सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

मयूख ३ न्यायादर्श या न्यायसारावली ४ शब्दशक्तिप्रकाशिका ५ तर्कामृत ६ पदार्थतत्त्वनिर्णय ७ न्यायलीलावतीदीधितिव्याख्याThese are at y ≈ 560 to 730! And then:१ त० चि० दीधितिपरीक्षा २ किरणावलीप्रकाशविवृतिपरीक्षा ३ पदार्थखण्डनव्याख्या ४ भावविलास [ राजस्तुति का काव्य ] ५ भ्रमरदूत`
These are at y ≈ 740 to 880!

YES! YES! YES!
Row 9 is at the TOP!
Row 10 is BELOW Row 9!
Row 11 is BELOW Row 10!
Row 12 is BELOW Row 11!
And in each row:
The row runs from LEFT to RIGHT:
Left: ९
Next: गुणानन्द विद्यावागीश
Next: १६२५
Next: The works!
And at the very top:
Above Row 9 (or in the margin above):
There is [ ५५ ]!
WAIT! Look at [ ५५ ]:
Is it at the top or right?
It's at x ≈ 450, y ≈ 95!
Wait, y ≈ 95 is ABOVE Row 9!

[ ५६ ]

सं०नामकालस्थानविशेषग्रन्थ
१३जयराम न्यायपञ्चानन१७००६ वृन्दावनविनोद काव्य<br>१ त० चि० दी० गूढार्थविद्योतन<br>२ त० चि० आलोकविवेक<br>३ न्यायसिद्धान्तमाला<br>४ शब्दार्थमाला<br>५ गुणदीधितिविवृत्ति<br>६ न्यायकुसुमाञ्जलिकािरकाव्याख्या<br>७ पदार्थमणिमाला<br>८ काव्यप्रकाश तिलक
१४गौरीकान्त सार्वभौम१७२५१ भावार्थदीपिका [ तर्कभाषा की टीका ]<br>२ सद्युक्तिमुक्तावली<br>३ आनन्दलहरीवटी<br>४ विद्वन्मुखमण्डन विटीका
१५भवानन्द सिद्धान्तवागीश१६२५१ त० चि० दी० प्रकाशिका<br>२ प्रत्यक्षालोकसारमञ्जरी<br>३ तत्त्वचिन्तामणिटीका<br>४ कारकविवेचन
१६हरिराम तर्कवागीश”१ त० चि० टीका विचार

[ ५७ ]
१७ विश्वनाथसिद्धान्तपञ्चानन १६३४ १ अलङ्कारपरिष्कार
२ नञ्वादटीका
३ न्यायसूत्रवृत्ति
४ सुबर्थतत्त्वालोक या कारकचक्र
५ पदार्थतत्त्वालोक
६ न्यायतन्त्रबोधिनी
७ भाषापरिच्छेद
८ पिङ्गलप्रकाश
९ सुबोधिनी [ शब्दशक्ति प्र० की टीका ]
१८ रामभद्र सिद्धान्त वागीश १६६० १ न्यायसंक्षेप
१९ गोविन्द न्यायवागीश १६५० २ पदार्थखण्डनव्याख्या
३ समासवाद
२० रघुदेव न्यायालंकार " १ त० चि० गूढार्थदीपिका
२ नतीननिर्माण
३ दीधितिटीका
४ न्या० कुसु० कारिकाव्याख्या
५ द्रव्यसारसंग्रह
६ पदार्थखण्डनव्याख्या
२१ गदाधर भट्टाचार्य " १ त० चि० दीधितिप्रकाशिका
२ " व्याख्या
३ " आलोकटीका
४ मुक्तावलीटीका
५ रत्नकोषवादरहस्य
६ अनुमानचिन्तामणिदीधितिटीका

[ ५८ ]

सं०नामकालस्थानविशेषग्रन्थ
७ आख्यातवाद
८ कारकवाद
९ नञ्वाद
१० प्रामाण्यवाददीधितिटीका
११ शब्दप्रामाण्यवादरहस्य
१२ बुद्धिवाद
१३ मुक्तिवाद
१४ विधिवाद
१५ विषयतावाद
१६ व्युत्पत्तिवाद
१७ शक्तिवाद
१८ स्मृतिसंस्कारवाद
२२नृसिंह पञ्चानन१६७५१ न्यायसिद्धान्तमञ्जरीभूषा
२३रामदेव चिरञ्जीव१७००१ विद्वदामोदतरङ्गिणी
२ काव्यबिलास
३ माधवचम्पू
४ वृत्तरत्नावली
२४रामरुद्र तर्कवागीश”१ त० चि० दीधिति टीका
२ व्याप्तिवादव्याख्या
३ कारकनिर्णयटीका
४ दिनकरीप्रकाशतरङ्गिणी

[ ५६ ]
२५ श्रीकृष्ण न्यायालङ्कार १६५० ५ तत्त्वसंग्रहदीपिका-टिप्पणी
६ सिद्धान्तमुक्तावली-टीका
२६ जयराम तर्कालङ्कार १७०० १ भावदीपिका [ न्यायसिद्धान्तमञ्जरी की टीका ]
१ शक्तिवाद-टीका
१ वादपरिच्छेद
२ व्याख्याव्यूह
३ चित्तरूप
४ अधिकरणचन्द्रिका
२७ रुद्रराम १७५० ५ वैशेषिकशास्त्रीय-पदार्थनिरूपण
२८ कृष्णकान्त विद्यावागीश १७८० १ न्यायरत्नावली
२ दायभाग टीका
३ गोपाळलीलामृत
४ चैतन्यचन्द्रामृत
५ कामिनीकामकौतुक
६ उपमानचिन्तामणि-टीका
७ शब्दशक्तिप्रकाशिका-टीका
२९ राजचूडामणि मखी १६३० १ तत्त्वचिन्तामणिदर्पण
३० धमेरा आध्वरीण १६५० १ ,, प्रकाश-टीका
३१ गोपीनाथ मौनी " १ शब्दालोक

