सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

प्रमाणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १३
१-प्रमाणानि
प्रमाणम्
तत्रापि प्रथममुद्दिष्टस्य प्रमाणस्य तावल्लक्षणमुच्यते। प्रमाकरणं
प्रमाणम्। अत्र च प्रमाणं लक्ष्यं, प्रमाकरणं लक्षणम्।
ननु प्रमायाः करणं चेत् प्रमाणं तर्हि तस्य फलं वक्तव्यम्, करणस्य
फलवत्त्वनियमात्। सत्यम्। प्रमैव फलं, साध्यमित्यर्थः। यथा
छिदाकरणस्य परशोश्छिदैव फलम्।
उद्देश अर्थात् नाममात्र से परिगणन कर दिया गया है। अब शेष ग्रन्थ में
उनके लक्षण और परीक्षा करनी हैं। उद्देश सूत्र में सबसे पहिले प्रमाण को
रखा है अतएव उसी क्रम से सबसे पहिले प्रमाण का लक्षण करते हैं। यद्यपि
न्यायसूत्रकार ने प्रमाण सामान्य का लक्षणसूचक कोई सूत्र नहीं लिखा है
परन्तु उनके भाष्यकार वात्स्यायन ने—'प्रमाण शब्द का निर्वचन ही उसका
लक्षण है अतएव सूत्रकार को उसका अलग लक्षण करने आवश्यकता नहीं
है'। इस प्रकार का भाव व्यक्त करते हुए लिखा है—
'उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानीति समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद्बोद्धव्यम् ।
प्रमीयते अनेन इति करणार्थाभिधानो हि प्रमाणशब्दः'१ ।
इसका अभिप्राय यह है कि प्र उपसर्ग पूर्वक मा धातु से करण में ल्युट्
प्रत्यय करने से प्रमाण शब्द सिद्ध होता है अतएव प्रमा का करण अर्थात् साधन
प्रमाण कहलाता है। यह प्रमाण का सामान्य लक्षण प्रमाण पद के निर्वचन से
ही निकल आता है। अतएव उपलब्धि अर्थात् ज्ञान अथवा प्रमा के साधन
अर्थात् करण को प्रमाण कहते हैं। यह प्रमाण का सामान्य लक्षण हुआ। इसी
भाष्य के आधार पर तर्कभाषाकार प्रमाण लक्षण का सामान्य लक्षण करते हैं—
उन [ षोडश पदार्थों ] में भी प्रथम उद्दिष्ट [ सबसे पहिले कहे हुए ] प्रमाण
का लक्षण सबसे पहिले कहते हैं। प्रमा का करण प्रमाण है। इस [ लक्षण ]
में प्रमाण यह [ पद ] लक्ष्य [ पद, अर्थात् जिसका लक्षण करना है वह ] है
और प्रमा का करण यह लक्षण [ अंश ] है।
[ प्रश्न ] अच्छा यदि प्रमा का करण [ अर्थात् साधन ] प्रमाण है तो उस
[ साधन रूप प्रमाण ] का फल बतलाना चाहिये [ क्योंकि ] करण [ अर्थात्
साधन ] का फल होना आवश्यक है।
१ न्याय भाष्य १, १, ३।