पद का निवेश इस
लक्षण में किया गया है। लक्षणों में आए हुए पदों के इस प्रकार प्रयोजन-
प्रदर्शन को 'पदकृत्य' कहते हैं। और इस प्रकार 'पदकृत्य' अर्थात् प्रत्येक पद
के रखे जाने के प्रयोजन बताते हुए की गई व्याख्या को सपदकृत्य व्याख्या
कहते हैं, 'सपदकृत्यं व्याख्यायताम्' कहने से इसी प्रकार पदकृत्य-सहित
व्याख्या कराना ही अभिप्रेत होता है।
अप्रमा लक्षण—
जो पदार्थ जैसा है उसको उसी रूप में ग्रहण करना यथार्थ ज्ञान अथवा
'प्रमा' कहलाता है। उससे भिन्न रूप में ग्रहण करना अयथार्थ ज्ञान या
अप्रमा कहलाता है। इस अयथार्थ ज्ञानके संशय, विपर्यय और तर्कज्ञान ये तीन
भेद यहाँ प्रदर्शित किए हैं। योगदर्शनमें 'विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्'१
अर्थात् अतद्रूप में प्रतिष्ठित मिथ्या ज्ञान को विपर्यय कहते हैं यह विपर्यय
का लक्षण किया है। जैसे शुक्ति को पड़ी देखकर कभी-कभी उसके 'चाकचिक्य'
अर्थात् चमक आदि के कारण उसको रजत समझ लिया जाता है। ऐसी दशा में
१. योग, १,८

१६ तर्कभाषा [ तर्कस्याप्रमात्वम्
में शुक्ति में जो रजत का ज्ञान होता है वह अतद्रूप अर्थात् अरजत रूप शुक्ति
में प्रतिष्ठित होता है। अतएव अतद्रूप में प्रतिष्ठित होने के कारण उसको
मिथ्या ज्ञान अथवा विपर्यय कहते हैं और वह अयथार्थ ज्ञान होता है।
नैयायिकों ने इसी अतद्रूपप्रतिष्ठ अर्थ का बोधन करने के लिये ‘तद्भाववति
तत्प्रकारकं ज्ञानमप्रमा’ कहा है। जिसका अर्थ यह है कि ‘तदभाववति अर्थात्
रजतत्वाभाववति’ जिसमें रजतत्व का अभाव हो उस शुक्ति आदि में तत्प्रकारक
अर्थात् रजतत्वविशेषणक ज्ञान को अप्रमा कहते हैं। ‘तत्प्रकारकम्’ में प्रकार शब्द
का अर्थ विशेषण होता है। ‘तद्भाववति अर्थात् रजतत्वाभाववति शुक्तिकादौ’
रजतत्व से रहित शुक्तिका आदि में ‘तत्प्रकारकम्’ अर्थात् रजतत्वप्रकारकम्’
जिसमें रजतत्व विशेषण रूप से प्रतीत हो अर्थात् ‘इदं रजतम्’ यह ज्ञान
मिथ्या ज्ञान, विपर्यय, अप्रमा या भ्रम कहा जाता है।
संशय और तर्क का अप्रमात्व—
इस विपर्यय के अतिरिक्त संशय और तर्क ज्ञान को भी ग्रन्थकार ने
अयथार्थ ज्ञान कहा है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक पदार्थ का एक निश्चित
स्वरूप होता है। उस निश्चित रूप से जो उस पदार्थ का ग्रहण है वह तो उस
का यथार्थ ज्ञान ‘तद्वति तत्प्रकारकं ज्ञानं यथार्थोऽनुभवः’ है। परन्तु संशय में
पदार्थ का निश्चयात्मक रूप से ग्रहण नहीं होता है। अतएव अनिश्चयात्मक
संशय ज्ञान भी ‘तदभाववति तत्प्रकारकम्’ होने से अयथार्थ ज्ञान ही है।
तर्कज्ञान को भी ग्रन्थकार ने अयथार्थ ज्ञान के अन्तर्गत माना है। इसका
कारण यह है कि तर्क भी निश्चय से पूर्व की अनिश्चयावस्था का नाम है।
तर्क का लक्षण न्याय सूत्र में ‘अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थ-
मूहस्तर्कः’" १ ।
इस प्रकार किया गया है। इसके भाष्य में भाष्यकार ने लिखा है कि—
‘कथं पुनरयं तत्त्वज्ञानार्थः, न तत्त्वज्ञानमेवेति । अनवधारणात् । अनुजाना-
त्ययमेकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या न त्ववधारयति, न व्यवस्यति, न निश्चिनोति
एवमेवेदमिति’ २,
अर्थात् तर्क केवल एक पक्ष का समर्थन मात्र करता है उसका निश्चय नहीं
करता है कि यह पदार्थ ऐसा ही है। अतएव अनवधारणात्मक या अनिश्चयात्मक
१ न्याय सूत्र १, १, ४० । २ वात्स्यायन भाष्य १, १, ४० ।