तर्कभाषाकार केशवमिश्र
बौद्ध, ब्राह्मण तथा जैन तीनों सम्प्रदायों के अपने अपने मत के अनुसार
'तर्कभाषा' इस एक ही नाम से अलग-अलग ग्रन्थ हैं। इनमें से बौद्ध 'तर्कभाषा'
के लेखक मोक्षाकर गुप्त [११००] हैं। यह मोक्षाकर की 'तर्कभाषा' तीनों में
सबसे प्राचीन है। इसमें बौद्धन्याय के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है।
ऊपर हमने न्याय साहित्य का जो विवरण दिया है उसमें 'तर्कभाषा' नामक
तीन ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। दूसरी जैन 'तर्कभाषा' के लेखक
जैन विद्वान् श्री यशोविजय [१६८८ ई०] हैं। इसमें जैनन्याय के सिद्धान्तों
का विवेचन किया गया है। और तीसरी 'तर्कभाषा' के लेखक श्री केशवमिश्र
[१२७५ ई०] हैं। इसमें ब्राह्मणों के न्यायसिद्धान्तों का मुख्य रूप से और उसके
साथ ही वैशेषिक सिद्धान्तों का संक्षेप रूप से सम्मिलित विवेचन किया
गया है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा' बौद्ध विद्वान् मोक्षाकर गुप्त की
'तर्कभाषा' के १७५ वर्ष बाद और यशोविजय की जैन 'तर्कभाषा' से लगभग
चार सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी। यह प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या उसी केशव-
मिश्र विरचित 'तर्कभाषा' की हिन्दी व्याख्या है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा'
न्याय के उन प्रकरण ग्रन्थों में से है जिन में मुख्य रूप से न्याय के सिद्धान्तों
का प्रतिपादन करते हुए आनुषङ्गिक रूप से वैशेषिक दर्शन के सिद्धान्तों का भी
समावेश कर लिया गया है।
खेद की बात है कि अन्य ग्रन्थकारों के समान 'तर्कभाषा' के लेखक केशवमिश्र
ने भी स्वयं अपना परिचय देने का कोई प्रयत्न नहीं किया है। इसलिए उनका
देश-काल आदि सब ही कुछ अन्धकार में है। उनका जो कुछ थोड़ा सा परिचय
प्राप्त होता है वह उनके शिष्य 'गोवर्धन मिश्र' के द्वारा हमको प्राप्त होता है।
'गोवर्धन मिश्र' ने अपने गुरु श्री केशवमिश्र की इस 'तर्कभाषा' पर 'तर्कभाषा-
प्रकाश' नामक एक टीका लिखी है। इस टीका के प्रारम्भ में एक श्लोक
लिखा है जिस से यह विदित होता है कि 'तर्कभाषा' के निर्माता केशवमिश्र
टीकाकार 'गोवर्धनमिश्र' के गुरु हैं। वह श्लोक जो इस गुरुशिष्य-सम्बन्ध को
बतलाता है इस प्रकार है—
विजयश्रीतनूजन्मा गोवर्धन इति श्रुतः।
तर्कानुभाषां तनुते विविच्य गुरुनिर्मिताम् ॥
इस में 'गोवर्धनमिश्र' ने अपना परिचय देते हुए 'तर्कभाषा' को अपने गुरु
की बनाई हुई बतलाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि 'केशवमिश्र' 'गोवर्धन
मिश्र के गुरु थे। इसके आगे 'गोवर्धन मिश्र' ने एक श्लोक और लिखा है जिसमें

[ ६१ ]
उन्होंने अपने गुरु श्री केशवमिश्र का परिचय देने का प्रयत्न किया है। वह
श्लोक निम्न प्रकार है—
श्रीविश्वनाथानुज-पद्मनाभानुजो गरीयान् बलभद्रजन्मा ।
तनोति तर्कानधिगत्य सर्वान् श्रीपद्मनाभाद्विदुषो विनोदम् ॥
'गोवर्धन मिश्र' ने इस श्लोक में 'केशवमिश्र' का जो परिचय दिया है
उसके अनुसार उनके पिता का नाम 'बलभद्र' था। उनके दो बड़े भाई क्रमशः
'विश्वनाथ' तथा 'पद्मनाभ' नाम के थे। 'केशवमिश्र' ने अपने बड़े भाई
'पद्मनाभ' से तर्कशास्त्र का अध्ययन कर के 'स्वान्तःसुखाय' इस 'तर्कभाषा'
की रचना की है।
केशवमिश्र के बड़े भाई 'पद्मनाभमिश्र' स्वयं एक बड़े अच्छे नैयायिक
विद्वान् थे। उन्होंने वैशेषिक दर्शन के 'प्रशस्तपाद भाष्य' पर श्री उदयनाचार्य
विरचित 'किरणावली' नामक टीका पर 'किरणावलीप्रकाश' नामक व्याख्या
ग्रन्थ, तथा 'कणादरहस्यमुक्ताहार' नामक एक अन्य ग्रन्थ की रचना की है।
'किरणावली' पर नव्यन्याय के प्रवर्तक 'गंगेशोपाध्याय' के शिष्य 'श्री
वर्धमानोपाध्याय' [ १२५० ई० ] ने भी 'किरणावली-प्रकाश' नाम से ही एक
टीका लिखी है। परन्तु 'पद्मनाभ मिश्र' अपने 'किरणावली-प्रकाश' में 'वर्धमान'
के 'किरणावली-प्रकाश' की अपेक्षा कुछ विशेषता बतलाते हैं। उन्होंने लिखा
है कि 'वर्धमान' ने जिन अर्थों का स्पर्श भी नहीं किया है इस प्रकार के बिल्कुल
नवीन और अपने गुरु द्वारा उपदिष्ट अर्थों का हम अपने इस 'किरणावली-
प्रकाश' में वर्णन कर रहे हैं। उनका श्लोक इस प्रकार है—
उपदिष्टा गुरुचरणैरस्पृष्टा वर्धमानेन ।
किरणावल्यामर्थास्तन्यन्ते पद्मनाभेन ॥
अर्थात् अपने गुरु जी द्वारा बतलाये गए ऐसे अर्थों का जिनको कि 'किरणा-
वली-प्रकाश' नामक टीका के लेखक 'वर्धमानोपाध्याय' ने अपने ग्रन्थ में छुआ भी
नहीं है उनको हम अर्थात् इस नवीन 'किरणावली-प्रकाश' के लेखक 'पद्मनाभ
मिश्र' अपने इस ग्रन्थ में लिख रहे हैं।
इस श्लोक से प्रतीत होता है कि 'पद्मनाभमिश्र' जो कि केशवमिश्र के बड़े
भाई हैं वर्धमानोपाध्याय [ १२५० ई० ] के लगभग समकालीन किन्तु कुछ बाद
के हैं। इसलिए 'पद्मनाभमिश्र' और उनके छोटे भाई केशवमिश्र दोनों का समय
१२७५ ई० के लगभग निश्चित किया गया है।
'वर्धमानोपाध्याय' नव्यन्याय की 'मैथिल शाखा' के पण्डित थे इसलिए
'पद्मनाभ मिश्र' तथा 'केशव मिश्र' को भी प्रायः मैथिल ही माना जाता है। इस
प्रकार तर्कभाषाकार केशवमिश्र १२७५ ई० के लगभग मिथिला में उत्पन्न हुए थे।

