तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ तर्कभाषा [ तर्कस्याप्रमात्वम्
में शुक्ति में जो रजत का ज्ञान होता है वह अतद्रूप अर्थात् अरजत रूप शुक्ति
में प्रतिष्ठित होता है। अतएव अतद्रूप में प्रतिष्ठित होने के कारण उसको
मिथ्या ज्ञान अथवा विपर्यय कहते हैं और वह अयथार्थ ज्ञान होता है।
नैयायिकों ने इसी अतद्रूपप्रतिष्ठ अर्थ का बोधन करने के लिये ‘तद्भाववति
तत्प्रकारकं ज्ञानमप्रमा’ कहा है। जिसका अर्थ यह है कि ‘तदभाववति अर्थात्
रजतत्वाभाववति’ जिसमें रजतत्व का अभाव हो उस शुक्ति आदि में तत्प्रकारक
अर्थात् रजतत्वविशेषणक ज्ञान को अप्रमा कहते हैं। ‘तत्प्रकारकम्’ में प्रकार शब्द
का अर्थ विशेषण होता है। ‘तद्भाववति अर्थात् रजतत्वाभाववति शुक्तिकादौ’
रजतत्व से रहित शुक्तिका आदि में ‘तत्प्रकारकम्’ अर्थात् रजतत्वप्रकारकम्’
जिसमें रजतत्व विशेषण रूप से प्रतीत हो अर्थात् ‘इदं रजतम्’ यह ज्ञान
मिथ्या ज्ञान, विपर्यय, अप्रमा या भ्रम कहा जाता है।
संशय और तर्क का अप्रमात्व—
इस विपर्यय के अतिरिक्त संशय और तर्क ज्ञान को भी ग्रन्थकार ने
अयथार्थ ज्ञान कहा है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक पदार्थ का एक निश्चित
स्वरूप होता है। उस निश्चित रूप से जो उस पदार्थ का ग्रहण है वह तो उस
का यथार्थ ज्ञान ‘तद्वति तत्प्रकारकं ज्ञानं यथार्थोऽनुभवः’ है। परन्तु संशय में
पदार्थ का निश्चयात्मक रूप से ग्रहण नहीं होता है। अतएव अनिश्चयात्मक
संशय ज्ञान भी ‘तदभाववति तत्प्रकारकम्’ होने से अयथार्थ ज्ञान ही है।
तर्कज्ञान को भी ग्रन्थकार ने अयथार्थ ज्ञान के अन्तर्गत माना है। इसका
कारण यह है कि तर्क भी निश्चय से पूर्व की अनिश्चयावस्था का नाम है।
तर्क का लक्षण न्याय सूत्र में ‘अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थ-
मूहस्तर्कः’" १ ।
इस प्रकार किया गया है। इसके भाष्य में भाष्यकार ने लिखा है कि—
‘कथं पुनरयं तत्त्वज्ञानार्थः, न तत्त्वज्ञानमेवेति । अनवधारणात् । अनुजाना-
त्ययमेकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या न त्ववधारयति, न व्यवस्यति, न निश्चिनोति
एवमेवेदमिति’ २,
अर्थात् तर्क केवल एक पक्ष का समर्थन मात्र करता है उसका निश्चय नहीं
करता है कि यह पदार्थ ऐसा ही है। अतएव अनवधारणात्मक या अनिश्चयात्मक
१ न्याय सूत्र १, १, ४० । २ वात्स्यायन भाष्य १, १, ४० ।