ज्ञानभेदाः ] प्रमाणनिरूपणम् १७
होने से तर्क को यथार्थ ज्ञान नहीं कह सकते हैं। हाँ उससे तत्त्वज्ञान में
सहायता मिलती है इसलिए सूत्रकार ने तर्क को ‘तत्त्वज्ञानार्थः’ तत्त्वज्ञान के
लिए ऐसा कहा है तत्त्वज्ञान ही नहीं कहा है। इस प्रकार भाष्यकार के
अनुसार तर्क भी अनवधारणात्मक, अनिश्चयात्मक ज्ञान है अतएव वह यथार्थ
ज्ञान के अन्तर्गत नहीं है। संशय और तर्क दोनों ज्ञान अनवधारणात्मक हैं
परन्तु संशय अनुमान का प्रवर्तक होने से परम्परया और तर्क तत्त्वज्ञान में
साक्षादुपयोगी है इसलिए संशय और तर्क एक नहीं हैं। इस प्रकार प्रमा का
लक्षण करते समय संशय विपर्यय और तर्क ज्ञान में प्रमा लक्षण की अतिव्याप्ति
वारण के लिए लक्षण में यथार्थ पद का निवेश किया गया है।
ज्ञान के भेद—
ज्ञान के भी 'अनुभव' तथा 'स्मृति' भेद से दो भेद माने गये हैं। उनमें
से ज्ञात विषयक ज्ञान को 'स्मृति' कहते हैं, और उससे भिन्न अर्थात् अज्ञात
विषयक ज्ञान को 'अनुभव' कहते हैं। ज्ञात विषयक ज्ञान भी दो प्रकार का होता
है जिनमें एक को 'स्मृति' और दूसरे को 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं। किसी वस्तु को
जब हम देखते या किसी प्रकार से जानते हैं तब उस ज्ञान से हमारे आत्मा में एक
संस्कार उत्पन्न हो जाता है। वस्तु का ज्ञान तो स्थिर नहीं रहता है परन्तु वह
'संस्कार' बराबर बना रहता है। और कालान्तर में जब किसी कारण से वह
संस्कार उद्बुद्ध हो जाता है तब बिना बाह्य इन्द्रिय आदि की सहायता के उस
पदार्थ का पुनः ज्ञान होने लगता है। इसी ज्ञान को 'स्मृति' कहते हैं। स्मृति
सदा 'ज्ञात विषय' की ही होती है। इसलिए ‘ज्ञातविषयं ज्ञानं स्मृतिः’ यह स्मृति
का लक्षण है। स्मृति का कारण सदा संस्कार का उद्बोध ही होता है इसलिए
'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यह भी स्मृति का दूसरा लक्षण हो सकता है। स्मृति
को पैदा करने वाले संस्कार के उद्बोधक सादृश्यादि हैं। यथा ‘सादृश्यादृष्टचिन्ताद्याः
स्मृतिबीजस्य बोधकः’१। सादृश्य, अदृष्ट और चिन्ता आदि स्मृति के बीज
अर्थात् संस्कार के उद्बोधक हैं। जिस पदार्थ को हम पहिले देख चुके हैं उनके
सदृश पदार्थ को देखने पर उसकी स्मृति हो आती है कि ऐसा पदार्थ या व्यक्ति
हमने वहाँ देखा था। यहाँ सादृश्य संस्कार का उद्बोधक होता है। कभी किसी
बात को भूल जाने पर सोचने से उसका स्मरण हो आता है यहाँ चिन्ता या
सोचना संस्कार का उद्बोधक और स्मृति का जनक है। और कभी अदृष्ट वश
१ तर्कभाषा संस्कार प्रकरण।
२ त० भा०

१८ तर्कभाषा [ स्मृतप्रत्यभिज्ञे
विना सादृश्यदर्शन या चिन्ता के भी संस्कार का उद्बोध और स्मृति की उत्पत्ति
हो जाती है। जैसा कि महाकवि और प्रकाण्ड दार्शनिक श्रीहर्ष ने लिखा है—
'अदृष्टमप्यर्थमहदृवैभवात्करोति सुसिर्जनदर्शनातिथिम्” १ ।
स्मृति और प्रत्यभिज्ञा—
ज्ञान का एक भेद और भी है जिसको 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं। प्रत्यभिज्ञा
का लक्षण 'तत्तेदन्तावगाहिनी प्रतीतिः प्रत्यभिज्ञा' यह किया गया है। अर्थात्
'तत्ता, और 'इदन्ता' दोनों को अवगाहन करने वाली प्रतीति 'प्रत्यभिज्ञा'
कहलाती है। तत्ता का अर्थ तद्देश और तत्काल सम्बन्ध अर्थात् पूर्वदेश और
पूर्वकाल सम्बन्ध है। और 'इदन्ता' का अर्थ एतद्देश और एतत्कालसम्बन्ध है।
जिसमें पूर्वदेश पूर्वकाल और वर्तमान देश वर्तमान काल दोनों की प्रतीति हो
उस प्रतीति को प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' यह प्रत्यभिज्ञा का
उदाहरण है। यह वही देवदत्त है जिसे हमने काशी में देखा था। इसमें 'सः'
पद 'तत्ता' अर्थात् पूर्वदेश पूर्वकाल सम्बन्ध का द्योतक और 'अय' पद 'इदन्ता'
अर्थात् एतद्देश एतत्काल सम्बन्ध अर्थात् वर्तमान देश और काल के सम्बन्ध
का बोधक है अर्थात् '

करणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १६
करणम्
किं पुनः करणम् ? साधकतमं करणम् । अतिशयितं साधकं साधकतमं
प्रकृष्टं कारणमित्यर्थः ।
कारणम्
ननु साधकं कारणमिति पर्यायस्तदेव न ज्ञायते किन्तत्कारणमिति ।
उच्यते । यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत्कारणम् ।
यथा तन्तुवेमादिकं पटस्य कारणम् ।
हैं । और इस यथार्थ अनुभव के 'करण' को 'प्रमाण' कहते हैं । इस, यथार्थानु-
भवरूप प्रमा की उत्पत्ति ही प्रमाणरूप करण का साध्य या फल है । यह
बात यहाँ तक कही । प्रमाण के 'प्रमा करणम् प्रमाणं' इस लक्षण में 'प्रमा'
पद आया है उसकी व्याख्या यहाँ तक हो गई, अब लक्षण का दूसरा पद
'करण' रह जाता है । इसलिये आगे 'करण' और उसके प्रसङ्ग से 'कारण'
की व्याख्या करते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर करण किसको कहते हैं ?
[ उत्तर ] साधकतम को करण कहते हैं । अतिशयित साधक अर्थात्
सर्वोत्कृष्ट कारण [ साधकतम होने से करण कहलाता है । ]
[ प्रश्न ] साधक और कारण तो पर्याय वाचक हैं । यही नहीं मालूम है
कि वह कारण क्या है । [ अर्थात् कारण किसको कहते हैं यही जब तक न
मालूम हो तब तक साधकतम अर्थात् प्रकृष्ट कारणरूप करण का ज्ञान नहीं हो
सकता है । अतएव कारण का लक्षण बतलाने की आवश्यकता है । ]
[ उत्तर ] बताते हैं । जिसकी कार्य [ अर्थात् उत्पन्न होने वाले घटादि
पदार्थ ] से पहिले सत्ता निश्चित हो और जो अन्यथासिद्ध न हो उसको कारण
कहते हैं । जैसे तन्तु और वेमा [ अर्थात् कपड़ा बुनने का साधनरूप दण्ड
विशेष ] आदि पट के कारण हैं ।
यह कारण का सामान्य लक्षण किया । इस कारण के लक्षण में 'नियत:'
और 'अनन्यथासिद्धश्च' ये दो विशेषण पद विशेष महत्त्व के हैं । इनको इस
लक्षण में रखने का क्या प्रयोजन है इसके जानने का प्रकार यह है कि उनमें
से एक एक पद को हटा देने से क्या हानि होती है यह देखा जाय । इस प्रकार
के विचार को 'पदकृत्य' कहते हैं । कारण के 'यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतः'
इस लक्षण में यदि 'नियत:' पद न रखा जाय और 'यस्य कार्यात् पूर्वभावः'