[ ६२ ]
उनके पिता का नाम 'बलभद्र मिश्र' और दो बड़े भाइयों के नाम क्रमशः
'विश्वनाथ मिश्र' तथा 'पद्मनाभ मिश्र' थे। इनके शिष्य 'गोवर्धनमिश्र' थे जिन्होंने
इनकी 'तर्कभाषा' पर 'तर्कभाषाप्रकाश' नामक व्याख्या लिखी है। इतना ही
इनका परिचय इनके शिष्य 'गोवर्धन मिश्र' के द्वारा प्राप्त होता है।
तर्कभाषा की प्राचीन टीकाएँ—
केशव मिश्र की 'तर्कभाषा' में बहुत संक्षेप में और बहुत सुन्दर रूप से न्याय
के पदार्थों का प्रतिपादन किया गया है इसलिए इस पुस्तक ने विद्वानों में
अच्छा आदर पाया है। इसी कारण इस ग्रन्थ के ऊपर थोड़े से समय में ही
प्रायः चौदह टीका लिखी गई हैं। उनके नाम निम्न प्रकार हैं—
१ श्री गोवर्धनमिश्र कृत [ १३०० ] तर्कभाषा-प्रकाशिका ।
२ श्री गोपीनाथ कृत उज्ज्वला टीका।
३ श्री रोमबिल्व वेंकटबुद्ध कृत तर्कभाषा-भाव टीका ।
४ श्री रामलिंग कृत न्यायसंग्रह टीका ।
५ श्री माधवदेव कृत सारमञ्जरी ।
६ श्री भास्कर भट्ट कृत परिभाषादर्पण ।
७ श्री बालचन्द्र कृत तर्कभाषाप्रकाशिका ।
८ श्री चिन्नभट्ट कृत [ १३९० ] तर्कभाषाप्रकाशिका ।
९ श्री गणेशदीक्षित कृत तत्त्वप्रबोधिनी ।
१० श्री कौण्डिन्यदीक्षित कृत तर्कभाषाप्रकाशिका ।
११ श्री केशवभट्ट कृत तर्कदीपिका ।
१२ श्री गौरीकण्ठ सार्वभौम कृत तर्कभाषा-प्रकाशिका ।
१३ श्री नागेशभट्ट कृत [ १७१० ] युक्तिमुक्तावली टीका ।
१४ श्री विश्वकर्मा कृत न्यायप्रदीप ।
'तर्कभाषा' जैसी छोटी सी पुस्तक पर इतनी अधिक टीकाओं का लिखा
जाना उसकी लोकप्रियता और प्रौढ़ता का प्रमाण है। यह छोटा सा ग्रन्थ
भारतीय दर्शन का प्रवेश-द्वार है इसलिए सभी कलाकारों ने उसे अपनी-
अपनी व्याख्याओं द्वारा अलंकृत करने का यत्न किया है। जिस प्रकार विगत
७०० वर्षों से यह ग्रन्थ विद्वानों में आदर प्राप्त करता आ रहा है उसी प्रकार
आशा है इस नवयुग में भी इस नवीन व्याख्या से विभूषित यह ग्रन्थ विशेष
रूप से प्रचार और विद्वज्जनों द्वारा आदर प्राप्त करेगा ।
दीपावली २०१० विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि

तर्कभाषा
‘तर्करहस्यदीपिका’ विभूषिता

इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित पाठ (printed text) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ (blank page/verso) है, जिस पर केवल विपरीत पृष्ठ (recto) का बहुत धुंधला और उलटा (mirror-image) प्रतिबिम्ब/शो-थ्रू (bleed-through) दिखाई दे रहा है। अतः यहाँ लिप्यंतरण योग्य कोई मूल पाठ्य सामग्री नहीं है।

श्रीकेशवमिश्रप्रणीता
तर्कभाषा
उपोद्घातः
अथ श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिता
‘तर्करहस्यदीपिकाख्या’ हिन्दीव्याख्या ।
यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम् ।
दिवं यश्चक्रे मूर्धानं, तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥
नमो विश्वात्मभूताय पूताय परमात्मने ।
सच्चिदानन्दरूपाय तर्कतत्त्वावभासिने ॥
समुद्गता पूता निगमनगतस्तर्कसरिता,
तता या तन्त्रे तैः सुगतजिनविप्रैस्त्रिपथगा ।
तदस्या धाराणां परिचयकृते सम्यगधुना,
वयं व्याख्याव्याजात्तरिमभिनवां सन्तनुमहे ॥
अनुबन्धचतुष्टय—
मनुष्य एक मननशील प्राणी है । वह सदा विचारपूर्वक कार्य करता है,
‘मत्वा कर्माणि सीव्यति’² इसी से मनुष्य कहलाता है । अतएव मनुष्य उसी
कर्म में प्रवृत्त होता है जिसमें उसे ‘इष्टसाधनता’ और ‘कृतिसाध्यता’ का ज्ञान
हो । ‘इदं मदिष्टसाधनम्’ यह कार्य मेरा इष्टसाधन है, इससे मेरे प्रयोजन की
सिद्धि होगी, और ‘इदं मत्कृतिसाध्यम्’ यह कार्य मेरे प्रयत्न से साध्य है, मैं इस
कार्य को कर सकता हूँ ऐसा जान कर ही मनुष्य किसी काम में प्रवृत्त होता है ।
इस ज्ञान में ‘इदं’ पद से १ ‘विषय’, ‘मत्’ पद से २ ‘अधिकारी’, ‘इष्ट’ पद से
३ ‘प्रयोजन’ और ‘साधनम्’ या ‘साध्यम्’ पद से ४ ‘सम्बन्ध’ इन चारों का ज्ञान
आ जाता है । इसलिए ‘विषय’ ‘अधिकारी’, ‘सम्बन्ध’ और ‘प्रयोजन’ इन
१ अथर्ववेद १०,७,३२। २ निरुक्त ३,१,७।

