तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ तर्कभाषा [ लक्षणप्रयोजनम्
'शाबलेयत्व' अर्थात् चितकबरापन गाय का लक्षण नहीं हो सकता है। क्योंकि
लक्ष्य-गौ-के एक बहुत बड़े भाग में अर्थात् बहुत सी गौओं में यह 'शाबलेयत्व'
या चितकबरापन नहीं पाया जाता है। अतएव यह 'शाबलेयत्व' धर्म 'अव्याप्ति'
दोषग्रस्त होने से गौ का लक्षण नहीं हो सकता है।
तीसरा दोष असम्भव है। 'लक्ष्यमात्रावृत्तित्वमसम्भवः' अर्थात् जो धर्म
लक्ष्यमात्र में न पाया जाय वह असम्भव दोष कहलाता है। जैसे 'एकशफत्व'
असम्भवदोषग्रस्त होने से गौ का लक्षण नहीं हो सकता है। गौ द्विशफ प्राणी
है अर्थात् उसके खुर बीच से चिरे हुए होने से दो शफ (खुर) होते हैं। ऊंट
का पूरा खुर एक होता है जिससे उसे रेत में चलने में सहायता मिलती है।
इसलिए ऊंट एकशफ एक खुर वाला प्राणी है। परन्तु गौ एकशफ नहीं अपितु
द्विशफ प्राणी है। अतएव यदि कोई एकशफत्व को गौ का लक्षण बनाना चाहे
तो यह लक्षण एक भी गौ में नहीं मिलेगा। लक्ष्यमात्र-सारी गौओं-में अविद्य-
मान होगा। अतएव वह गौ का लक्षण नहीं हो सकता। इस प्रकार १
'अतिव्याप्ति' [ अलक्ष्यवृत्तित्वमतिव्याप्तिः ] २ अव्याप्ति [ लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वम-
व्याप्तिः ] और ३ असम्भव [ लक्ष्यमात्रावृत्तित्वमसम्भवः ] इन तीनों दोषों से
रहित धर्म ही लक्षण होता है। ऐसे धर्म को ही असाधारण धर्म या 'लक्ष्यता-
वच्छेदकसमनियत' धर्म भी कहते हैं। इसलिए 'अतिव्याप्त्यादिदोषत्रयरहितो
धर्मो लक्षणम्' या 'लक्ष्यतावच्छेदकसमनियतो धर्मो लक्षणम् ।' अथवा 'असा-
धारणधर्मवचनम् लक्षणम्' यह तीनों ही 'लक्षण' के 'लक्षण' हो सकते हैं।
लक्षण का प्रयोजन--
लक्षण के दो प्रयोजन माने गए हैं एक व्यावृत्ति अर्थात् सजातीय या
विजातीय अन्य पदार्थों से भेद करना और दूसरा व्यवहार को प्रवृत्त करना ।
'व्यावृत्तिर्व्यवहारो वा लक्षणस्य प्रयोजनम्' । गौ का लक्षण करने का अभिप्राय
उसके समानजातीय महिषादि चतुष्पद और उसके असमानजातीय चतुष्पद
भिन्न प्राणी, तथा अचेतन पदार्थों से उसको भिन्न करना ही होता है। इसीको
'समानासमानजातीयव्यवच्छेदो हि लक्षणार्थः' कह कर लक्षणका प्रयोजन बताया
है। यही धर्म या लक्षण गौ व्यवहार का प्रवर्तक होता है। इसलिये व्यवहार
भी लक्षण का प्रयोजन है। इस प्रकार लक्षण के द्विविध प्रयोजन माने गए हैं।
प्रमाणलक्षण--
प्रथम सूत्र में न्याय शास्त्र के प्रतिपाद्य प्रमाणादि षोडश पदार्थों का