१० तर्कभाषा [ कारणलक्षणम्
यद्यपि पटोत्पत्तौ दैवादागतस्य रासभादेः पूर्वभावो विद्यते, तथापि
नासौ नियतः।

केवल इतना लक्षण रखा जाय तो कुम्हार जब घड़ा बनाता है उस समय जो
वस्तुएँ उपस्थित हों वे सभी घट के प्रति कारण कहलाने लगेंगी। जैसे यदि
कोई देखने वाला पुरुष अथवा गर्दभ आदि कोई अन्य प्राणी वहाँ उपस्थित हो
गया है तो घटोत्पत्ति के पूर्व उसकी भी सत्ता होने से उसमें कारण का लक्षण
चला जायगा। अतएव उसके वारण करने के लिए 'नियत:' पद रखा है।
दैवात् आये हुए रासभ [ गदहा ] आदि की पूर्वसत्ता तो है परन्तु वह नियत
नहीं है। अर्थात् जब जब घड़ा बने तब तब रासभ आदि अवश्य उपस्थित
हों यह आवश्यक नहीं है। इसलिए रासभ आदि में कारण का लक्षण नहीं
जायगा। और तन्तु वेमा आदि का पूर्व भाव नियत है अर्थात् जब पट की
उत्पत्ति होगी उसके पूर्व तन्तु वेमादिक की उपस्थिति अवश्य होगी। इसलिए
नियत पूर्व भावी होने से तन्तु वेमादिक पट के कारण कहलाते हैं। परन्तु
रासभादि 'पूर्व भावी' होते हुए भी 'नियत पूर्वभावी' न होने से कारण नहीं
कहलाते हैं। यही बात आगे कहते हैं।

यद्यपि पट की उत्पत्ति [ के समय ] में दैवात् आए हुए रासभ [ गदहा ]
आदि का पूर्वभाव [ हो सकता ] है, फिर भी वह निश्चित् नहीं है। [ अर्थात्
जब जब कपड़ा बने तब तब रासभ की उपस्थिति अवश्य हो यह बात अनिवार्य
नहीं है। इसलिए रासभादि में कारण का लक्षण अतिव्याप्त नहीं होता ]

तन्तु तो पट का कारण है ही। तब जहाँ तन्तु रहेगा वहाँ उसका रूप
भी रहेगा। इसलिए जैसे तन्तु पट के प्रति कारण है। इसी प्रकार नियत
पूर्व भावी होने से तन्तुरूप भी पट के प्रति कारण हो सकता है, यह शङ्का
उत्पन्न होती है। उसका समाधान यह किया है कि तन्तुरूप पट के प्रति नहीं
अपितु पट के रूप के प्रति कारण है, पट के प्रति तो वह 'अन्यथासिद्ध' होने से
कारण नहीं है। क्योंकि कारण के लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' विशेषण भी रखा
गया है। उसका अभिप्राय यह है कि जो नियत पूर्वभावी होने पर 'अन्य-
थासिद्ध' न हो उसको कारण कहते हैं। तन्तुरूप पटरूप के प्रति, तो कारण
है परन्तु पट के प्रति कारण नहीं है। क्योंकि पटरूप के उत्पादन में ही तन्तु
रूप का उपयोग समाप्त हो जाता है। अतः पट के प्रति वह 'अन्यथासिद्ध'
होने से कारण नहीं है। यही आगे कहते हैं—

अनुमान प्रमाण, व्याप्ति, उपमान एवं शब्द प्रमाण निरूपण

कारणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् २१
तन्तुरूपस्य तु नियतः पूर्वभावोऽस्त्येव किन्त्वन्यथासिद्धः पटरूपज-
ननोपक्षीणत्वात्, पटं प्रत्यपि कारणत्वे कल्पनागौरवप्रसङ्गात् ।
तेनानन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम् । अनन्यथासिद्धनियत-
पश्चाद्भावित्वं कार्यत्वम् ।
तन्तुरूप का नियत पूर्वभाव तो है ही, किन्तु वह अन्यथासिद्ध [ होने से पट
के प्रति कारण नहीं हो सकता ] है । पट के रूप के उत्पादन में ही उसकी
[ शक्ति या उपयोगिता की ] समाप्ति हो जाती है । [ इसलिए ] पट के प्रति भी
( तन्तु रूप के ) कारणत्व [ मानने ] में कल्पना गौरव होने लगेगा । [ इसलिए
तन्तुरूप पटरूप के प्रति कारण नहीं है ]
इसलिए 'अन्यथासिद्ध नियत पूर्वभावित्व' [ यह ] कारणत्व [ अर्थात्
कारण का लक्षण ] है । और 'अनन्यथासिद्ध नियतपश्चाद्भावित्व' [ ही ] कार्यत्व
[ अर्थात् कार्य का लक्षण ] है ।
कारण के इस लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' पद विशेष महत्त्व का है ।
इसलिए उसको विशेष रूप से समझ लेना उपयोगी होगा । श्री विश्वनाथ ने
न्याय मुक्तावली में पाँच प्रकार के अन्यथासिद्ध प्रतिपादित किए हैं—
येन१ सह पूर्वभावः कारणमादाय वा यस्य ।
अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम् ॥
जनकं प्रति पूर्ववृत्तितामपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते ।
अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावश्यकपूर्वभाविनः ॥
एते पञ्चान्यथासिद्धा दण्डत्वादिकमादिमम् ।
घटादौ दण्डरूपादि द्वितीयमपि दर्शितम् ॥
तृतीयन्तु भवेद्व्योम, कुलालजनकोऽपरः ।
पञ्चमो रासभादिः स्यादेतेष्वावश्यकस्त्वसौ ॥
१ 'येन सह पूर्वभावो' जिस धर्म के सहित कारण का कार्य के प्रति पूर्वभाव
गृहीत होता है वह धर्म कार्य के प्रति अन्यथासिद्ध होता है । यह प्रथम
अन्यथासिद्ध का लक्षण है । जैसे—दण्ड घट का कारण है । उसकी कारणता
दण्डत्व धर्म विशिष्ट दण्ड में गृहीत होती है । अतएव दण्डत्व के साथ
पूर्वभाव गृहीत होने से दण्डत्व घट के प्रति प्रथम प्रकार का अन्यथासिद्ध है।
२ 'कारणमादाय वा यस्य' यह द्वितीय अन्यथासिद्ध का लक्षण है । इसका
अभिप्राय यह है कि जिसका कार्य के साथ स्वतन्त्र रूप से अन्वय व्यतिरेक न
१ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली १९, २२ ।