२ तर्कभाषा [ शास्त्रप्रयोजनम्
बालोऽपि यो न्यायनये प्रवेशम्,-अल्पेन वाञ्छत्यलसः श्रुतेन ।
संक्षिप्तयुक्त्यन्विततर्कभाषा, प्रकाश्यते तस्य कृते मयैषा ॥
चारों को 'अनुबन्धचतुष्टय' कहा जाता है। 'प्रवृत्तिप्रयोजकज्ञानविषयत्व-
मनुबन्धत्वम्', प्रवृत्ति कराने वाले अर्थात् 'इदं मदिष्टसाधनम्' आदि ज्ञान के
विषय जो; १ विषय, २ अधिकारी, ३ प्रयोजन और ४ सम्बन्ध हैं; वे चारों
'अनुबन्धचतुष्टय' कहलाते हैं। और उनका ज्ञान ही मनुष्य को किसी भी
कार्य में प्रवृत्त कराता है। इसलिए किसी ग्रन्थ के अध्ययन में भी मनुष्य तब
ही प्रवृत्त होता है जब उसे उसके विषय आदि का ज्ञान हो। अतएव ग्रन्थ में
अधिकारी पाठकों की अभिरुचि और प्रवृत्ति हो सके इसके लिए ग्रन्थ के
आरम्भ में ही उसके विषय, प्रयोजन आदि का उल्लेख कर देना आवश्यक है।
इसीलिए प्राचीन संस्कृत साहित्य में सर्वत्र ग्रन्थारम्भ में 'अनुबन्धचतुष्टय' के
निरूपण करने की परम्परा रही है। जैसा कि कहा भी है--
'सिद्धार्थं सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः'१ ॥
अर्थात् विषय, सम्बन्ध आदि का ज्ञान होने पर ही अधिकारी श्रोता
व्यक्ति किसी शास्त्र या ग्रन्थ आदि के श्रवण या अध्ययन आदि में प्रवृत्त होता
है। इसलिए ग्रन्थ के आरम्भ में विषय, सम्बन्ध, अधिकारी, प्रयोजन आदि
का प्रतिपादन कर देना चाहिए ।
इसी मर्यादा का अनुगमन करते हुए इस तर्कभाषा ग्रन्थ के रचयिता श्री
'केशवमिश्र' ने अपने ग्रन्थनिर्माण का प्रयोजन बतलाते हुए ग्रन्थ का प्रारम्भ
इस प्रकार किया है—
जो आलसी [ कठिन परिश्रम न कर सकने वाला ] बालक [ ग्रहणधारण-
पटुर्बालो न तु स्तनन्धयः, अर्थात् जो इस विषय को ग्रहण और धारण कर सके
ऐसा बालक दुधमुँहा बच्चा नहीं ] भी थोड़े से श्रवण [ अध्ययन अथवा गुरुमुख से
श्रवण ] से न्याय [ शास्त्र ] के सिद्धान्तों में प्रवेश [ उनका परिचय प्राप्त करना ]
चाहता है उसके लिए संक्षिप्त युक्तियों से अन्वित यह तर्कभाषा [ ग्रन्थ ] मैं
[ केशव मिश्र ] प्रकाशित कर रहा हूँ ।
१ मीमांसाश्लोकवार्तिकम् १,१७ ।

नामकरणम् ] उपोद्घातः ३
न्याय के सिद्धान्तों का सरलतापूर्वक परिज्ञान कराना इस ग्रन्थ का प्रयोजन
है। न्याय के प्रतिपाद्य प्रमाणादि षोडश पदार्थ इसके विषय हैं। न्याय-सिद्धान्त
का परिज्ञान प्राप्त करने वाला जिज्ञासु इसका अधिकारी है। और ग्रन्थ का
विषय के साथ प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव तथा अधिकारी के साथ बोध्यबोधकभाव
सम्बन्ध है। इस प्रकार इस श्लोक में 'अनुबन्धचतुष्टय' की सूचना हुई ।
नामकरण—
लेखक ने अपने ग्रन्थ का नाम 'तर्कभाषा' रखा है। यों तो न्यायसूत्रकार ने
अपने षोडश पदार्थों में 'तर्क' नामक एक पदार्थ माना है और उसका लक्षण
'अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः'१ इस प्रकार किया है।
परन्तु तर्कभाषा के टीकाकारों ने 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्ते, इति तर्काः प्रमाणादयः
षोडश पदार्थाः' । इस प्रकार तर्क शब्द की व्युत्पत्ति की है और उसका अर्थ
प्रमाणादि षोडश पदार्थ किया है। तर्कभाषा के अतिरिक्त श्री अन्नंभट्ट के
'तर्कसंग्रह', श्री जगदीश तर्कालङ्कार के 'तर्कामृत' आदि अन्य ग्रन्थों के टीका-
कारों ने भी 'तर्क' शब्द की इसी प्रकार की व्युत्पत्ति की है। अतएव इस
व्युत्पत्ति के आधार पर 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्ते, इति तर्काः प्रमाणादयः षोडश
पदार्थास्ते भाष्यन्तेऽनया इति तर्कभाषा'। अर्थात् प्रमाणादि षोडश पदार्थों की
व्याख्या करने वाली पुस्तक होने के कारण इसका नाम 'तर्कभाषा' रखा गया
है और वह सार्थक या अन्वर्थ संज्ञा है।
न्यायसूत्रकार ने 'कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः' यह जो तर्क का
लक्षण किया है उसके अनुसार किसी तत्त्व के निर्णय के लिए कारणों और
युक्तियों से ऊह अर्थात् अनुसन्धान का नाम तर्क है। आत्मा आदि विशेष
विवादग्रस्त विषयों में तत्त्व निर्णय के लिए न्याय दर्शन ने विशेष रूप से
युक्तियों और कारणों से ऊहापोह की है, और यही उसका प्रधान विषय रहा है
इसलिए न्यायशास्त्र का नाम ही 'तर्क' अथवा 'तर्कशास्त्र' हो गया है। इसी
प्रसङ्ग से न्याय में अनुमान, उस में प्रयुक्त होने वाले शुद्ध हेतुओं, तथा अशुद्ध
हेतुरूप हेत्वाभास, आदि की विशेष विवेचना की गई है। और तत्त्व-निर्णय
के लिए होने वाली कथाओं के 'वाद', 'जल्प', वितण्डा' आदि भेद कर के
उनके नियम और 'निग्रहस्थान' आदि का विशेष वर्णन किया गया है। इस-
१ न्यायसूत्र १,१,४०।

