तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १६
करणम्
किं पुनः करणम् ? साधकतमं करणम् । अतिशयितं साधकं साधकतमं
प्रकृष्टं कारणमित्यर्थः ।
कारणम्
ननु साधकं कारणमिति पर्यायस्तदेव न ज्ञायते किन्तत्कारणमिति ।
उच्यते । यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत्कारणम् ।
यथा तन्तुवेमादिकं पटस्य कारणम् ।
हैं । और इस यथार्थ अनुभव के 'करण' को 'प्रमाण' कहते हैं । इस, यथार्थानु-
भवरूप प्रमा की उत्पत्ति ही प्रमाणरूप करण का साध्य या फल है । यह
बात यहाँ तक कही । प्रमाण के 'प्रमा करणम् प्रमाणं' इस लक्षण में 'प्रमा'
पद आया है उसकी व्याख्या यहाँ तक हो गई, अब लक्षण का दूसरा पद
'करण' रह जाता है । इसलिये आगे 'करण' और उसके प्रसङ्ग से 'कारण'
की व्याख्या करते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर करण किसको कहते हैं ?
[ उत्तर ] साधकतम को करण कहते हैं । अतिशयित साधक अर्थात्
सर्वोत्कृष्ट कारण [ साधकतम होने से करण कहलाता है । ]
[ प्रश्न ] साधक और कारण तो पर्याय वाचक हैं । यही नहीं मालूम है
कि वह कारण क्या है । [ अर्थात् कारण किसको कहते हैं यही जब तक न
मालूम हो तब तक साधकतम अर्थात् प्रकृष्ट कारणरूप करण का ज्ञान नहीं हो
सकता है । अतएव कारण का लक्षण बतलाने की आवश्यकता है । ]
[ उत्तर ] बताते हैं । जिसकी कार्य [ अर्थात् उत्पन्न होने वाले घटादि
पदार्थ ] से पहिले सत्ता निश्चित हो और जो अन्यथासिद्ध न हो उसको कारण
कहते हैं । जैसे तन्तु और वेमा [ अर्थात् कपड़ा बुनने का साधनरूप दण्ड
विशेष ] आदि पट के कारण हैं ।
यह कारण का सामान्य लक्षण किया । इस कारण के लक्षण में 'नियत:'
और 'अनन्यथासिद्धश्च' ये दो विशेषण पद विशेष महत्त्व के हैं । इनको इस
लक्षण में रखने का क्या प्रयोजन है इसके जानने का प्रकार यह है कि उनमें
से एक एक पद को हटा देने से क्या हानि होती है यह देखा जाय । इस प्रकार
के विचार को 'पदकृत्य' कहते हैं । कारण के 'यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतः'
इस लक्षण में यदि 'नियत:' पद न रखा जाय और 'यस्य कार्यात् पूर्वभावः'