२२ तर्कभाषा [ अन्यथासिद्धाः
हो, अपितु अपने कारण के द्वारा अन्वय व्यतिरेक हो वह अन्यथा सिद्ध
कहाता है। जैसे—घट के प्रति दण्डरूप का स्वतः अन्वय व्यतिरेक नहीं
है अपितु अपने कारण दण्ड के द्वारा अन्वय व्यतिरेक होता है। इसलिए
दण्डरूप घट के प्रति अन्यथासिद्ध है। यह अन्यथासिद्ध का दूसरा भेद हुआ।
३ 'अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम्' । यह तृतीय अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका अभिप्राय यह है कि किसी अन्य के प्रति पूर्वभाव
ज्ञात होने पर ही जिसका कार्य के प्रति पूर्वभाव गृहीत हो सके वह तृतीय
अन्यथासिद्ध होता है। जैसे—आकाश घट के प्रति अन्यथासिद्ध है। आकाश
प्रत्यक्ष नहीं है। उसकी सिद्धि शब्द के समवायि कारण के रूप में अनुमान
द्वारा ही होती है। इसलिए अन्य अर्थात् शब्द के प्रति पूर्वभाव अर्थात्
कारण के रूप में आकाश में सिद्ध होने पर ही उसकी घट के प्रति पूर्व-
वृत्तिता सम्भव हो सकती है। इसलिए आकाश, घटादि के प्रति तृतीय
प्रकार का अन्यथासिद्ध है।
४ 'जनकं प्रति पूर्ववृत्तित्वमपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते' । यह चतुर्थ अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका आशय यह है कि कारण का जो कारण है वह
चतुर्थ अन्यथासिद्ध होता है। जनक अर्थात् कारण के प्रति पूर्ववृत्तिता
अर्थात् कारणत्व के बिना जिसकी कार्य के प्रति पूर्ववृत्तिता गृहीत न हो।
अर्थात् जो कारण का कारण है वह चतुर्थ अन्यथासिद्ध कहलाता है। जैसे
कुम्भकार का पिता घट के प्रति अन्यथासिद्ध है।
५ 'अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावेक्षकपूर्वभाविनः' । यह पञ्चम अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका भाव यह है कि नियतावश्यक पूर्वभावी से अतिरिक्त
जो कुछ भी है वह सब पञ्चम अन्यथासिद्ध है। जैसे पटोत्पत्ति के प्रति
दैवादागत रासभ । 'अनन्यथासिद्धिनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' इस कारण
लक्षण की व्याख्या करते समय नियत पद का प्रयोजन रासभ में अतिव्याप्ति
वारण दिखाया था। वह रासभ पञ्चम प्रकार का अन्यथा सिद्ध कहलाता है।
इस प्रकार 'मुक्तावलीकार ने पाँच प्रकार के' 'अन्यथासिद्ध' दिखलाये हैं।
परन्तु इन सबों में 'पञ्चम' अन्यथासिद्ध ही सबसे मुख्य है। इसी लिये मुक्तावलीकार
ने 'एतेष्वावश्यकस्त्वसौ' लिखकर उसकी महत्ता को सूचित किया है। इसी कारण
तर्कभाषाकार ने इस पञ्चम अन्यथासिद्ध को उसके महत्त्वको ध्यान में रखते हुए,
अन्य 'अन्यथासिद्धों' से अलग विशेषरूप से नियतपद से सूचित किया। अन्यथा
'अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' इतना ही कारण का लक्षण किया जा सकता

लक्षणान्तरखण्डनम् ] प्रमाणनिरूपणम् २३
यत्तु कश्चिदाह कार्यानुकूतान्वयव्यतिरेकि कारणमिति, तदयुक्तम् ।
नित्यविभूनां व्योमादीनां कालतो देशतश्च व्यतिरेकासम्भवेनाकारणत्व-
प्रसङ्गात् ।
था । उस लक्षण में नियत पद के रखने की आवश्यकता न थी । क्योंकि उसका
काम अनन्यथासिद्ध पद से ही पूरा हो जाता । परन्तु उसके इस विशेष महत्त्व
के कारण ही कारण के लक्षण में उसका समावेश किया गया है ।
इस शैली का अवलम्बन भाष्यकार वात्स्यायन ने भी न्यायदर्शन के प्रथम
सूत्र की व्याख्या में किया है । न्याय के षोडश पदार्थों में से संशय दृष्टान्त
आदि पदार्थों का अन्तर्भाव प्रमेय पदार्थ में ही हो सकता है । परन्तु न्यायशास्त्र
की दृष्टि से उनका विशेष महत्त्व होने से सूत्रकार ने उसका पृथक् परिगणन
किया है । भाष्यकार का लेख इस प्रकार है:—
'तत्र संशयादीनां पृथग्वचनमनर्थकं, संशयादयो हि यथासम्भवं प्रमाणेषु
प्रमेयेषु चान्तर्भवन्तो न व्यतिरिच्यन्ते इति ।
'सत्यमेतत्, इमास्तु चतस्रो विद्याः पृथक्प्रस्थानाः प्राणभृतामनुग्रहायोपदि-
श्यन्ते । यासां चतुर्थीयमान्वीक्षिकी न्यायविद्या । तस्याः, पृथक्प्रस्थानाः
संशयादयः पदार्थाः । तेषां पृथग्वचनमन्तरेणाध्यात्मविद्यामात्रमियं स्यात् ,
यथोपनिषदः । तस्मात् संशयादिभिः पदार्थैः पृथक् प्रस्थाप्यते'१
इन पाँच प्रकार के अन्यथासिद्धों में तृतीय अन्यथासिद्ध का उदाहरण
आकाश को बताया है । 'तृतीयन्तु भवेद् व्योम' । परन्तु यह उदाहरण ठीक
नहीं है क्योंकि आकाश को कार्यमात्र के प्रति साधारण कारण माना गया है ।
जैसा कि मूल ग्रन्थ की अगली ही पङ्क्ति में आता है । इसलिए आकाश को
अन्यथासिद्ध का उदाहरण न बनाकर उसका कोई अन्य ही उदाहरण देना
चाहिए था । मुक्तावलीकार का 'तृतीयं तु भवेद् व्योम' लिखकर आकाश को
अन्यथासिद्ध बताना उचित नहीं है, क्योंकि आकाश को अन्यथासिद्ध मान
लेने पर ग्रन्थ की अगली पंक्ति का समन्वय नहीं हो सकेगा ।
और जो किसी ने कहा है कि 'कार्यानुकूतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण
का लक्षण है वह अयुक्त है । क्योंकि वैसा कहने पर नित्य और विभु आकाश
काल आदि पदार्थों का किसी काल या देश में व्यतिरेक [अभाव] सम्भव न होने
१. न्याय वा० भा० १, १, १ ।