४ तर्कभाषा [ पाश्चात्त्यतर्कार्थाः
लिए कारणों के ऊहापोहात्मक तर्क से विशेष रूप से सम्बद्ध होने के कारण
यह न्यायशास्त्र अनेक स्थलों में तर्क अथवा तर्कशास्त्र नाम से व्यवहृत हुआ है
वह उचित ही है। इसीलिए उस न्यायशास्त्र के सिद्धान्तों का परिचय देने
वाले इस ग्रंथ का 'तर्कभाषा' नाम रखा गया है वह अन्वर्थ और उचित ही है।
पाश्चात्त्यतर्क—
पाश्चात्त्य दर्शनों में न्यायशास्त्र अथवा तर्कशास्त्र के लिए 'लाजिक' शब्द
का प्रयोग होता है। यह लाजिक शब्द यूनानी भाषा की मूल 'लोगस' धातु
से बना है। इस लोगस धातु का अर्थ विचार तथा वाणी दोनों हैं। इसलिए
विचार तथा वाणी से सम्बन्ध रखने वाली अर्थात् वाणी द्वारा विचारों को
अभिव्यक्त करने की शैली तथा नियमों का निर्धारण करने वाली विद्या का
नाम लाजिक अथवा तर्कशास्त्र है। हमारे यहाँ न्याय शास्त्र के आदि प्रवर्तक
महर्षि 'अक्षपाद गौतम' माने जाते हैं। इसी प्रकार पश्चिमी तर्कशास्त्र के प्रवर्तक
यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक 'अरस्तू' माने जाते हैं। ये अरस्तू महोदय सुप्रसिद्ध
यूनानी सम्राट् सिकन्दर, जिसने ईसा से ३२७ वर्ष पूर्व भारत पर आक्रमण
किया था, के गुरु थे। उनके तर्कशास्त्र में और अपने न्यायशास्त्र में अनेक
भेद होते हुए कुछ समानताएं भी पाई जाती हैं। जैसे वैशेषिक दर्शन के द्रव्य,
गुण, कर्म आदि सात पदार्थों के स्थान पर अरस्तू ने १ द्रव्य [ सब्स्टैन्स ],
२ गुण [ क्वालिटी ], ३ कर्म [ एक्शन ], ४ समवाय [ रिलेशन ], ५ परिमाण
[ क्वान्टिटी ], ६ काल [ टाइम ], ७ देश [ स्पेस ], ८ क्रियाभाव या नैष्कर्म्य
[ पैशन ], ९ अधिकारसम्बन्ध [ पजैश्रन ] और १० स्थिति [ सिचुएशन ]
रूप दस पदार्थों को माना है, जिन्हें कैटागरीज़ [ Categories ] कहते हैं ।
मीमांसकों के समान उन्होंने अनुमान के प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण अथवा
उदाहरण, उपनय और निगमन ये तीन ही अवयव माने हैं ।
नवीन तथा प्राचीन शैली का भेद—
न्याय, वेदान्त, व्याकरण आदि शास्त्रों में नव्य तथा प्राचीन नाम से दो
प्रकार का साहित्य पाया जाता है। नव्य न्याय और प्राचीन न्याय, नव्य,


  1. Substance, 2. Quality, 3. Action, 4. Relation,
  2. Quantity, 6. Time, 7. Space, 8. Passion, 9. Possession,
  3. Situation.

