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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 330 में से

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पृष्ठ 92

विशेषलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् २७
इसका आशय यह हुआ कि जिन दो पदार्थों में से कोई एक पदार्थ
दूसरे के आश्रित ही रहता है अर्थात् जिनको एक दूसरे से अलग करके नहीं
देखा जा सकता है वे दोनों परस्पर अयुतसिद्ध कहलाते हैं। और उनका
परस्पर समवाय सम्बन्ध होता है। जैसे १ मेज और मेज का रूप, इन दोनों
को अलग नहीं किया जा सकता है। इसलिए वे दोनों अयुतसिद्ध हैं। इनमें
मेज गुणी है और रूप उसका गुण । इसलिए यह कहा जा सकता है कि गुण
को गुणी से अलग नहीं किया जा सकता है। अतएव 'गुण और गुणी परस्पर
अयुतसिद्ध' हैं। और उनका सम्बन्ध समवाय कहलाता है। इसी प्रकार २
'अवयव' और 'अवयवी' अर्थात् तन्तु और पट को अलग नहीं किया जा सकता
है। अतएव दोनों अयुतसिद्ध हैं और उनका भी समवाय सम्बन्ध ही होता
है। इसी प्रकार ३ 'क्रिया और क्रियावान्' जैसे क्रियावान् गेंद में लुढ़कने की
क्रिया रहती है उस क्रिया को गेंद से अलग नहीं किया जा सकता है। अतएव
क्रिया और क्रियावान् अयुतसिद्ध हैं और उनका समवाय सम्बन्ध होता है।
४ 'जाति और व्यक्ति' में व्यक्तिरूप अश्वादि में रहने वाली अश्वत्व आदि जाति
को अश्व से अलग नहीं किया जा सकता है अतएव जाति और व्यक्ति भी
अयुतसिद्ध हैं और उनका सम्बन्ध समवाय कहा जाता है। इसी प्रकार ५
परमाणु आदि 'नित्य पदार्थ' और उनमें रहने वाला अन्तिम भेदक धर्म जिसको
'विशेष' कहते हैं ये दोनों भी अयुतसिद्ध हैं क्योंकि 'विशेष' को 'नित्य द्रव्य'
परमाणु आदि से अलग नहीं किया जा सकता है। अतएव 'नित्य द्रव्य और
विशेष' दोनों का सम्बन्ध भी समवाय कहलाता है।
इस प्रकार १ 'अवयव अवयवी' २ 'गुण गुणी' ३ 'क्रिया क्रियावान्' ४
'जाति व्यक्ति' और ५ 'नित्यद्रव्य तथा विशेष' इन पाँचों को अयुतसिद्ध में
परिगणित किया जाता है और उनका सम्बन्ध समवाय कहलाता है। इन में
से अन्तिम 'नित्यद्रव्य और विशेष' में से 'विशेष' पदार्थ के कुछ स्पष्टीकरण
की आवश्यकता है।
घटत्व पटत्व आदि एक-एक जाति के अनेक पदार्थ मिलते हैं। जैसे-घटत्व
जाति के दस घट व्यक्ति उपस्थित होते हैं। उन सब विभिन्न व्यक्तियों में घटः,
घटः, इस प्रकार की अनुगत प्रतीति अर्थात् एकाकार प्रतीति होती है। इस
एकाकार प्रतीति का कारण घटत्वादि सामान्य है उसी को 'जाति' कहते हैं।
जहाँ जाति अर्थात् घटत्वादि सामान्य के कारण दस घट व्यक्तियों में 'अयं घटः'
'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती वहाँ उसके साथ ही दस घट
व्यक्तियों का परस्पर भेद भी प्रतीत होता है। इस भेदप्रतीति का भी कोई