२४ तर्कभाषा [ लक्षणान्तरखण्डनम्
से उनका अकारणत्व प्राप्त होने लगेगा । [अर्थात् 'यदि कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि
कारणम्' यह कारण का लक्षण किया जायगा तो नित्य और सर्वव्यापक आकाश
आदि पदार्थों का किसी देश या किसी काल में अभाव सम्भव न होने से उनमें
कारण का यह लक्षण नहीं जा सकेगा । इसलिए अव्याप्तिदोष ग्रस्त हो जाने से
यह लक्षण ठीक नहीं है । ]
मीमांसक आदि 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण का
लक्षण करते हैं । इस लक्षण का अभिप्राय यह है कि 'कार्येण अनुकृतौ अन्वय-
व्यतिरेकौ यस्य तत्कारणम्' अर्थात् कार्य जिसके अन्वय और व्यतिरेक का
अनुसरण करता है उसको कारण कहते हैं । इसमें अन्वय और व्यतिरेक का
लक्षण 'तत्सत्त्वे तत्सत्ता अन्वयः' और 'तदभावे तदभावो व्यतिरेकः' किया
जाता है । साधारणतः कारणता का निर्णय अन्वयव्यतिरेक से ही होता है ।
जैसे अग्नि दाह के प्रति कारण है यह बात अन्वयव्यतिरेक से ही सिद्ध होती
है । अग्नि और दाह का अन्वयव्यतिरेक इस प्रकार होगा—'अग्निसत्त्वे दाहसत्ता'
अर्थात् अग्नि के होने पर दाह होता है यह अन्वय हुआ और 'अग्न्य-
भावे दाहाभावः' अग्नि के अभाव में दाह का अभाव होता है यह व्यतिरेक
हुआ । इन दोनों के होने से ही अग्निदाह के प्रति कारण सिद्ध होता है ।
इसी आधार पर कुछ लोग 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण
का लक्षण करते हैं ।
नैयायिकों का सिद्धान्त पक्ष यह है कि 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्'
यह कारण का लक्षण ठीक नहीं है, क्योंकि आकाश काल आदि जो नित्य और
विभु पदार्थ हैं उनमें कारण का यह लक्षण सम्भव न होगा । आकाश, काल
आदि पदार्थ नित्य हैं अतएव किसी काल में उनका अभाव नहीं मिलेगा। और वे
विभु अर्थात् सर्वत्र व्यापक हैं अतएव किसी देश में उनका अभाव नहीं मिलेगा।
इसलिए यद्यपि 'आकाशसत्त्वे घटसत्ता' यह अन्वय तो बन जायगा परन्तु
'आकाशाभावे घटाभावः' यह व्यतिरेक नहीं बन सकेगा । क्योंकि आकाश के
नित्य होने से किसी काल में और विभु होने से किसी देश में उसका अभाव
नहीं मिलेगा । इसी प्रकार 'कालसत्त्वे घटसत्ता' यह अन्वय तो बन जायगा
परन्तु 'कालाभावे घटाभावः' यह व्यतिरेक नहीं मिल सकेगा । इसलिए अन्वय
बन जाने पर भी व्यतिरेक के असम्भव होने से कारण यह लक्षण आकाश
काल आदि नित्य विभु पदार्थों में नहीं घट सकेगा । अतः अव्याप्ति दोषग्रस्त
होने से यह कारण का लक्षण ठीक नहीं है ।

समवायिकारणम् ] प्रमाणनिरूपणम् २५
तच्च कारणं त्रिविधम् । समवायि-असमवायि-निमित्त-भेदात् । तत्र यत्स-
मवेतं कार्यमुत्पद्यते तत्समवायिकारणम् । यथा तन्तवः पटस्य समवायिका-
रणम् । यतस्तन्तुष्वेव पटः समवेतो जायते, न तुर्यादिषु ।
आकाश काल आदि को कार्यमात्र के प्रति साधारण कारण माना गया है ।
यद्यपि तर्कभाषाकारने कारण के समवायिकारण, असमवायि कारण और निमित्त
कारण ये तीन ही भेद किए है । परन्तु वाक्यवृत्ति में प्रकारान्तर से साधारण
कारण और असाधारण कारण ये दो भेद भी किए हैं । उनमें से १ ईश्वर
तथा उसके २ ज्ञान, ३ इच्छा तथा ४ कृति, ५ प्रागभाव, ६ आकाश, ७ काल,
८ दिक् इन आठों को कार्य मात्र के प्रति साधारण कारण माना है । और
कहीं-कहीं प्रतिबन्धकसंसर्गाभाव को भी कार्यमात्र के प्रति साधारण कारण माना
गया है । इस प्रकार ९ साधारण कारण होते हैं ।
योगदर्शन के व्यास भाष्य में भी उत्पत्तिकारण और स्थितिकारण आदि
भेद से नौ प्रकार के कारणों का वर्णन करते हुए यह लिखा है :—
‘उत्पत्तिस्थित्यभिव्यक्तिविकारप्रत्ययाप्तयः ।
वियोगान्यत्वधृतयः कारणं नवधा स्मृतम् ॥’
नित्य और विभु पदार्थों को कारण मानने का सिद्धान्त श्री उदयनाचार्य
ने भी अपनी न्यायकुसुमाञ्जलि में प्रतिपादित किया है और कारण का ‘अन-
न्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम्’ यही लक्षण माना है ।
‘पूर्वभावो हि हेतुत्वं मीयते येन केनचित् ।
व्यापकस्यापि नित्यस्य धर्मिंधीरन्यथा न हि ॥’
इस प्रकार नित्य और विभु आकाश आदि, कार्यमात्र के प्रति साधारण
कारण हैं । इस लिए न्यायमुक्तावलीकार श्री विश्वनाथ ने जो आकाश को तृतीय
अन्यथा सिद्ध का उदाहरण बना दिया है वह उचित नहीं हुआ है। इसी प्रकार
आकाशादि में अव्याप्त होने के कारण ‘कार्यानुकूलान्वयव्यतिरेकि कारणम्’ यह
कारण का लक्षण भी ठीक नहीं है ।
और वह कारण १ समवायि कारण, २ असमवायि कारण और ३ निमित्त
कारण इस भेद से तीन प्रकार का होता है ।
उसमें से जिसमें समवाय सम्बन्ध से कार्य उत्पन्न होता है उसको ‘समवायि-
कारण’ कहते हैं । जैसे—तन्तु पट के समवायि कारण हैं । क्योंकि तन्तुओं में
ही समवाय सम्बन्ध से पट पैदा होता है । तुरी आदि में नहीं ।
१ योग० २, २८ । २ न्यायकुसुमाञ्जलिः ४, १, १९ ।