नव्यप्रत्नभेदः ] उपोद्घातः ५
व्याकरण और प्राचीन व्याकरण, नवीन वेदान्त और प्राचीन वेदान्त आदि
शब्दों का प्रयोग बहुधा होता है परन्तु इस नव्य और प्राचीन का भेद किस
आधार पर किया जाय यह कहीं निर्दिष्ट नहीं किया गया है। इसलिए बहुधा
लोग कालक्रम को ही इस नवीनता और प्राचीनता का भेदक मानते हैं।
अर्थात् जो अधिक प्राचीन समय में लिखा गया वह प्राचीन और जो अपेक्षाकृत
बाद में या आजकल लिखा गया उसको नवीन कहते हैं। परन्तु यह व्यवस्था
ठीक नहीं है। क्योंकि इसमें काल की कोई ऐसी सीमा निर्धारित नहीं की जा
सकती है कि अमुक संवत् के पूर्व का लिखा साहित्य प्राचीन समझा जावे
और उसके बाद का लिखा साहित्य नवीन समझा जावे। हमारे मत में नवीन
और प्राचीन का यह भेद कालकृत नहीं अपितु प्रकारकृत है। इन सभी शास्त्रों
में जिनमें नवीन और प्राचीन का व्यवहार होता है दो प्रकार की रचनाएँ पाई
जाती हैं। न्याय, वेदान्त अथवा व्याकरण आदि शास्त्रों के आदि ग्रन्थों का
निर्माण सूत्ररूप में हुआ था। न्याय दर्शन के मूल आधार अक्षपाद गौतम
के न्यायसूत्र हैं। वेदान्त दर्शन का मूल आधार बादरायण व्यासकृत वेदान्तसूत्र
हैं। इसी प्रकार व्याकरण का मूल आधार पाणिनिकृत अष्टाध्यायी के सूत्र हैं।
इस प्रकार इन सब के मूल ग्रन्थ सूत्ररूप में हैं। आगे इन विषयों पर जो
ग्रन्थ लिखे गए उनमें दो प्रकार की पद्धति का अवलम्बन किया गया है। एक
पद्धति के ग्रन्थकारों ने सूत्रक्रम का अवलम्बन करके उनकी व्याख्या में ही
अपने ग्रन्थ लिखे। जैसे व्याकरण में 'काशिका', 'महाभाष्य' आदि, न्याय में
'वात्स्यायन भाष्य' 'न्याय वार्तिक' आदि, वेदान्त में शङ्कराचार्य, रामानुजाचार्य
आदिकृत भाष्य। ये सब सूत्र क्रम का अनुसरण करके ही लिखे गए हैं।
इस सूत्रक्रमानुसारिणी पद्धति को हम प्राचीन पद्धति कहना चाहते हैं। इन
विषयों में दूसरी पद्धति के ग्रन्थ इस प्रकार के हैं जिनमें सूत्रक्रम का ध्यान न
रख कर उस शास्त्र के विषय को स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है। जैसे व्याकरण
में 'सिद्धान्तकौमुदी', न्याय में 'तर्कभाषा' 'मुक्तावली' आदि वेदान्त में अद्वैत-
सिद्धि', 'चित्सुखी' आदि। यह ग्रन्थ यद्यपि मूलग्रन्थों के विषय का ही प्रतिपादन
करते हैं परन्तु उनमें मूलग्रन्थों के सूत्रक्रम का अवलम्बन नहीं किया गया है।
इस पद्धति को नव्यशैली कहना चाहिये। इस दृष्टि से प्राचीनकाल में भी लिखे
गए 'सिद्धान्तकौमुदी' आदि ग्रन्थ नव्य व्याकरण के और आधुनिक काल में भी
सूत्रक्रम के अनुसार लिखे जाने वाले यह ग्रन्थ प्राचीन व्याकरण के अन्तर्गत

६ तर्कभाषा [ प्रकरणग्रन्थाः
समझने चाहिये। हमने अपने 'दर्शनमीमांसा' नामक ग्रन्थ में इस भेद का
निरूपण इस प्रकार किया है :—
“द्वैधं दर्शनसाहित्यं नूतनप्रत्नभेदतः ।
प्रत्नं सूत्रक्रमापेक्षि, तदुपेक्ष्य च नूतनम् ॥
सूत्रवार्तिकभाष्यादि, क्वचित्टीकापरम्परा ।
प्रत्नं दर्शनसाहित्यं नूतनं च तथेतरत् ॥
सूत्रक्रमं परित्यज्य स्वतन्त्रैर्विबुधैस्ततः ।
ग्रन्था येऽत्र कृतास्ते तु साहित्ये नूतने मताः ॥
नूतनप्रत्नभेदोऽयं न कालापेक्षिको मतः ।
अङ्गीकृतोऽसौ सर्वत्र भङ्गीभेदात्तु केवलम्”१ ॥
इस लक्षण के अनुसार तर्कभाषा नवीन शैली का अवलम्बन करके लिखी
गई है अतएव उसकी गणना 'नव्यन्याय' के साहित्य में की जानी चाहिए।
दो प्रकार के 'प्रकरण' ग्रन्थ—
नव्य शैली में सभी शास्त्रों में कुछ इस प्रकार के ग्रन्थ पाए जाते हैं जो
उस-उस शास्त्र के केवल एक देश का प्रतिपादन करते हैं, अर्थात् शास्त्र के
सम्पूर्ण विषय का प्रतिपादन नहीं करते हैं। ऐसे ग्रन्थों को 'प्रकरण ग्रन्थ' कहा
जाता है। प्रकरण ग्रन्थ का लक्षण इस प्रकार किया गया है :—
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः२ ॥
तर्कभाषा में न्याय के मुख्य मुख्य पदार्थों का प्रतिपादन किया है उनके
समस्त विषयों का पूर्ण रूप से वर्णन नहीं किया गया है अतएव इसको न्याय
का 'प्रकरण ग्रन्थ' कहना ही उचित है। तर्कभाषा के अतिरिक्त अन्नंभट्ट का
'तर्कसंग्रह' विश्वनाथ की 'न्यायमुक्तावली' जगदीश तर्कालङ्कार का 'तर्कामृत',
लौगाक्षि भास्कर की 'तर्ककौमुदी' आदि अन्य अनेक प्रकरण ग्रन्थ भी न्याय
में लिखे गए हैं। इन प्रकरण ग्रन्थों में प्रायः न्याय और वैशेषिक दोनों दर्शनों
के पदार्थों का सम्मिलित रूप से वर्णन किया गया है। परन्तु उनमें से कुछ
ग्रन्थों में न्याय को प्रधान और वैशेषिक को गौण और दूसरों में वैशेषिक को
१ दर्शनमीमांसा, अ० १। २ पाराशर उपपुराण अ० २८, २१ ।

