तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्षणलक्षणम् ] उपोद्घातः ११
'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिरित्युक्तम्। उद्दिष्टविभागश्च न त्रिविधायां
शास्त्रप्रवृत्तावन्तर्भवति। तस्मादुद्दिष्टविभागो युक्तः। न; उद्दिष्टविभागस्योद्देश
एवान्तर्भावात् । कस्मात् ? लक्षणसामान्यात् । समानं लक्षणं नामधेयेन
पदार्थाभिधानमुद्देश इति'१।
अर्थात् शास्त्र की त्रिविध प्रवृत्ति होती है यह कहा गया है परन्तु उस
त्रिविध प्रवृत्ति में उद्दिष्ट के 'विभाग' का अन्तर्भाव नहीं होता है इसलिए उद्दिष्ट
के 'विभाग' को भी चौथा प्रकार मानना उचित है। [ यह प्रश्न है इसका
उत्तर करते हैं ] नहीं, उद्दिष्ट के विभाग का अन्तर्भाव उद्देश में ही हो जाता
है। क्योंकि दोनों का लक्षण समान है। नाममात्र से पदार्थों के कथन को ही
उद्देश कहते हैं और 'विभाग' में विभक्त पदार्थों के नाममात्र का कथन ही
होता है अतः विभाग का अन्तर्भाव उद्देश में ही हो सकता है। अतः उसके
अलग परिगणन की आवश्यकता नहीं है।
लक्षण का लक्षण--
इन तीनों विभागों में से उद्देश और परीक्षा का लक्षण सीधा है। और जो
यहां ग्रन्थकार ने दिया है वही 'वात्स्यायन भाष्य' और 'न्यायकन्दली' आदि
अन्य ग्रन्थों में भी दिया है। परन्तु 'लक्षण' का 'लक्षण' थोड़ा समझने योग्य
है। यहाँ तर्कभाषाकार ने 'लक्षणन्त्वसाधारणधर्मवचनम्' । अर्थात् असाधारण
धर्म को लक्षण कहते हैं। जैसे गौ का लक्षण सास्नादिमत्त्व है। यह लक्षण
की व्याख्या की है। असाधारण धर्म या विशेष धर्म वह कहलाता है जो केवल
लक्ष्य [ जैसे गौ ] में रहे। जो धर्म लक्ष्य से भिन्न अलक्ष्य महिष आदि में भी
पाया जाय वह लक्षण नहीं कहलाता है क्योंकि उसमें 'अतिव्याप्ति' दोष होता
है। 'अलक्ष्यवृत्तित्वमतिव्याप्तिः' जो धर्म अलक्ष्य अर्थात् लक्ष्य से भिन्न में
रहे वह 'अतिव्याप्ति' दोषग्रस्त होने से लक्षण नहीं होता। जैसे शृङ्गित्त्व सींग
होनेको गौ का लक्षण नहीं कहा जा सकता है क्योंकि लक्ष्य गौ से भिन्न अर्थात्
अलक्ष्य महिषादि में भी शृङ्गित्त्व धर्म पाया जाता है। अर्थात् सींग भैंस आदि
के भी होते हैं, इसलिए 'शृङ्गित्त्व' गौ का लक्षण नहीं है।
इसी प्रकार 'लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वमव्याप्तिः' जो धर्म लक्ष्य के एक अंश में
न पाया जाय वह 'अव्याप्ति' दोष ग्रस्त होने से लक्षण नहीं कहा जाता। जैसे
१ न्या० वा० १, १, ३, । न्यायमञ्जरी पृ० १२ ।