२६ तर्कभाषा [ अयुतसिद्धौ
ननु तन्तुसम्बन्ध इव तुर्यादिसम्बन्धोऽपि पटस्य विद्यते, तत्कथं
तन्तुष्वेव पटः समवेतो जायते न, तुर्यादिषु ?
सत्यम् । द्विविधः सम्बन्धः संयोगः समवायश्चेति । तत्रायुतसिद्धयोः
सम्बन्धः समवायः । अन्ययोस्तु संयोग एव ।
कौ पुनरयुतसिद्धौ ? ययोर्मध्ये एकमविनश्यदपराश्रितमेवावतिष्ठते
तावयुतसिद्धौ ।
इसका अभिप्राय यह है कि पट की उत्पत्ति के प्रति 'तुरी' 'तन्तु' 'वेमा'
आदि अनेक कारण हैं । परन्तु उनमें से समवायि कारण केवल तन्तु ही हैं,
'तुरी' 'वेमा' आदि पट के समवायि कारण नहीं अपितु निमित्त कारण होते हैं ।
पट के प्रति तुरी, तन्तु, वेमादिक की इसी कारणता का वर्णन महाकवि श्रीहर्ष
ने अपने नैषधीय चरित नामक महाकाव्य में बड़ी सुन्दरता से इस प्रकार
किया है—
'सितांशुवर्णैर्वयति स्म तद्गुणैर्महासिनेम्नः सहकृत्वरी बहुम् ।
दिगङ्गनाङ्गावरणं रणाङ्गणे यशः पट तद्भटचातुरी तुरी' ॥
अर्थात्, रणभूमि के प्राङ्गण में महान् असिरूप वेमा की सहकारिणी
नल के सैनिकों की चातुरीरूप तुरी, उसके शुभ्र वर्ण के शौर्यादि गुणरूप तन्तुओं
से दिगङ्गना के आवरण के लिए कीर्तिरूप पट को बुन रही थी । इस समस्त
वस्तु विषयक साङ्गरूपक द्वारा कवि ने इस कार्य कारण भाव को प्रदर्शित
किया है ।
[ प्रश्न ] तन्तु [ के साथ ] सम्बन्ध के समान तुरी आदि के साथ भी
पट का सम्बन्ध है तब फिर क्यों तन्तुओं में ही समवाय सम्बन्ध से पट उत्पन्न
होता है और तुरी आदि में नहीं ।
[ उत्तर ] ठीक है । [ पट का तुरी और तन्तु दोनों के साथ सम्बन्ध अवश्य
है ] परन्तु सम्बन्ध दो प्रकार का होता है [ एक ] संयोग और [ दूसरा ] समवाय ।
उनमें से दो अयुतसिद्ध [ पदार्थों ] का सम्बन्ध समवाय [ होता है ] और अन्यों
का तो संयोग [ सम्बन्ध ] ही [ होता है, समवाय नहीं । इनमें से तन्तु और पट
अयुतसिद्ध हैं इसलिए उनका सम्बन्ध समवाय है और तुरी पट अयुतसिद्ध नहीं
हैं । इसलिए उनका संयोग सम्बन्ध है । अतः तन्तु पट के समवायि कारण हैं
और तुरी पट का समवायि कारण नहीं अपितु निमित्त कारण मात्र है ]
[ प्रश्न ] किन दो को अयुतसिद्ध कहते हैं ?
[ उत्तर ] जिन दो में से एक अविनश्यदवस्था में दूसरे के आश्रित ही रहता
है वे दोनों ही [ परस्पर ] अयुतसिद्ध [ कहलाते ] हैं ।
१ नैषध० १, १२ ।

विशेषलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् २७
इसका आशय यह हुआ कि जिन दो पदार्थों में से कोई एक पदार्थ
दूसरे के आश्रित ही रहता है अर्थात् जिनको एक दूसरे से अलग करके नहीं
देखा जा सकता है वे दोनों परस्पर अयुतसिद्ध कहलाते हैं। और उनका
परस्पर समवाय सम्बन्ध होता है। जैसे १ मेज और मेज का रूप, इन दोनों
को अलग नहीं किया जा सकता है। इसलिए वे दोनों अयुतसिद्ध हैं। इनमें
मेज गुणी है और रूप उसका गुण । इसलिए यह कहा जा सकता है कि गुण
को गुणी से अलग नहीं किया जा सकता है। अतएव 'गुण और गुणी परस्पर
अयुतसिद्ध' हैं। और उनका सम्बन्ध समवाय कहलाता है। इसी प्रकार २
'अवयव' और 'अवयवी' अर्थात् तन्तु और पट को अलग नहीं किया जा सकता
है। अतएव दोनों अयुतसिद्ध हैं और उनका भी समवाय सम्बन्ध ही होता
है। इसी प्रकार ३ 'क्रिया और क्रियावान्' जैसे क्रियावान् गेंद में लुढ़कने की
क्रिया रहती है उस क्रिया को गेंद से अलग नहीं किया जा सकता है। अतएव
क्रिया और क्रियावान् अयुतसिद्ध हैं और उनका समवाय सम्बन्ध होता है।
४ 'जाति और व्यक्ति' में व्यक्तिरूप अश्वादि में रहने वाली अश्वत्व आदि जाति
को अश्व से अलग नहीं किया जा सकता है अतएव जाति और व्यक्ति भी
अयुतसिद्ध हैं और उनका सम्बन्ध समवाय कहा जाता है। इसी प्रकार ५
परमाणु आदि 'नित्य पदार्थ' और उनमें रहने वाला अन्तिम भेदक धर्म जिसको
'विशेष' कहते हैं ये दोनों भी अयुतसिद्ध हैं क्योंकि 'विशेष' को 'नित्य द्रव्य'
परमाणु आदि से अलग नहीं किया जा सकता है। अतएव 'नित्य द्रव्य और
विशेष' दोनों का सम्बन्ध भी समवाय कहलाता है।
इस प्रकार १ 'अवयव अवयवी' २ 'गुण गुणी' ३ 'क्रिया क्रियावान्' ४
'जाति व्यक्ति' और ५ 'नित्यद्रव्य तथा विशेष' इन पाँचों को अयुतसिद्ध में
परिगणित किया जाता है और उनका सम्बन्ध समवाय कहलाता है। इन में
से अन्तिम 'नित्यद्रव्य और विशेष' में से 'विशेष' पदार्थ के कुछ स्पष्टीकरण
की आवश्यकता है।
घटत्व पटत्व आदि एक-एक जाति के अनेक पदार्थ मिलते हैं। जैसे-घटत्व
जाति के दस घट व्यक्ति उपस्थित होते हैं। उन सब विभिन्न व्यक्तियों में घटः,
घटः, इस प्रकार की अनुगत प्रतीति अर्थात् एकाकार प्रतीति होती है। इस
एकाकार प्रतीति का कारण घटत्वादि सामान्य है उसी को 'जाति' कहते हैं।
जहाँ जाति अर्थात् घटत्वादि सामान्य के कारण दस घट व्यक्तियों में 'अयं घटः'
'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती वहाँ उसके साथ ही दस घट
व्यक्तियों का परस्पर भेद भी प्रतीत होता है। इस भेदप्रतीति का भी कोई