प्रधान आधार बना कर न्याय के पदार्थों का गौण रूप से विवेचन किया गया
है । न्याय में प्रमाणादि सोलह पदार्थों का वर्णन है और वैशेषिक में द्रव्यादि
छः पदार्थों का । न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थों में न्याय के प्रमाणादि सोलह
पदार्थों का मुख्य रूप से प्रतिपादन किया गया है । उनमें से प्रमेय नामक
द्वितीय पदार्थ के अन्तर्गत 'अर्थ' नामक प्रमेय में वैशेषिक में प्रतिपादित
द्रव्यादि छः पदार्थों का अन्तर्भाव करके उनका वर्णन किया है । तर्कभाषा में
इसी पद्धति का अवलम्बन किया है । अतएव वह न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थ
है । इसके विपरीत 'तर्कसंग्रह' 'न्यायमुक्तावली' आदि में वैशेषिक के द्रव्यादि
पदार्थों का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है । और उसमें गुण नामक द्वितीय
पदार्थ के अन्तर्गत 'बुद्धि' नामक पदार्थ में न्याय के प्रमाणादि पदार्थों का
अन्तर्भाव करके वर्णन किया गया है । अतएव वह वैशेषिकप्रधान प्रकरण ग्रन्थ
है । हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस विषय का प्रतिपादन इस प्रकार
किया है :—
“ग्रन्थाश्च प्रकरणाख्या नव्याः सन्ति तथाविधाः ।
न्यायकाणादयोस्तत्त्वं यत्रैकत्रैव वर्ण्यते ॥
क्वचित् पदार्था न्यायस्य, क्वचिद् वैशेषिकस्य च ।
वर्णिता मुख्यतस्तेषु तथान्तर्भाविताः परे ॥
षट्पदार्थान् कणादस्यैवान्तर्भाव्य प्रमेयके ।
न्यायस्यार्थान् समालम्ब्य वर्णनं चैषु दृश्यते ॥
वरदराजस्तार्किकरक्षां चक्रे तथाविधाम् ।
कृता केशवमिश्रेण तर्कभाषा च तद्विधा ॥
न्यायात् प्रमाणमादाय षट्पदार्थान् कणादतः ।
अन्नंभट्टेन संगृह्य रचितस्तर्कसंग्रहः ।
न्यायलीलावतीं चैव चकार वल्लभस्तथा ।
तर्कालङ्कारः कृतवान् जगदीशस्तर्कामृतम् ॥
अथ भाषापरिच्छेदं न्यायमुक्तावलीं तथा ।
न्यायपञ्चाननश्चक्रे विश्वनाथाभिधः सुधीः ॥
लौगक्षिभास्करेणाथ रचिता तर्ककौमुदी ।
प्रकरणग्रन्थश्रेण्यामस्यामायाति च ध्रुवम्” ॥

१ दर्शनमीमांसा अ० ३ ।

८ तर्कभाषा [ पदार्थोद्देशः
'प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-
वितण्डा-हेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः'¹
इति न्यायस्यादिमं सूत्रम् ।
अस्यार्थः । प्रमाणादिषोडशपदार्थानां तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिर्भवतीति ।
न च प्रमाणादीनां तत्त्वज्ञानं सम्यग्ज्ञानं तावद्भवति यावदेषामुद्देशलक्षण-
परीक्षा न क्रियन्ते । यदाह भाष्यकारः—
'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिरुद्देशो लक्षणं परीक्षा चेति' ।²
उद्देशस्तु नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्त्तनम् । तच्चास्मिन्नेव सूत्रे कृतम् ।
लक्षणन्त्वसाधारणधर्मवचनम् । यथा गोः सास्नादिमत्त्वम् । लक्षितस्य
इस प्रकार प्रस्तुत तर्कभाषा नव्यन्याय का न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थ है ।
अतएव ग्रन्थकार ने प्रमाण-प्रमेयादि न्याय के प्रथम सूत्र को उद्धृत करते हुए
अपने ग्रन्थ का प्रारम्भ इस प्रकार किया है :—
१ प्रमाण, २ प्रमेय, ३ संशय, ४ प्रयोजन, ५ दृष्टान्त, ६ सिद्धान्त,
७ अवयव, ८ तर्क, ९ निर्णय, १० वाद, ११ जल्प, १२ वितण्डा, १३ हेत्वाभास,
१४ छल, १५ जाति, १६ निग्रहस्थानोंके तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।
यह न्याय [ दर्शन ] का प्रथम सूत्र है ।
इसका अर्थ [ यह है ] प्रमाणादि सोलह पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मोक्ष की
प्राप्ति होती है ।
और प्रमाणादि [ सोलह पदार्थों ] का तत्त्वज्ञान [ अर्थात् ] यथार्थज्ञान
तब तक नहीं हो सकता है जब तक इनके १ उद्देश, २ लक्षण और ३ परीक्षा
न किए जायें । जैसा कि [ न्याय दर्शन के ] भाष्यकार [ वात्स्यायन ] ने कहा
है [ कि ] इस [ न्याय ] शास्त्र की तीन प्रकार से प्रवृत्ति होती है । १ उद्देश,
२ लक्षण और ३ परीक्षा ।
उनमें से नाम मात्र से वस्तु का कथन उद्देश [ कहा जाता ] है । और वह
[ उद्देश ] इसी [ प्रमाणप्रमेयादिरूप प्रथम ] सूत्र में कर दिया है । २ असाधारण
धर्म का कथन लक्षण [ कहलाता ] है । जैसे गौ का 'सास्नादिमत्त्व' [ गाय के गले
के नीचे जो खाल लटकती रहती है उसको सास्ना या गलकम्बल कहते हैं । सास्ना
१ गौ० न्या० सू० १-१-१। २ न्या. सू. वा. भा. १-१-२