२८ तर्कभाषा [ विशेषलक्षणम्
कारण होना चाहिए । इसलिए एक घड़ा दूसरे घड़े से क्यों भिन्न है यह प्रश्न
हो सकता है । इस प्रश्न का उत्तर उसके कारण भेद अर्थात् अवयव भेद के
आधार पर यह दिया जा सकता है कि दोनों घड़े अलग-अलग अवयवों से बने
हैं इसलिए भिन्न हैं । घट के अवयवों को कपाल कहते हैं । अर्थात् दोनों घड़ों
के कपाल भिन्न हैं इसलिए दोनों घड़े भी भिन्न हैं । फिर कपालों के विषय में
भी यही प्रश्न उत्पन्न होगा कि वह कपाल एक दूसरे से क्यों भिन्न है । इसका
उत्तर भी अवयव भेद के आधार पर दिया जा सकता है कि उन दोनों कपालों
के अवयव अर्थात् कपालिकाएँ भिन्न हैं अतएव उन भिन्न कपालिकाओं से बने
कपाल भिन्न हैं । इसके बाद जब कपालिकाओं के विषय में यही प्रश्न होगा तो
वहाँ भी अवयव भेद की पद्धति से काम चल जायगा । अर्थात् कपालिकाएँ
क्यों भिन्न हैं इस प्रश्न का उत्तर यह दिया जा सकता है कि उनका निर्माण
भिन्न अवयवों अर्थात् भिन्न-भिन्न क्षुद्र कपालिकाओं से हुआ है अतएव
कपालिकाएँ परस्पर भिन्न हैं । इस प्रक्रिया से घट का विश्लेषण करते-करते हम
द्वयणुक तक पहुँचते हैं । तब द्वयणुक के विषय में भी यही प्रश्न होता है कि
दो द्वयणुकों में परस्पर भेद क्यों है । इसका उत्तर भी वही होगा कि उनके
अवयव अर्थात् परमाणु भिन्न हैं इसलिए भिन्न परमाणुओं से बने हुए द्वयणुक
भिन्न हैं । अब यही प्रश्न परमाणु के विषय में उपस्थित होता है कि वे दो
परमाणु जो एक दूसरे से भिन्न हैं उसका क्या कारण है । यहाँ अब तक दिए
हुए अवयव भेद वाले उत्तर से काम नहीं चलेगा क्योंकि परमाणु के अवयव
नहीं होते । स्थूल पदार्थ का विश्लेषण करते-करते जो सबसे छोटा अन्तिम
अवयव है उसको ही परमाणु कहते हैं । उसके आगे और अवयव विभाग नहीं
हो सकता है । इसलिए परमाणु के अवयव नहीं होते अपितु परमाणु नित्य
है । तब इन परमाणुओं में परस्पर भेद के लिए वैशेषिक दर्शन में 'विशेष'
नामक एक पदार्थ की कल्पना की गई है । इसी 'विशेष' नामक पदार्थ के
प्रतिपादन के आधार पर इस दर्शन को 'वैशेषिक' दर्शन कहते हैं । एक
परमाणु दूसरे परमाणु से भिन्न इसलिए है कि उनमें रहने वाला 'विशेष' भिन्न-
भिन्न है । और विशेष का स्वरूप ही 'स्वतो व्यावृत्त' माना गया है । इस
प्रकार नित्य द्रव्य परमाणु आदि में रहने वाला अन्तिम भेदक धर्म 'विशेष'
कहा जाता है । हर परमाणु में रहने वाला विशेष एक दूसरे से भिन्न और
स्वतो व्यावृत्त ही है इसलिए उसके आगे और कोई भेदक धर्म नहीं है ।
विशेष अन्तिम भेदक धर्म है और वह नित्य द्रव्य परमाणु आदि में रहता है ।
परन्तु जैसे जाति को व्यक्ति से या गुण को गुणी से अलग नहीं किया जा