शास्त्रप्रवृत्तिभेदाः ] उपोद्धातः ६
लक्षणमुपपद्यते न वेति विचारः परीक्षा। तेनैते लक्षणपरीक्षे प्रमाणादीनां
तत्त्वज्ञानार्थे कर्त्तव्ये ।
गौ के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी के नहीं होती। अतएव यह गौ का असाधारण
धर्म या लक्षण है।] ३ जिसका लक्षण किया गया है वह उसका ठीक लक्षण
है या नहीं इस विचार का नाम परीक्षा है। इसलिए [ उद्देश के प्रथम सूत्र में
ही हो जाने के बाद अब शेष ग्रन्थ में ] प्रमाणादि के तत्त्वज्ञान के लिए
[ उनकी ] यह लक्षण और परीक्षा करनी चाहिए ।
शास्त्र-प्रवृत्ति के भेद—
यहाँ ग्रन्थकार ने 'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः—उद्देशो लक्षणं परीक्षा
चेति' इस वात्स्यायन भाष्य को उद्धृत करते हुए न्याय शास्त्र की त्रिविध प्रवृत्ति
का वर्णन किया है। इस त्रिविध प्रवृत्ति का प्रतिपादन सर्वप्रथम भाष्यकार
वात्स्यायन ने ही किया है। और वह मुख्यतः न्याय शास्त्र में ही लागू होता
है। अन्य सब शास्त्रों में लागू नहीं होता। न्याय के 'समान-तंत्र' कहलाने
वाले वैशेषिक में भी त्रिविध नहीं अपितु परीक्षा को छोड़ कर केवल उद्देश और
लक्षण रूप द्विविध प्रवृत्ति का ही वर्णन है। और कहीं कहीं अत्यन्त श्रद्धाप्रधान
[बौद्ध-जैनादिकों के धर्मसंग्रह आदि] ग्रन्थों में केवल उद्देश रूप एकविध प्रवृत्ति
भी पाई जाती है। द्विविध प्रवृत्ति का वर्णन करते हुए वैशेषिक दर्शन के
प्रशस्तपाद भाष्य पर 'कन्दली' टीका के लेखक श्रीधराचार्य लिखते हैं—
“अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्त्तन्ते निर्विषयत्वात् । अलक्षितेषु
च तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात् । अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्यो-
भयथा प्रवृत्तिः । उद्देशो लक्षणं च । परीक्षायास्तु न नियमः ।
यत्राभिहिते लक्षणे प्रवादान्तरव्याक्षेपात् तत्त्वनिश्चयो न भवति तत्र परप-
क्षव्युदासार्थं परीक्षाविधिरधिक्रियते । यत्र तु लक्षणाभिधानसामर्थ्यादेव तत्त्व-
निश्चयः स्यात् तत्रायं व्यर्थो नार्थ्यते । योऽपि त्रिविधां शास्त्रस्य प्रवृत्तिमित्छति
तस्यापि प्रयोजनादीनां नास्ति परीक्षा । तत् कस्य हेतोर्लक्षणमात्रादेव ते प्रती-
यन्त इति । एवं चेदर्थप्रतीत्यनुरोधात् शास्त्रस्य प्रवृत्तिर्न त्रिविधैव । नामधेयेन
पदार्थानामभिधानमुद्देशः । उद्दिष्टस्य स्वपरजातीयव्यावर्त्तको धर्मो लक्षणम् ।
लक्षितस्य यथालक्षणं विचारः परीक्षा'” ।
१ 'न्यायकन्दली' पृष्ठ २६ ।

१० तर्कभाषा [ विभागान्तर्भावः
इसका अभिप्राय यह है कि, "पदार्थों का उद्देश [ नाममात्र से कथन ]
न करने पर उनके लक्षण नहीं हो सकते हैं क्योंकि लक्षण का कोई विषय
उपस्थित नहीं है जिसका लक्षण किया जाय । [ अतएव उद्देश करना
आवश्यक है ] यदि पदार्थों के लक्षण न किए जायँ तो [ तत्त्वज्ञान का ] कारण
न होने से तत्त्वज्ञान नहीं होगा । इस लिए पदार्थ बोधन के लिए प्रवृत्त शास्त्र
के उद्देश और लक्षण रूप दोनों प्रकार की प्रवृत्ति आवश्यक है । परन्तु परीक्षा
का कोई नियम नहीं है ।"
“जहाँ लक्षण कर देने पर भी दूसरे मतों के आक्षेप के कारण तत्त्वनिर्णय
नहीं हो पाता है वहाँ परपक्ष के खण्डन के लिये परीक्षा विधि का अवलम्बन
किया जाता है । और जहाँ लक्षण कथन मात्र से ही तत्त्व का निश्चय हो जाता
है वहाँ परीक्षा विधि के व्यर्थ होने से उसका अवलम्बन नहीं किया जाता ।
और जो [भाष्यकार वात्स्यायन] त्रिविध शास्त्र-प्रवृत्ति मानते हैं उनके यहां भी
प्रयोजन आदि की परीक्षा नहीं की गई है । यह क्यों है ? इसलिए कि लक्षणमात्र
से ही उनकी प्रतीति हो जाती है । जब ऐसा है तब अर्थ की प्रतीति के
अनुसार प्रवृत्ति होती है न कि तीन ही प्रकार की यह कहना चाहिए" ।
इस प्रकार न्याय के भाष्यकार वात्स्यायन ने त्रिविध प्रवृत्ति का प्रतिपादन
किया है और वैशेषिक दर्शन के टीकाकार श्रीधराचार्य ने द्विविध प्रवृत्ति का
वर्णन किया है । इसका कारण यह है कि न्याय दर्शन के अधिकांश विषयों
के विवेचन में सूत्रकार ने ही परीक्षा विधि का भी अवलम्बन किया है ।
प्रयोजन आदि के वर्णन में यद्यपि परीक्षा विधि का प्रयोग न्यायसूत्रों में नहीं
मिलता है फिर भी अधिकांश भाग में परीक्षा भी पाई जाती है इसलिए न्याय
के भाष्यकार ने सामान्य रूप से त्रिविध प्रवृत्ति का वर्णन किया है । इसके
विपरीत वैशेषिक दर्शन में सूत्रकार ने परीक्षा विधि का अवलम्बन नहीं किया
है । केवल उद्देश और लक्षण ही अधिकतर किए गए हैं । अतएव वैशेषिक
दर्शन के टीकाकार श्रीधराचार्य ने परीक्षा को छोड़ कर केवल द्विविध शास्त्र
प्रवृत्ति का वर्णन किया है ।
विभाग—
न्याय की इस त्रिविध प्रवृत्ति के अतिरिक्त 'न्यायवार्तिककार' श्री उद्योत-
कराचार्य तथा 'न्यायमञ्जरीकार' जयन्त भट्ट ने शास्त्र-प्रवृत्ति के चतुर्थ प्रकार
'विभाग' का प्रश्न उठाकर और अन्त में उसका उद्देश में ही समावेश दिखा कर
त्रिविध प्रवृत्ति का ही समर्थन किया है । उन्होंने लिखा है :—