अयुतसिद्धौ ] प्रमाणनिरूपणम् २६
सकता है इसी प्रकार विशेष को नित्य द्रव्य परमाणु आदि से अलग नहीं
किया जा सकता है इसलिए नित्य द्रव्य और विशेष ये दोनों अयुत सिद्ध कहे
जाते हैं और उनका सम्बन्ध समवाय कहा जाता है।
इस प्रकार ‘ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ विज्ञातव्यौ’
अर्थात् जिन दो में से कोई एक, दूसरे के आश्रित ही रहे उससे अलग न किया
जा सके उन दोनों को अयुतसिद्ध कहते हैं। इसी लिए १ अवयव अवयवी’,
२ ‘गुण गुणी’, ३ ‘क्रिया क्रियावान्’, ४ ‘जाति व्यक्ति’ और ५ ‘नित्यद्रव्य
तथा विशेष’ ये पांच अयुतसिद्ध माने गए हैं। यहां तक अयुतसिद्ध के लक्षण
का स्पष्टीकरण हो गया। परन्तु लक्षण में ‘अविनश्यत्’ पद भी दिया हुआ
है। अयुतसिद्ध के लक्षण में इस ‘अविनश्यत्’ पद के रखने का क्या प्रयोजन
है इसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। यदि इस लक्षण में ‘अविनश्यत्’ पद
न रखा जाय तो इस लक्षण में अव्याप्ति दोष आ जायगा। ‘लक्ष्यैकदेशावृत्ति-
त्वमव्याप्तिः’ जो लक्षण लक्ष्य के एक देश में न जावे उसे अव्याप्ति दोष ग्रस्त
कहा जाता है। यदि ‘अयुतसिद्ध’ के इस लक्षण में से ‘अविनश्यत्’ पद को
हटा कर केवल ‘ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ’ इतना ही
लक्षण किया जाय तो अयुतसिद्ध के जो पांच भेद अभी प्रदर्शित किए हैं उनमें
से पहिले तीनों में यह लक्षण नहीं जा सकेगा। क्योंकि गुण आदि सदा गुणी
आदि के आश्रित ही नहीं रहते हैं अपितु एक समय ऐसा भी आता है जब
कि गुण, क्रिया, तथा अवयवी ये सब निराश्रित भी हो जाते हैं। इसलिए
‘एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते’ यह लक्षण उनमें नहीं घट सकता है। जाति और
व्यक्ति में भी जाति के नित्य होने पर भी व्यक्ति के अनित्य होने से व्यक्ति का
नाश होने पर जाति के निराश्रय हो जाने की सम्भावना है। केवल नित्य
द्रव्य और विशेष इन में दोनों के नित्य होने से अयुतसिद्ध का लक्षण घट
सकेगा। शेष चार में अव्याप्त हो जायगा फलतः लक्ष्यैकदेश में अवृत्ति होने
से यह लक्षण अव्याप्त हो जायगा। उसका वारण करने के लिए लक्षण में
‘अविनश्यत्’ पद का प्रयोग आवश्यक है।
घटरूप का कारण घट है इसी प्रकार घट में रहने वाली क्रिया का कारण
भी घट है। इन गुण तथा क्रिया के नाश के अन्य प्रकारों से अतिरिक्त एक
प्रकार यह भी है कि कारण के नाश से कार्य का नाश होता है। अर्थात् घट
के नाश से घटगत रूप तथा क्रिया आदि का नाश होता है। इस दशा में घट
का नाश कारण है, और रूपादि गुण तथा क्रिया का नाश कार्य होगा। कारण
और कार्य में पौर्वापर्य का होना आवश्यक है। अतएव पहिले घट का नाश

३० तर्कभाषा [ अयुतसिद्धौ
तदुक्तम्— तावेवायुतसिद्धौ द्वौ विज्ञातव्यौ ययोर्द्वयोः ॥
अनश्यदेकमपराश्रितमेवावतिष्ठते ॥
होगा तब उसके बाद घटगत रूप अथवा क्रिया का नाश होगा। इसलिए
घटनाश और घटगत रूपादि गुण तथा क्रिया के विनाश में कम से कम एक
क्षण का अन्तर अवश्य होगा। यह जो एक क्षण का काल है वही गुण तथा
क्रिया का 'विनश्यत्ताकाल' है और उस काल में गुण तथा क्रियादि निराश्रय हो
जाते हैं। जब घट का नाश हो गया और घटगत रूपादि गुण अथवा क्रिया
का नाश अगले क्षण में होना है तब उस एक क्षण में रूपादि का कोई आश्रय
नहीं है क्योंकि उनका आश्रय भूत घट पहिले क्षण में नष्ट हो चुका है। इस
लिए इस क्षण में रूपादि गुण निराश्रित हो जाते हैं। इस क्षण के अगले क्षण
में रूपादि गुणों का भी नाश हो जाता है। यह क्षण उनके नाश के अव्यवहित
पूर्व का क्षण है। विनाश से अव्यहित पूर्व का क्षण ही उसका 'विनश्यत्त
काल' कहा जाता है। 'विनश्यत्ता' का अर्थ 'विनाश कारणसामग्री सान्निध्य'
है। अर्थात् जिस क्षण में विनाश के समग्र कारण उपस्थित हो जायं वही
'विनश्यत्ता काल' है। उस विनाश कारण सामग्री के एकत्र हो जाने पर अगले
क्षण में कार्य का विनाश अवश्य हो जायगा। आश्रयभूत घटादि का नाश ही
रूपादि के विनाश की सामग्री का सान्निध्य है। इसलिए इस 'विनश्यत्ता काल'
में रूपादि निराश्रय भी रहते हैं। अतएव यदि 'ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवा-
वतिष्ठते तावेवायुतसिद्धौ विज्ञातव्यौ' यही अयुतसिद्ध का लक्षण रखा जाय तो
'गुण गुणी' 'क्रिया क्रियावान्' और 'अवयव अवयवी' में यह लक्षण नहीं घट
सकेगा क्योंकि गुणादि अपराश्रित ही नहीं अपितु विनश्यत्ता काल में निराश्रित
भी रहते हैं। इस दोष के निवारण के लिए ही अयुतसिद्ध के लक्षण में
'अविनश्यत्' पद का समावेश किया गया है। इसका प्रयोजन यह हुआ कि
अविनश्यदवस्था में जो पराश्रित ही रहे उसको अयुतसिद्ध कहेंगे 'विनश्यत्ता
काल' में पराश्रित होना आवश्यक नहीं है। उस काल में निराश्रित भी रह
सकता है। इस प्रकार 'अयुतसिद्ध' के लक्षण में 'अविनश्यत्' पद का समावेश
कर देने से उक्त दोष का परिहार हो जाता है। गुण क्रिया आदि 'विनश्यत्ता
काल, में निराश्रित रहते हैं परन्तु अविनश्यत्ता काल में तो अपराश्रित ही रहते
हैं। इसलिए उनमें लक्षण का समन्वय हो जाता है। इसी बात को ग्रन्थकार
प्रतिपादित करते हैं:—
इसी से कहा है:—
उन हीं दो को अयुतसिद्ध समझना चाहिए जिन दोनों में से एक अविनश्यदवस्था
में दूसरे के आश्रित ही रहता है।